सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

पृष्ठ 645, कुल 1058 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 645
  • अरण्यकाण्ड *

६४३

सेवक सुख चाहे, भिखारी सम्मान चाहे, व्यसनी (जिसे जूए, शराब आदिका व्यसन हो) धन और व्यभिचारी शुभगति चाहे, लोभी यश चाहे और अभिमानी चारों फल—अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष चाहे, तो ये सब प्राणी आकाशको दुहकर दूध लेना चाहते हैं (अर्थात् असम्भव बातको सम्भव करना चाहते हैं) ॥ ८ ॥

पुनि फिरि राम निकट सो आई । प्रभु लछिमन पहिं बहुरि पठाई ॥ लछिमन कहा तोहि सो बरई । जो तून तोरि लाज परिहरई ॥

वह लौटकर फिर श्रीरामजीके पास आयी। प्रभुने फिर उसे लक्ष्मणजीके पास भेज दिया। लक्ष्मणजीने कहा—तुम्हें वही बरेगा जो लज्जाको तूण तोड़कर (अर्थात् प्रतिज्ञा करके) त्याग देगा (अर्थात् जो निपट निर्लज्ज होगा) ॥ ९ ॥

तब खिसिआनि राम पहिं गई । रूप भयंकर प्रगटत भई ॥ सीतहि सभय देखि रघुराई । कहा अनुज सन सयन बुझाई ॥

तब वह खिसियायी हुई (क्रुद्ध होकर) श्रीरामजीके पास गयी और उसने अपना भयङ्कर रूप प्रकट किया। सीताजीको भयभीत देखकर श्रीरघुनाथजीने लक्ष्मणजीको इशारा देकर कहा ॥ १० ॥

दो०— लछिमन अति लाघवँ सो नाक कान बिनु कीन्हि । ताके कर रावन कहँ मनौ चुनौती दीन्हि ॥ १७ ॥

लक्ष्मणजीने बड़ी फुर्तीसे उसको बिना नाक-कानकी कर दिया। मानो उसके हाथ रावणको चुनौती दी हो! ॥ १७ ॥

नाक कान बिनु भइ बिकरारा । जनु स्तव सैल गेरु कै धारा ॥ खर दूषण पहिं गड़ बिलपाता । धिग धिग तव पौरुष बल भ्राता ॥

बिना नाक-कानके वह विकराल हो गयी। [उसके शरीरसे रक्त इस प्रकार बहने लगा] मानो [काले] पर्वतसे गेरुकी धारा बह रही हो। वह विलाप करती हुई खर-दूषणके पास गयी। [और बोली—] हे भाई! तुम्हारे पौरुष (वीरता) को धिक्कार है, तुम्हारे बलको धिक्कार है ॥ १ ॥

तेहिं पूछा सब कहेसि बुझाई । जातुधान सुनि सेन बनाई ॥ धाए निसिचर निकर बस्त्रथा । जनु सपच्छ कज्जल गिरि जूथा ॥

उन्होंने पूछा, तब शूर्पणखाने सब समझाकर कहा। सब सुनकर राक्षसोंने सेना तैयार की। राक्षससमूह झुंड-के-झुंड दौड़े। मानो पंखधारी काजलके पर्वतोंका झुंड हो ॥ २ ॥

नाना बाहन नानाकारा । नानायुध धर घोर अपारा ॥ सूपनखा आगें करि लीनी । असुभ रूप श्रुति नासा हीनी ॥