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भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

पृष्ठ 663, कुल 1058 में से

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पृष्ठ 663
  • अरण्यकाण्ड *

६६१

[इधर] श्रीरघुनाथजीने छोटे भाई लक्ष्मणजीको आते देखकर बाह्यरूपमें बहुत चिन्ता की [और कहा—] हे भाई! तुमने जानकीको अकेली छोड़ दिया और मेरी आज्ञाका उल्लङ्घन कर यहाँ चले आये!! १ ॥

निसिचर निकर फिरहिं बन माहीं । मम मन सीता आश्रम नाहीं ॥ गहि पद कमल अनुज कर जोरी । कहेउ नाथ कछु मोहि न खोरी ॥

राक्षसोंके झुंड वनमें फिरते रहते हैं। मेरे मनमें ऐसा आता है कि सीता आश्रममें नहीं है। छोटे भाई लक्ष्मणजीने श्रीरामजीके चरणकमलोंको पकड़कर हाथ जोड़कर कहा—हे नाथ! मेरा कुछ भी दोष नहीं है ॥ २ ॥

अनुज समेत गए प्रभु तहवाँ । गोदावरि तट आश्रम जहवाँ ॥ आश्रम देखि जानकी हीना । भए बिकल जस प्राकृत दीना ॥

लक्ष्मणजीसहित प्रभु श्रीरामजी वहाँ गये जहाँ गोदावरीके तटपर उनका आश्रम था। आश्रमको जानकीजीसे रहित देखकर श्रीरामजी साधारण मनुष्यकी भाँति व्याकुल और दीन (दुखी) हो गये ॥ ३ ॥

हा गुन खानि जानकी सीता । रूप सील ब्रत नेम पुनीता ॥ लछिमन समुझाए बहु भाँती । पूछत चले लता तरु पाँती ॥

[वे विलाप करने लगे—] हा गुणोंकी खान जानकी! हा रूप, शील, ब्रत और नियमोंमें पवित्र सीते! लक्ष्मणजीने बहुत प्रकारसे समझाया। तब श्रीरामजी लताओं और वृक्षोंकी पंक्तियोंसे पूछते हुए चले ॥ ४ ॥

हे खग मृग हे मधुकर श्रेनी । तुम्ह देखी सीता मृगनैनी ॥ खंजन सुक कपोत मृग मीना । मधुप निकर कोकिला प्रबीना ॥

हे पक्षियो! हे पशुओ! हे भौरोंकी पंक्तियो! तुमने कहीं मृगनयनी सीताको देखा है? खंजन, तोता, कबूतर, हिरन, मछली, भौरोंका समूह, प्रवीण कोयल, ॥ ५ ॥

कुंद कली दाड़िम दामिनी । कमल सरद ससि अहिभामिनी ॥ बरुन पास मनोज धनु हंसा । गज केहरि निज सुनत प्रसंसा ॥

कुन्दकली, अनार, बिजली, कमल, शरद्का चन्द्रमा और नागिनी, वरुणका पाश, कामदेवका धनुष, हंस, गज और सिंह—ये सब आज अपनी प्रशंसा सुन रहे हैं ॥ ६ ॥

श्रीफल कनक कदलि हरषाहीं । नेकु न संक सकुच मन माहीं ॥ सुनु जानकी तोहि बिनु आजू । हरषे सकल पाइ जनु राजू ॥

बेल, सुवर्ण और केला हर्षित हो रहे हैं। इनके मनमें जरा भी शङ्का और संकोच नहीं है। हे जानकी! सुनो, तुम्हारे बिना ये सब आज ऐसे हर्षित हैं, मानो राज पा गये हों। (अर्थात् तुम्हारे अंगोंके सामने ये सब तुच्छ, अपमानित और लज्जित थे। आज तुम्हें न देखकर ये अपनी शोभाके अभिमानमें फूल रहे हैं) ॥ ७ ॥