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भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

पृष्ठ 636, कुल 1058 में से

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पृष्ठ 636

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  • रामचरितमानस *

संशय सर्प ग्रेसन उरगादः। शमन सुकर्कश तर्क विषादः॥ भव भंजन रंजन सुर यूथः। त्रातु सदा नो कृपा वरुथः॥

जो संशयरूपी सर्पको ग्रेसनेके लिये गरुड़ हैं, अत्यन्त कठोर तर्कसे उत्पन्न होनेवाले विषादका नाश करनेवाले हैं, आवागमनको मिटानेवाले और देवताओंके समूहको आनन्द देनेवाले हैं, वे कृपाके समूह श्रीरामजी सदा हमारी रक्षा करें॥ ५ ॥

निर्गुण सगुण विषम सम रूपं। ज्ञान गिरा गोतीतमनूपं॥ अमलमखिलमनवद्यमपारं । नौमि राम भंजन महि भारं॥

हे निर्गुण, सगुण, विषम और समरूप! हे ज्ञान, वाणी और इन्द्रियोंसे अतीत! हे अनुपम, निर्मल, सम्पूर्ण दोषरहित, अनन्त एवं पृथ्वीका भार उतारनेवाले श्रीरामचन्द्रजी! मैं आपको नमस्कार करता हूँ॥ ६ ॥

भक्त कल्पपादप आरामः। तर्जन क्रोध लोभ मद कामः॥ अति नागर भव सागर सेतुः। त्रातु सदा दिनकर कुल केतुः॥

जो भक्तोंके लिये कल्पवृक्षके बगीचे हैं, क्रोध, लोभ, मद और कामको डरानेवाले हैं, अत्यन्त ही चतुर और संसाररूपी समुद्रसे तरनेके लिये सेतुरूप हैं, वे सूर्यकुलकी ध्वजा श्रीरामजी सदा मेरी रक्षा करें॥ ७ ॥

अतुलित भुज प्रताप बल धामः। कलि मल विपुल विभंजन नामः॥ धर्म वर्म नर्मद गुण ग्रामः। संतत शं तनोतु मम रामः॥

जिनकी भुजाओंका प्रताप अतुलनीय है, जो बलके धाम हैं, जिनका नाम कलियुगके बड़े भारी पापोंका नाश करनेवाला है, जो धर्मके कवच (रक्षक) हैं और जिनके गुणसमूह आनन्द देनेवाले हैं, वे श्रीरामजी निरन्तर मेरे कल्याणका विस्तार करें॥ ८ ॥

जदपि विरज व्यापक अविनासी। सब के हृदयँ निरंतर बासी॥ तदपि अनुज श्री सहित खरारी। बसतु मनसि मम काननचारी॥

यद्यपि आप निर्मल, व्यापक, अविनाशी और सबके हृदयमें निरन्तर निवास करनेवाले हैं; तथापि हे खरारि श्रीरामजी! लक्ष्मणजी और सीताजीसहित वनमें विचरनेवाले आप इसी रूपमें मेरे हृदयमें निवास कीजिये॥ ९ ॥

जे जानहिं ते जानहुँ स्वामी। सगुन अगुन उर अंतरजामी॥ जो कोसलपति राजिव नयना। करउ सो राम हृदय मम अयना॥

हे स्वामी! आपको जो सगुण, निर्गुण और अन्तर्यामी जानते हों, वे जाना करें, मेरे हृदयको तो कोसलपति कमलनयन श्रीरामजी ही अपना घर बनावें॥ १० ॥