श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 662, कुल 1058 में से
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- रामचरितमानस *
उसने [रावणके] बाल पकड़कर उसे रथके नीचे उतार लिया, रावण पृथ्वीपर गिर पड़ा। गीध सीताजीको एक ओर बैठाकर फिर लौटा और चोंचोंसे मार-मारकर रावणके शरीरको विदीर्ण कर डाला। इससे उसे एक घड़ीके लिये मूर्च्छा हो गयी ॥ १० ॥
तब सक्रोध निसिचर खिसिआना । काढ़ेसि परम कराल कृपाना ॥ काटेसि पंख परा खग धरनी । सुमिरि राम करि अदभुत करनी ॥
तब खिसियाये हुए रावणने क्रोधयुक्त होकर अत्यन्त भयानक कटार निकाली और उससे जटायुके पंख काट डाले। पक्षी (जटायु) श्रीरामजीकी अद्भुत लीलाका स्मरण करके पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ ११ ॥
सीतहि जान चढ़ाइ बहोरी । चला उताइल त्रास न थोरी ॥ करति विलाप जाति नभ सीता । व्याध बिबस जनु मृगी सभीता ॥
सीताजीको फिर रथपर चढ़ाकर रावण बड़ी उतावलीके साथ चला, उसे भय कम न था। सीताजी आकाशमें विलाप करती हुई जा रही हैं। मानो व्याधके वशमें पड़ी हुई (जालमें फँसी हुई) कोई भयभीत हिरनी हो! ॥ १२ ॥
गिरि पर बैठे कपिन्ह निहारी । कहि हरि नाम दीन्ह पट डारी ॥ एहि बिधि सीतहि सो लै गयऊ । बन असोक महाँ राखत भयऊ ॥
पर्वतपर बैठे हुए बंदरोंको देखकर सीताजीने हरिनाम लेकर वस्त्र डाल दिया। इस प्रकार वह सीताजीको ले गया और उन्हें अशोकवनमें जा रखा ॥ १३ ॥
दो०—हारि परा खल बहु बिधि भय अरु प्रीति देखाइ ।
तब असोक पादप तर राखिसि जतन कराइ ॥ २९ ( क ) ॥
सीताजीको बहुत प्रकारसे भय और प्रीति दिखलाकर जब वह दुष्ट हार गया, तब उन्हें यत्न कराके (सब व्यवस्था ठीक कराके) अशोक-वृक्षके नीचे रख दिया ॥ २९ ( क ) ॥
नवाह्वपारायण, छठा विश्राम
जेहि बिधि कपट कुरंग सँग धाइ चले श्रीराम ।
सो छबि सीता राखि उर रटति रहति हरिनाम ॥ २९ ( ख ) ॥
जिस प्रकार कपटमृगके साथ श्रीरामजी दौड़ चले थे, उसी छबिको हृदयमें रखकर वे हरिनाम (रामनाम) रटती रहती हैं ॥ २९ ( ख ) ॥
रघुपति अनुजहि आवत देखी । बाहिज चिंता कीन्हि बिसेषी ॥
जनकसुता परिहरिहु अकेली । आयहु तात बचन मम पेली ॥