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भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

पृष्ठ 635, कुल 1058 में से

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पृष्ठ 635
  • अरण्यकाण्ड *

६३३

मुनिहि मिलत अस सोह कृपाला । कनक तरुहि जनु भेंट तमाला ॥ राम बदनु बिलोक मुनि ठाढ़ा । मानहुँ चित्र माझ लिखि काढ़ा ॥

कृपालु श्रीरामचन्द्रजी मुनिसे मिलते हुए ऐसे शोभित हो रहे हैं, मानो सोनेके वृक्षसे तमालका वृक्ष गले लगकर मिल रहा हो। मुनि [निस्तब्ध] खड़े हुए [टकटकी लगाकर] श्रीरामजीका मुख देख रहे हैं, मानो चित्रमें लिखकर बनाये गये हों ॥ १२ ॥

दो०—तब मुनि हृदयँ धीर धरि गहि पद बारहिँ बार ।

निज आश्रम प्रभु आनि करि पूजा बिबिध प्रकार ॥ १० ॥

तब मुनिने हृदयमें धीरज धरकर बार-बार चरणोंको स्पर्श किया। फिर प्रभुको अपने आश्रममें लाकर अनेक प्रकारसे उनकी पूजा की ॥ १० ॥

कह मुनि प्रभु सुनु बिनती मोरी । अस्तुति करौँ कवन बिधि तोरी ॥ महिमा अमित मोरि मति थोरी । रबि सन्मुख खद्योत अँजोरी ॥

मुनि कहने लगे—हे प्रभो! मेरी विनती सुनिये। मैं किस प्रकारसे आपकी स्तुति करूँ? आपकी महिमा अपार है और मेरी बुद्धि अल्प है। जैसे सूर्यके सामने जुगनूका उजाला!! १ ॥

श्याम तामरस दाम शरीरं । जटा मुकुट परिधन मुनिचीरं ॥ पाणि चाप शर कटि तूणीरं । नौमि निरंतर श्रीरघुवीरं ॥

हे नीलकमलकी मालाके समान श्याम शरीरवाले! हे जटाओंका मुकुट और मुनियोंके (वलकल) वस्त्र पहने हुए, हाथोंमें धनुष-बाण लिये तथा कमरमें तरकस कसे हुए श्रीरामजी! मैं आपको निरन्तर नमस्कार करता हूँ ॥ २ ॥

मोह विपिन घन दहन कृशानुः । संत सरोरुह कानन भानुः ॥ निसिचर करि वरुथ मृगराजः । त्रातु सदा नो भव खग बाजः ॥

जो मोहरूपी घने वनको जलानेके लिये अग्नि हैं, संतरूपी कमलोंके वनके प्रफुल्लित करनेके लिये सूर्य हैं, राक्षसरूपी हाथियोंके समूहके पछाड़नेके लिये सिंह हैं और भव (आवागमन) रूपी पक्षीके मारनेके लिये बाजरूप हैं, वे प्रभु सदा हमारी रक्षा करें ॥ ३ ॥

अरुण नयन राजीव सुवेशं । सीता नयन चकोर निशेशं ॥ हर हृदि मानस बाल मरालं । नौमि राम उर बाहु विशालं ॥

हे लाल कमलके समान नेत्र और सुन्दर वेषवाले! सीताजीके नेत्ररूपी चकोरके चन्द्रमा, शिवजीके हृदयरूपी मानसरोवरके बालहंस, विशाल हृदय और भुजावाले श्रीरामचन्द्रजी! मैं आपको नमस्कार करता हूँ ॥ ४ ॥