श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 643, कुल 1058 में से
संदर्भ में पढ़ें- अरण्यकाण्ड *
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अब मैं भक्तिके साधन विस्तारसे कहता हूँ—यह सुगम मार्ग है, जिससे जीव मुझको सहज ही पा जाते हैं। पहले तो ब्राह्मणोंके चरणोंमें अत्यन्त प्रीति हो और वेदकी रीतिके अनुसार अपने-अपने [वर्णाश्रमके] कर्मोंमें लगा रहे ॥ ३ ॥
एहि कर फल पुनि विषय बिरागा । तब मम धर्म उपज अनुरागा ॥ श्रवनादिक नव भक्ति दृढ़ाहीं । मम लीला रति अति मन माहीं ॥
इसका फल, फिर विषयोंसे वैराग्य होगा। तब (वैराग्य होनेपर) मेरे धर्म (भागवतधर्म) में प्रेम उत्पन्न होगा। तब श्रवण आदि नौ प्रकारकी भक्तियाँ दृढ़ होंगी और मनमें मेरी लीलाओंके प्रति अत्यन्त प्रेम होगा ॥ ४ ॥
संत चरन पंकज अति प्रेमा । मन क्रम बचन भजन दृढ़ नेमा ॥ गुरु पितु मातु बंधु पति देवा । सब मोहि कहैं जानै दृढ़ सेवा ॥
जिसका संतोंके चरणकमलोंमें अत्यन्त प्रेम हो; मन, वचन और कर्मसे भजनका दृढ़ नियम हो और जो मुझको ही गुरु, पिता, माता, भाई, पति और देवता सब कुछ जाने और सेवामें दृढ़ हो; ॥ ५ ॥
मम गुन गावत पुलक सरीरा । गदगद गिरा नयन बह नीरा ॥ काम आदि मद दंभ न जाकें । तात निरंतर बस मैं ताकें ॥
मेरा गुण गाते समय जिसका शरीर पुलकित हो जाय, वाणी गदगद हो जाय और नेत्रोंसे [प्रेमाश्रुओंका] जल बहने लगे और काम, मद और दम्भ आदि जिसमें न हों, हे भाई! मैं सदा उसके वशमें रहता हूँ ॥ ६ ॥
दो०— बचन कर्म मन मोरि गति भजनु करहिं निःकाम । तिन्ह के हृदय कमल महुँ करउँ सदा बिश्राम ॥ १६ ॥
जिनको कर्म, वचन और मनसे मेरी ही गति है; और जो निष्काम भावसे मेरा भजन करते हैं, उनके हृदय-कमलमें मैं सदा विश्राम किया करता हूँ ॥ १६ ॥
भगति जोग सुनि अति सुख पावा । लछिमन प्रभु चरनन्हि सिरु नावा ॥ एहि बिधि गए कछुक दिन बीती । कहत बिराग ग्यान गुन नीती ॥
इस भक्तियोगको सुनकर लक्ष्मणजीने अत्यन्त सुख पाया और उन्होंने प्रभु श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंमें सिर नवाया। इस प्रकार वैराग्य, ज्ञान, गुण और नीति कहते हुए कुछ दिन बीत गये ॥ १ ॥
सूपनखा रावन कै बहिनी । दुष्ट हृदय दारुन जस अहिनी ॥ पंचबटी सो गड़ एक बारा । देखि बिकल भड़ जुगल कुमारा ॥