श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 655, कुल 1058 में से
संदर्भ में पढ़ें- अरण्यकाण्ड *
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नीचका झुकना (नम्रता) भी अत्यन्त दुःखदायी होता है। जैसे अङ्गुष्ठ, धनुष, सौंप और बिल्लीका झुकना। हे भवानी! दुष्टकी मीठी वाणी भी [उसी प्रकार] भय देनेवाली होती है, जैसे बिना ऋतुके फूल!! ४॥
दो०— करि पूजा मारीच तब सादर पूछी बात।
कवन हेतु मन व्यग्र अति अकसर आयहु तात ॥ २४ ॥
तब मारीचने उसकी पूजा करके आदरपूर्वक बात पूछी—हे तात! आपका मन किस कारण इतना अधिक व्यग्र है और आप अकेले आये हैं? ॥ २४ ॥
दसमुख सकल कथा तेहि आगें। कही सहित अभिमान अभागें ॥
होहु कपट मृग तुम्ह छलकारी। जेहि बिधि हरि आनौं नृपनारी ॥
भाग्यहीन रावणने सारी कथा अभिमानसहित उसके सामने कही [और फिर कहा—] तुम छल करनेवाले कपट-मृग बनो, जिस उपायसे मैं उस राजवधूको हर लाऊँ ॥ १ ॥
तेहिं पुनि कहा सुनहु दससीसा। ते नररूप चराचर ईसा ॥
तासों तात बयरु नहिं कीजै। मारें मरिअ जिआएँ जीजै ॥
तब उसने (मारीचने) कहा—हे दशशीश! सुनिये। वे मनुष्यरूपमें चराचरके ईश्वर हैं। हे तात! उनसे वैर न कीजिये। उन्हींके मारनेसे मरना और उनके जिलानेसे जीना होता है (सबका जीवन-मरण उन्हींके अधीन है) ॥ २ ॥
मुनि मख राखन गयउ कुमार। बिनु फर सर रघुपति मोहि मारा ॥
सत जोजन आयउँ छन माहीं। तिन्ह सन बयरु किएँ भल नाहीं ॥
यही राजकुमार मुनि विश्वामित्रके यज्ञकी रक्षाके लिये गये थे। उस समय श्रीरघुनाथजीने बिना फलका बाण मुझे मारा था, जिससे मैं क्षणभरमें सौ योजनापर आ गिरा। उनसे वैर करनेमें भलाई नहीं है ॥ ३ ॥
भड़ मम कीट भृंग की नाई। जहाँ तहाँ मैं देखउँ दोउ भाई ॥
जौं नर तात तदपि अति सूर। तिन्हहि बिरोधि न आइहि पूरा ॥
मेरी दशा तो भृङ्गीके कीड़ेकी-सी हो गयी है। अब मैं जहाँ-तहाँ श्रीराम-लक्ष्मण दोनों भाइयोंको ही देखता हूँ। और हे तात! यदि वे मनुष्य हैं तो भी बड़े शूरवीर हैं। उनसे विरोध करनेमें पूरा न पड़ेगा (सफलता नहीं मिलेगी) ॥ ४ ॥
दो०— जेहिं ताड़का सुबाहु हति खंडेउ हर कोदंड।
खर दूषन तिसिरा बधेउ मनुज कि अस बरिबंड ॥ २५ ॥
जिसने ताड़का और सुबाहुको मारकर शिवजीका धनुष तोड़ दिया और खर, दूषण और त्रिशिराका वध कर डाला, ऐसा प्रचण्ड बली भी कहीं मनुष्य हो सकता है? ॥ २५ ॥