श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 637, कुल 1058 में से
संदर्भ में पढ़ें- अरण्यकाण्ड *
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अस अभिमान जाइ जनि भोरे । मैं सेवक रघुपति पति मोरे ॥ सुनि मुनि बचन राम मन भाए । बहुरि हरषि मुनिबर उर लाए ॥
ऐसा अभिमान भूलकर भी न छूटे कि मैं सेवक हूँ और श्रीरघुनाथजी मेरे स्वामी हैं। मुनिके वचन सुनकर श्रीरामजी मनमें बहुत प्रसन्न हुए। तब उन्होंने हर्षित होकर श्रेष्ठ मुनिको हृदयसे लगा लिया ॥ ११ ॥
परम प्रसन्न जानु मुनि मोही । जो बर मागहु देउँ सो तोही ॥ मुनि कह मैं बर कबहुँ न जाचा । समुझि न परइ झूठ का साचा ॥
[और कहा—] हे मुनि! मुझे परम प्रसन्न जानो। जो वर माँगो, वही मैं तुम्हें दूँ! मुनि सुतीक्ष्णजीने कहा—मैंने तो वर कभी माँगा ही नहीं। मुझे समझ ही नहीं पड़ता कि क्या झूठ है और क्या सत्य है, (क्या माँगूँ, क्या नहीं) ॥ १२ ॥
तुम्हहि नीक लागै रघुराई । सो मोहि देहु दास सुखदाई ॥ अबिरल भगति बिरति बिग्याना । होहु सकल गुन ग्यान निधाना ॥
[अतः] हे रघुनाथजी! हे दासोंको सुख देनेवाले! आपको जो अच्छा लगे, मुझे वही दीजिये। [श्रीरामचन्द्रजीने कहा—हे मुने!] तुम प्रगाढ़ भक्ति, वैराग्य, विज्ञान और समस्त गुणों तथा ज्ञानके निधान हो जाओ ॥ १३ ॥
प्रभु जो दीन्ह सो बरु मैं पावा । अब सो देहु मोहि जो भावा ॥
[तब मुनि बोले—] प्रभुने जो वरदान दिया वह तो मैंने पा लिया। अब मुझे जो अच्छा लगता है वह दीजिये— ॥ १४ ॥
दो०—अनुज जानकी सहित प्रभु चाप बान धर राम । मम हिय गगन इंदु इव बसहु सदा निहकाम ॥ ११ ॥
हे प्रभो! हे श्रीरामजी! छोटे भाई लक्ष्मणजी और सीताजीसहित धनुष-बाणधारी आप निष्काम (स्थिर) होकर मेरे हृदयरूपी आकाशमें चन्द्रमाकी भाँति सदा निवास कीजिये ॥ ११ ॥
एवमस्तु करि रमानिवासा । हरषि चले कुंभज रिषि पासा ॥ बहुत दिवस गुर दरसनु पाएँ । भए मोहि एहिं आश्रम आएँ ॥
‘एवमस्तु’ (ऐसा ही हो) ऐसा उच्चारण कर लक्ष्मीनिवास श्रीरामचन्द्रजी हर्षित होकर अगस्त्य ऋषिके पास चले। [तब सुतीक्ष्णजी बोले—] गुरु अगस्त्यजीका दर्शन पाये और इस आश्रममें आये मुझे बहुत दिन हो गये ॥ १ ॥