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भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

पृष्ठ 656, कुल 1058 में से

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पृष्ठ 656

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  • रामचरितमानस *

जाहु भवन कुल कुसल बिचारी । सुनत जरा दीन्हिसि बहु गारी ॥ गुरु जिमि मूढ़ करसि मम बोधा । कहु जग मोहि समान को जोधा ॥

अतः अपने कुलकी कुशल विचारकर आप घर लौट जाइये। यह सुनकर रावण जल उठा और उसने बहुत-सी गालियाँ दीं (दुर्बचन कहे)। [कहा—] ओर मूर्ख! तू गुरुकी तरह मुझे ज्ञान सिखाता है? बता तो, संसारमें मेरे समान योद्धा कौन है? ॥ १ ॥

तब मारीच हृदयँ अनुमाना । नवहि बिरोधँ नहिं कल्याना ॥ सस्त्री मर्मी प्रभु सठ धनी । बैद बंदि कवि भानस गुनी ॥

तब मारीचने हृदयमें अनुमान किया कि शस्त्री (शस्त्रधारी), मर्मी (भेद जाननेवाला), समर्थ स्वामी, मूर्ख, धनवान्, वैद्य, भाट, कवि और रसोइया—इन नौ व्यक्तियोंसे विरोध (वैर) करनेमें कल्याण (कुशल) नहीं होता ॥ २ ॥

उभय भाँति देखा निज मरना । तब ताकिसि रघुनायक सरना ॥ उतरु देत मोहि बधब अभागें । कस न मरौँ रघुपति सर लागें ॥

जब मारीचने दोनों प्रकारसे अपना मरण देखा, तब उसने श्रीरघुनाथजीकी शरण तकी (अर्थात् उनकी शरण जानेमें ही कल्याण समझा)। [सोचा कि] उतर देते ही (नाहीं करते ही) यह अभागा मुझे मार डालेगा। फिर श्रीरघुनाथजीके बाण लगनेसे ही क्यों न मरूँ? ॥ ३ ॥

अस जियँ जानि दसानन संगा । चला राम पद प्रेम अभंगा ॥ मन अति हरष जनाव न तेही । आजु देखिहउँ परम सनेही ॥

हृदयमें ऐसा समझकर वह रावणके साथ चला। श्रीरामजीके चरणोंमें उसका अखण्ड प्रेम है। उसके मनमें इस बातका अत्यन्त हर्ष है कि आज मैं अपने परम स्नेही श्रीरामजीको देखूँगा; किन्तु उसने यह हर्ष रावणको नहीं जनाया ॥ ४ ॥

छं०— निज परम प्रीतम देखि लोचन सुफल करि सुख पाइहौं । श्री सहित अनुज समेत कृपानिकेत पद मन लाइहौं ॥ निर्बान दायक क्रोध जा कर भगति अबसहि बसकरी । निज पानि सर संधानि सो मोहि बधिहि सुखसागर हरी ॥

[वह मन-ही-मन सोचने लगा] अपने परम प्रियतमको देखकर नेत्रोंको सफल करके सुख पाऊँगा। जानकीजीसहित और छोटे भाई लक्ष्मणजीसमेत कृपानिधान श्रीरामजीके चरणोंमें मन लगाऊँगा। जिनका क्रोध भी मोक्ष देनेवाला है और जिनकी भक्ति उन अवश (किसीके वशमें न होनेवाले स्वतन्त्र भगवान्) को भी वशमें करनेवाली है, अहा! वे ही आनन्दके समुद्र श्रीहरि अपने हाथोंसे बाण सन्धानकर मेरा वध करेंगे!