श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 644, कुल 1058 में से
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- रामचरितमानस *
शूर्पणखा नामक रावणकी एक बहिन थी, जो नागिनके समान भयानक और दुष्ट हृदयकी थी। वह एक बार पञ्चवटीमें गयी और दोनों राजकुमारोंको देखकर विकल (कामसे पीड़ित) हो गयी ॥ २ ॥
भ्राता पिता पुत्र उरगारी । पुरुष मनोहर निरखत नारी ॥ होइ विकल सक मनहि न रोकी । जिमि रबिमनि द्रव रबिहि बिलोकी ॥
(काकभुशुण्डिजी कहते हैं—) हे गरुड़जी! (शूर्पणखा—जैसी राक्षसी, धर्मज्ञानशून्य कामान्ध) स्त्री मनोहर पुरुषको देखकर, चाहे वह भाई, पिता, पुत्र ही हो, विकल हो जाती है और मनको नहीं रोक सकती। जैसे सूर्यकान्तमणि सूर्यको देखकर द्रवित हो जाती है (ज्वालासे पिघल जाती है) ॥ ३ ॥
रुचिर रूप धरि प्रभु पहिं जाई । बोली बचन बहुत मुसुकाई ॥ तुम्ह सम पुरुष न मो सम नारी । यह सँजोग बिधि रचा बिचारी ॥
वह सुन्दर रूप धरकर प्रभुके पास जाकर और बहुत मुसकराकर वचन बोली—न तो तुम्हारे समान कोई पुरुष है, न मेरे समान स्त्री! विधाताने यह संयोग (जोड़ा) बहुत विचारकर रचा है ॥ ४ ॥
मम अनुरूप पुरुष जग माहीं । देखेउँ खोजि लोक तिहु नाहीं ॥ ताते अब लगि रहिउँ कुमारी । मनु माना कछु तुम्हहि निहारी ॥
मेरे योग्य पुरुष (वर) जगत्भरमें नहीं है, मैंने तीनों लोकोंको खोज देखा। इसीसे मैं अबतक कुमारी (अविवाहित) रही। अब तुमको देखकर कुछ मन माना (चित्त ठहरा) है ॥ ५ ॥
सीतहि चितइ कही प्रभु बाता । अहइ कुआर मोर लघु भ्राता ॥ गड़ लछिमन रिपु भगिनी जानी । प्रभु बिलोकिक बोले मृदु बानी ॥
सीताजीकी ओर देखकर प्रभु श्रीरामचन्द्रजीने यह बात कही कि मेरा छोटा भाई कुमार है। तब वह लक्ष्मणजीके पास गयी। लक्ष्मणजी उसे शत्रुकी बहिन समझकर और प्रभुकी ओर देखकर कोमल वाणीसे बोले— ॥ ६ ॥
सुंदरि सुनु मैं उन्ह कर दासा । परार्थीन नहिं तोर सुपासा ॥ प्रभु समर्थ कोसलपुर राजा । जो कछु करहिं उनहि सब छाजा ॥
हे सुन्दरी! सुन, मैं तो उनका दास हूँ। मैं परार्थीन हूँ, अतः तुम्हें सुभीता (सुख) न होगा। प्रभु समर्थ हैं, कोसलपुरके राजा हैं, वे जो कुछ करें, उन्हें सब फवता है ॥ ७ ॥
सेवक सुख चह मान भिखारी । व्यसनी धन सुभ गति बिभिचारी ॥ लोभी जसु चह चार गुमानी । नभ दुहि दूध चहत ए प्रानी ॥