श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
- अरण्यकाण्ड *
६६१
[इधर] श्रीरघुनाथजीने छोटे भाई लक्ष्मणजीको आते देखकर बाह्यरूपमें बहुत चिन्ता की [और कहा—] हे भाई! तुमने जानकीको अकेली छोड़ दिया और मेरी आज्ञाका उल्लङ्घन कर यहाँ चले आये!! १ ॥
निसिचर निकर फिरहिं बन माहीं । मम मन सीता आश्रम नाहीं ॥ गहि पद कमल अनुज कर जोरी । कहेउ नाथ कछु मोहि न खोरी ॥
राक्षसोंके झुंड वनमें फिरते रहते हैं। मेरे मनमें ऐसा आता है कि सीता आश्रममें नहीं है। छोटे भाई लक्ष्मणजीने श्रीरामजीके चरणकमलोंको पकड़कर हाथ जोड़कर कहा—हे नाथ! मेरा कुछ भी दोष नहीं है ॥ २ ॥
अनुज समेत गए प्रभु तहवाँ । गोदावरि तट आश्रम जहवाँ ॥ आश्रम देखि जानकी हीना । भए बिकल जस प्राकृत दीना ॥
लक्ष्मणजीसहित प्रभु श्रीरामजी वहाँ गये जहाँ गोदावरीके तटपर उनका आश्रम था। आश्रमको जानकीजीसे रहित देखकर श्रीरामजी साधारण मनुष्यकी भाँति व्याकुल और दीन (दुखी) हो गये ॥ ३ ॥
हा गुन खानि जानकी सीता । रूप सील ब्रत नेम पुनीता ॥ लछिमन समुझाए बहु भाँती । पूछत चले लता तरु पाँती ॥
[वे विलाप करने लगे—] हा गुणोंकी खान जानकी! हा रूप, शील, ब्रत और नियमोंमें पवित्र सीते! लक्ष्मणजीने बहुत प्रकारसे समझाया। तब श्रीरामजी लताओं और वृक्षोंकी पंक्तियोंसे पूछते हुए चले ॥ ४ ॥
हे खग मृग हे मधुकर श्रेनी । तुम्ह देखी सीता मृगनैनी ॥ खंजन सुक कपोत मृग मीना । मधुप निकर कोकिला प्रबीना ॥
हे पक्षियो! हे पशुओ! हे भौरोंकी पंक्तियो! तुमने कहीं मृगनयनी सीताको देखा है? खंजन, तोता, कबूतर, हिरन, मछली, भौरोंका समूह, प्रवीण कोयल, ॥ ५ ॥
कुंद कली दाड़िम दामिनी । कमल सरद ससि अहिभामिनी ॥ बरुन पास मनोज धनु हंसा । गज केहरि निज सुनत प्रसंसा ॥
कुन्दकली, अनार, बिजली, कमल, शरद्का चन्द्रमा और नागिनी, वरुणका पाश, कामदेवका धनुष, हंस, गज और सिंह—ये सब आज अपनी प्रशंसा सुन रहे हैं ॥ ६ ॥
श्रीफल कनक कदलि हरषाहीं । नेकु न संक सकुच मन माहीं ॥ सुनु जानकी तोहि बिनु आजू । हरषे सकल पाइ जनु राजू ॥
बेल, सुवर्ण और केला हर्षित हो रहे हैं। इनके मनमें जरा भी शङ्का और संकोच नहीं है। हे जानकी! सुनो, तुम्हारे बिना ये सब आज ऐसे हर्षित हैं, मानो राज पा गये हों। (अर्थात् तुम्हारे अंगोंके सामने ये सब तुच्छ, अपमानित और लज्जित थे। आज तुम्हें न देखकर ये अपनी शोभाके अभिमानमें फूल रहे हैं) ॥ ७ ॥
६६२
- रामचरितमानस *
किमि सहि जात अनख तोहि पाहीं । प्रिया बेगि प्रगटसि कस नाहीं ॥ एहि बिधि खोजत बिलपत स्वामी । मनहु महा बिरही अति कामी ॥
तुमसे यह अनख (स्पर्धा) कैसे सही जाती है ? हे प्रिये ! तुम शीघ्र ही प्रकट क्यों नहीं होती ? इस प्रकार [अनन्त ब्रह्माण्डोंके अथवा महामहिमाययी स्वरूपाशक्ति श्रीसीताजीके] स्वामी श्रीरामजी सीताजीको खोजते हुए [इस प्रकार] विलाप करते हैं, मानो कोई महाविरही और अत्यन्त कामी पुरुष हो ॥ ८ ॥
पूरनकाम राम सुख रासी । मनुजचरित कर अज अविनासी ॥ आगें परा गीधपति देखा । सुमिरत राम चरन जिन्ह रेखा ॥
पूर्णकाम, आनन्दकी राशि, अजन्मा और अविनाशी श्रीरामजी मनुष्योंके-से चरित्र कर रहे हैं। आगे [जानेपर] उन्होंने गृध्रपति जटायुको पड़ा देखा। वह श्रीरामजीके चरणोंका स्मरण कर रहा था, जिनमें [ध्वजा-कुलिश आदिकी] रेखाएँ (चिह्न) हैं ॥ ९ ॥
दो०— कर सरोज सिर परसेउ कृपासिंधु रघुबीर ।
निरखि राम छबि धाम मुख बिगत भई सब पीर ॥ ३० ॥
कृपासागर श्रीरघुवीरने अपने करकमलसे उसके सिरका स्पर्श किया (उसके सिरपर कर-कमल फेर दिया)। शोभाधाम श्रीरामजीका [परम सुन्दर] मुख देखकर उसकी सब पीड़ा जाती रही ॥ ३० ॥
तब कह गीध बचन धरि धीरा । सुनहु राम भंजन भव भीरा ॥ नाथ दसानन यह गति कीन्ही । तेहिं खल जनकसुता हरि लीन्ही ॥
तब धीरज धरकर गीधने यह वचन कहा—हे भव (जन्म-मृत्यु) के भयका नाश करनेवाले श्रीरामजी ! सुनिये। हे नाथ ! रावणने मेरी यह दशा की है। उसी दुष्टने जानकीजीको हर लिया है ॥ १ ॥
लै दच्छिन दिसि गयउ गोसाई । बिलपति अति कुररी की नाई ॥ दरस लागि प्रभु राखेउँ प्राना । चलन चहत अब कृपानिधाना ॥
हे गोसाई ! वह उन्हें लेकर दक्षिण दिशाको गया है। सीताजी कुररी (कुर्ज) की तरह अत्यन्त विलाप कर रही थीं। हे प्रभो ! मैंने आपके दर्शनोंके लिये ही प्राण रोक रखे थे। हे कृपानिधान ! अब ये चलना ही चाहते हैं ॥ २ ॥
राम कहा तनु राखहु ताता । मुख मुसुकाइ कही तेहिं बाता ॥ जा कर नाम मरत मुख आवा । अधमउ मुकृत होइ श्रुति गावा ॥
श्रीरामचन्द्रजीने कहा—हे तात ! शरीरको बनाये रखिये। तब उसने मुसकराते हुए मुँहसे यह बात कही—मरते समय जिनका नाम मुखमें आ जानेसे अधम (महान् पापी) भी मुक्त हो जाता है, ऐसा वेद गाते हैं— ॥ ३ ॥
- अरण्यकाण्ड *
६६३
सो मम लोचन गोचर आगें। राखों देह नाथ केहि खागें॥ जल भरि नयन कहहिं रघुराई। तात कर्म निज तें गति पाई॥
वही (आप) मेरे नेत्रोंके विषय होकर सामने खड़े हैं। हे नाथ! अब मैं किस कमी [की पूर्ति] के लिये देहको रखूँ? नेत्रोंमें जल भरकर श्रीरघुनाथजी कहने लगे—हे तात! आपने अपने श्रेष्ठ कर्मोंसे [दुर्लभ] गति पायी है॥ ४ ॥
परहित बस जिन्ह के मन माहीं। तिन्ह कहुँ जग दुर्लभ कछु नाही॥ तनु तजि तात जाहु मम धामा। देउँ काह तुम्ह पूरनकामा॥
जिनके मनमें दूसरेका हित बसता है (समाया रहता है), उनके लिये जगत्में कुछ भी (कोई भी गति) दुर्लभ नहीं है। हे तात! शरीर छोड़कर आप मेरे परम धाममें जाइये। मैं आपको क्या दूँ? आप तो पूर्णकाम हैं (सब कुछ पा चुके हैं)॥ ५ ॥
दो०—सीता हरन तात जनि कहहु पिता सन जाइ। जौं मैं राम त कुल सहित कहहिहि दसानन आइ॥ ३१ ॥
हे तात! सीताहरणकी बात आप जाकर पिताजीसे न कहियेगा। यदि मैं राम हूँ तो दशमुख रावण कुटुम्बसहित वहाँ आकर स्वयं ही कहेगा॥ ३१ ॥
गीध देह तजि धरि हरि रूपा। भूषन बहु पट पीत अनूपा॥ स्याम गात बिसाल भुज चारी। अस्तुति करत नयन भरि बारी॥
जटायुने गीधकी देह त्यागकर हरिका रूप धारण किया और बहुत-से अनुपम (दिव्य) आभूषण और [दिव्य] पीताम्बर पहन लिये। श्याम शरीर है, विशाल चार भुजाएँ हैं और नेत्रोंमें [प्रेम तथा आनन्दके आँसुओंका] जल भरकर वह स्तुति कर रहा है—॥ १ ॥
छं०—जय राम रूप अनूप निर्गुन सगुन गुन प्रेरक सही। दससीस बाहु प्रचंड खंडन चंड सर मंडन मही॥ पाथोद गात सरोज मुख राजीव आयत लोचनं। नित नौमि रामु कृपाल बाहु बिसाल भव भय मोचनं॥
हे रामजी! आपकी जय हो। आपका रूप अनुपम है, आप निर्गुन हैं, सगुन हैं और सत्य ही गुणोंके (मायाके) प्रेरक हैं। दस सिरवाले रावणकी प्रचण्ड भुजाओंको खण्ड-खण्ड करनेके लिये प्रचण्ड बाण धारण करनेवाले, पृथ्वीको सुशोभित करनेवाले, जलयुक्त मेघके समान श्याम शरीरवाले, कमलके समान मुख और [लाल] कमलके समान विशाल नेत्रोंवाले, विशाल भुजाओंवाले और भव-भयसे छुड़ानेवाले कृपालु श्रीरामजीको मैं नित्य नमस्कार करता हूँ॥ १ ॥
६६४
- रामचरितमानस *
बलमप्रमेयमनादिमजमव्यक्तमेकमगोचरं । गोबिंद गोपर द्वंद्वहर बिग्यानघन धरनीधरं ॥ जे राम मंत्र जपंत संत अनंत जन मन रंजनं । नित नौमि राम अकाम प्रिय कामादि खल दल गंजनं ॥ २ ॥
आप अपरिमित बलवाले हैं, अनादि, अजन्मा, अव्यक्त (निराकार), एक, अगोचर (अलक्ष्य), गोविन्द (वेदवाक्योंद्वारा जाननेयोग्य), इन्द्रियोंसे अतीत, [जन्म-मरण, सुख-दुःख, हर्ष-शोकादि] द्वन्द्वोंको हरनेवाले, विज्ञानकी घनमूर्ति और पृथ्वीके आधार हैं तथा जो संत राम-मन्त्रको जपते हैं, उन अनन्त सेवकोंके मनको आनन्द देनेवाले हैं। उन निष्कामप्रिय (निष्कामजनोंके प्रेमी अथवा उन्हें प्रिय) तथा काम आदि दुष्टों (दुष्ट-वृत्तियों) के दलका दलन करनेवाले श्रीरामजीको मैं नित्य नमस्कार करता हूँ ॥ २ ॥
जेहि श्रुति निरंजन ब्रह्म व्यापक बिरज अज कहि गावहीं । करि ध्यान ग्यान बिराग जोग अनेक मुनि जेहि पावहीं ॥ सो प्रगट करुना कंद सोभा बूंद अग जग मोहई । मम हृदय पंकज भूंग अंग अनंग बहु छवि सोहई ॥ ३ ॥
जिनको श्रुतियाँ निरञ्जन (मायासे परे), ब्रह्म, व्यापक, निर्विकार और जन्मरहित कहकर गान करती हैं। मुनि जिन्हें ध्यान, ज्ञान, वैराग्य और योग आदि अनेक साधन करके पाते हैं। वे ही करुणाकन्द, शोभाके समूह [स्वयं श्रीभगवान्] प्रकट होकर जड़-चेतन समस्त जगत्को मोहित कर रहे हैं। मेरे हृदय-कमलके भ्रमररूप उनके अंग-अंगमें बहुत-से कामदेवोंकी छवि शोभा पा रही है ॥ ३ ॥
जो अगम सुगम सुभाव निर्मल असम सम सीतल सदा । परस्यंति जं जोगी जतन करि करत मन गो बस सदा ॥ सो राम रमा निवास संतत दास बस त्रिभुवन धनी । मम उर बसउ सो समन संसृति जासु कीरति पावनी ॥ ४ ॥
जो अगम और सुगम हैं, निर्मलस्वभाव हैं, विषम और सम हैं और सदा शीतल (शान्त) हैं। मन और इन्द्रियोंको सदा वशमें करते हुए योगी बहुत साधन करनेपर जिन्हें देख पाते हैं, वे तीनों लोकोंके स्वामी, रमानिवास श्रीरामजी निरन्तर अपने दासोंके वशमें रहते हैं, वे ही मेरे हृदयमें निवास करें, जिनकी पवित्र कीर्ति आवागमनको मिटानेवाली है ॥ ४ ॥
- अरण्यकाण्ड *
६६५
दो०—अबिरल भगति मागि बर गीध गयउ हरिधाम।
तेहि की क्रिया जथोचित निज कर कीन्ही राम ॥ ३२ ॥
अखण्ड भक्तिका वर माँगकर गृध्राज जटायु श्रीहरिके परमधामको चला गया। श्रीरामचन्द्रजीने उसकी [दाहकर्म आदि सारी] क्रियाएँ यथायोग्य अपने हाथोंसे कीं ॥ ३२ ॥
कोमल चित अति दीनदयाला। कारण बिनु रघुनाथ कृपाला ॥ गीध अधम खग आमिष भोगी। गति दीन्ही जो जाचत जोगी ॥
श्रीरघुनाथजी अत्यन्त कोमल चित्तवाले, दीनदयालु और बिना ही कारण कृपालु हैं। गीध [पक्षियोंमें भी] अधम पक्षी और मांसाहारी था, उसको भी वह दुर्लभ गति दी, जिसे योगीजन माँगते रहते हैं ॥ १ ॥
सुनहु उमा ते लोग अभागी। हरि तजि होहि बिषय अनुरागी ॥ पुनि सीतहि खोजत द्वौ भाई। चले बिलोकत बन बहुताई ॥
[शिवजी कहते हैं—] हे पार्वती! सुनो, वे लोग अभागे हैं जो भगवान्को छोड़कर विषयोंसे अनुराग करते हैं। फिर दोनों भाई सीताजीको खोजते हुए आगे चले। वे वनकी सघनता देखते जाते हैं ॥ २ ॥
संकुल लता बिटप घन कानन। बहु खग मृग तहाँ गज पंचानन ॥ आवत पंथ कबंध निपाता। तेहिं सब कही साप कै बाता ॥
वह सघन वन लताओं और वृक्षोंसे भरा है। उसमें बहुत-से पक्षी, मृग, हाथी और सिंह रहते हैं। श्रीरामजीने रास्तेमें आते हुए कबंध राक्षसको मार डाला। उसने अपने शापकी सारी बात कही ॥ ३ ॥
दुरबासा मोहि दीन्ही सापा। प्रभु पद पेखि मिटा सो पापा ॥ सुनु गंधर्व कहउँ मैं तोही। मोहि न सोहाइ ब्रह्मकुल द्रोही ॥
[वह बोला—] दुर्वासाजीने मुझे शाप दिया था। अब प्रभुके चरणोंको देखनेसे वह पाप मिट गया। [श्रीरामजीने कहा—] हे गन्धर्व! सुनो, मैं तुम्हें कहता हूँ, ब्राह्मणकुलसे द्रोह करनेवाला मुझे नहीं सुहाता ॥ ४ ॥
दो०—मन क्रम बचन कपट तजि जो कर भूसुर सेव।
मोहि समेत बिरंचि सिव बस ताकें सब देव ॥ ३३ ॥
मन, वचन और कर्मसे कपट छोड़कर जो भूदेव ब्राह्मणोंकी सेवा करता है, मुझसमेत ब्रह्मा, शिव आदि सब देवता उसके वशमें हो जाते हैं ॥ ३३ ॥
६६६
- रामचरितमानस *
सापत ताड़त परुष कहंता। बिप्र पूज्य अस गावहिं संता॥ पूजिअ बिप्र सील गुन हीना। सूद्र न गुन गन ग्यान प्रबीना॥
शाप देता हुआ, मारता हुआ और कठोर वचन कहता हुआ भी ब्राह्मण पूजनीय है, ऐसा संत कहते हैं। शील और गुणसे हीन भी ब्राह्मण पूजनीय है। और गुणगणोंसे युक्त और ज्ञानमें निपुण भी शूद्र पूजनीय नहीं है ॥ १ ॥
कहि निज धर्म ताहि समुझावा। निज पद प्रीति देखि मन भावा॥ रघुपति चरन कमल सिरु नाई। गयउ गगन आपनि गति पाई॥
श्रीरामजीने अपना धर्म (भागवत-धर्म) कहकर उसे समझाया। अपने चरणोंमें प्रेम देखकर वह उनके मनको भाया। तदनन्तर श्रीरघुनाथजीके चरणकमलोंमें सिर नवाकर वह अपनी गति (गन्धर्वका स्वरूप) पाकर आकाशमें चला गया ॥ २ ॥
ताहि देइ गति राम उदारा। सबरी कें आश्रम पगु धारा॥ सबरी देखि राम गृहँ आए। मुनि के बचन समुझि जियँ भाए॥
उदार श्रीरामजी उसे गति देकर शबरीजीके आश्रममें पधारे। शबरीजीने श्रीरामचन्द्रजीको घरमें आये देखा, तब मुनि मतङ्गजीके वचनोंको याद करके उनका मन प्रसन्न हो गया ॥ ३ ॥
सरसिज लोचन बाहु बिसाला। जटा मुकुट सिर उर बनमाला॥ स्याम गौर सुंदर दोउ भाई। सबरी परी चरन लपटाई॥
कमल-सदृश नेत्र और विशाल भुजावाले, सिरपर जटाओंका मुकुट और हृदयपर बनमाला धारण किये हुए सुन्दर साँवले और गौरे दोनों भाइयोंके चरणोंमें शबरीजी लिपट पड़ीं ॥ ४ ॥
प्रेम मगन मुख बचन न आवा। पुनि पुनि पद सरोज सिर नावा॥ सादर जल लै चरन पखारे। पुनि सुंदर आसन बैठारे॥
वे प्रेममें मग्न हो गयीं, मुखसे वचन नहीं निकलता। बार-बार चरण-कमलोंमें सिर नवा रही हैं। फिर उन्होंने जल लेकर आदरपूर्वक दोनों भाइयोंके चरण धोये और फिर उन्हें सुन्दर आसनोंपर बैठाया ॥ ५ ॥
दो०—कंद मूल फल सुरस अति दिए राम कहुँ आनि।
प्रेम सहित प्रभु खाए बारंबार बखानि ॥ ३४ ॥
उन्होंने अत्यन्त रसीले और स्वादिष्ट कन्द, मूल और फल लाकर श्रीरामजीको दिये। प्रभुने बार-बार प्रशंसा करके उन्हें प्रेमसहित खाया ॥ ३४ ॥
पानि जोरि आगें भड़ ठाढ़ी। प्रभुहि बिलोकि प्रीति अति बाढ़ी॥ केहि बिधि अस्तुति करौं तुम्हारी। अधम जाति मैं जड़मति भारी॥
- अरण्यकाण्ड *
६६७
फिर वे हाथ जोड़कर आगे खड़ी हो गयीं। प्रभुको देखकर उनका प्रेम अत्यन्त बढ़ गया। [उन्होंने कहा—] मैं किस प्रकार आपकी स्तुति करूँ? मैं नीच जातिकी और अत्यन्त मूढ़बुद्धि हूँ ॥ १ ॥
अधम ते अधम अधम अति नारी । तिन्ह महँ मैं मतिमंद अघारी ॥ कह रघुपति सुनु भामिनि बाता । मानउँ एक भगति कर नाता ॥
जो अधमसे भी अधम हैं, स्त्रियाँ उनमें भी अत्यन्त अधम हैं; और उनमें भी हे पापनाशन! मैं मन्दबुद्धि हूँ। श्रीरघुनाथजीने कहा—हे भामिनि! मेरी बात सुन। मैं तो केवल एक भक्तिहीका सम्बन्ध मानता हूँ ॥ २ ॥
जाति पाँति कुल धर्म बड़ाई । धन बल परिजन गुन चतुराई ॥ भगति हीन नर सोहड़ कैसा । बिनु जल बारिद देखिअ जैसा ॥
जाति, पाँति, कुल, धर्म, बड़ाई, धन, बल, कुटुम्ब, गुण और चतुरता—इन सबके होनेपर भी भक्तिसे रहित मनुष्य कैसा लगता है, जैसे जलहीन बादल [शोभाहीन] दिखायी पड़ता है ॥ ३ ॥
नवधा भगति कहउँ तोहि पाहीं । सावधान सुनु धरु मन माहीं ॥ प्रथम भगति संतन्ह कर संगा । दूसरि रति मम कथा प्रसंगा ॥
मैं तुझसे अब अपनी नवधा भक्ति कहता हूँ। तू सावधान होकर सुन और मनमें धारण कर। पहली भक्ति है संतोका सत्संग। दूसरी भक्ति है मेरे कथा-प्रसंगमें प्रेम ॥ ४ ॥
दो०—गुर पद पंकज सेवा तीसरि भगति अमान ।
चौथि भगति मम गुन गन करइ कपट तजि गान ॥ ३५ ॥
तीसरी भक्ति है अभिमानरहित होकर गुरुके चरणकमलोंकी सेवा और चौथी भक्ति यह है कि कपट छोड़कर मेरे गुणसमूहोंका गान करे ॥ ३५ ॥
मंत्र जाप मम दृढ़ बिस्वासा । पंचम भजन सो बेद प्रकासा ॥ छठ दम सील बिरति बहु करमा । निरत निरंतर सज्जन धरमा ॥
मेरे (राम) मन्त्रका जाप और मुझमें दृढ़ विश्वास—यह पाँचवीं भक्ति है, जो वेदोंमें प्रसिद्ध है। छठी भक्ति है इन्द्रियोंका निग्रह, शील (अच्छा स्वभाव या चरित्र), बहुत कार्योंसे वैराग्य और निरंतर संत पुरुषोंके धर्म (आचरण) में लगे रहना ॥ १ ॥
सातवँ सम मोहि मय जग देखा । मोतें संत अधिक करि लेखा ॥ आठवँ जथालाभ संतोषा । सपनेहूँ नहिँ देखइ परदोषा ॥
६६८
- रामचरितमानस *
सातवीं भक्ति है जगत्भरको समभावसे मुझमें ओतप्रोत (राममय) देखना और संतोंको मुझसे भी अधिक करके मानना। आठवीं भक्ति है जो कुछ मिल जाय उसीमें संतोष करना और स्वप्नमें भी पराये दोषोंको न देखना ॥ २ ॥
नवम सरल सब सन छलहीना । मम भरोस हिर्घै हरष न दीना ॥ नव महुँ एकउ जिन्ह कें होई । नारि पुरुष सचराचर कोई ॥
नवीं भक्ति है सरलता और सबके साथ कपटरहित बर्ताव करना, हृदयमें मेरा भरोसा रखना और किसी भी अवस्थामें हर्ष और दैन्य (विषाद) का न होना। इन नवोंमेंसे जिनके एक भी होती है, वह स्त्री-पुरुष, जड़-चेतन कोई भी हो— ॥ ३ ॥
सोइ अतिसय प्रिय भामिनि मोरें । सकल प्रकार भगति दृढ़ तोरें ॥ जोगि बृंद दुरलभ गति जोई । तो कहुँ आजु सुलभ भइ सोई ॥
हे भामिनि! मुझे वही अत्यन्त प्रिय है। फिर तुझमें तो सभी प्रकारकी भक्ति दृढ़ है। अतएव जो गति योगियोंको भी दुर्लभ है, वही आज तेरे लिये सुलभ हो गयी है ॥ ४ ॥
मम दरसन फल परम अनूपा । जीव पाव निज सहज सरूपा ॥ जनकसुता कइ सुधि भामिनी । जानहि कहु करिबरगामिनी ॥
मेरे दर्शनका परम अनुपम फल यह है कि जीव अपने सहज स्वरूपको प्राप्त हो जाता है। हे भामिनि! अब यदि तू गजगामिनी जानकीकी कुछ खबर जानती हो तो बता ॥ ५ ॥
पंपा सरहि जाहु रघुराई । तहाँ होइहि सुग्रीव मितार्ई ॥ सो सब कहिहि देव रघुबीरा । जानतहूँ पूछहु मतिधीरा ॥
[शबरीने कहा—] हे रघुनाथजी! आप पंपा नामक सरोवरको जाइये, वहाँ आपकी सुग्रीवसे मित्रता होगी। हे देव! हे रघुवीर! वह सब हाल बतावेगा। हे धीरबुद्धि! आप सब जानते हुए भी मुझसे पूछते हैं! ॥ ६ ॥
बार बार प्रभु पद सिरु नाई । प्रेम सहित सब कथा सुनाई ॥
बार-बार प्रभुके चरणोंमें सिर नवाकर, प्रेमसहित उसने सब कथा सुनायी ॥ ७ ॥
छं०—कहि कथा सकल बिलोकि हरि मुख हृदयँ पद पंकज धरे । तजि जोग पावक देह हरि पद लीन भइ जहँ नहिं फिरे ॥ नर बिबिध कर्म अधर्म बहु मत सोकप्रद सब त्यागहू । बिस्वास करि कह दास तुलसी राम पद अनुरागहू ॥
- अरण्यकाण्ड *
६६१
सब कथा कहकर भगवान् के मुखके दर्शन कर, हृदयमें उनके चरणकमलोंको धारण कर लिया और योगाग्निसे देहको त्यागकर (जलाकर) वह उस दुर्लभ हरिपदमें लीन हो गयी, जहाँसे लौटना नहीं होता। तुलसीदासजी कहते हैं कि अनेकों प्रकारके कर्म, अधर्म और बहुत-से मत—ये सब शोकप्रद हैं; हे मनुष्यो! इनका त्याग कर दो और विश्वास करके श्रीरामजीके चरणोंमें प्रेम करो।
दो०—जाति हीन अघ जन्म महि मुक्त कीन्हि असि नारि।
महामंद मन सुख चहसि ऐसे प्रभुहि बिसारि ॥ ३६ ॥
जो नीच जातिकी और पापोंकी जन्मभूमि थी, ऐसी स्त्रीको भी जिन्होंने मुक्त कर दिया, अरे महादुर्बुद्धि मन! तू ऐसे प्रभुको भूलकर सुख चाहता है ? ॥ ३६ ॥
चले राम त्यागा बन सोऊ। अतुलित बल नर केहरि दोऊ ॥
बिरही इव प्रभु करत बिषादा। कहत कथा अनेक संबादा ॥
श्रीरामचन्द्रजीने उस वनको भी छोड़ दिया और वे आगे चले। दोनों भाई अतुलनीय बलवान् और मनुष्योंमें सिंहके समान हैं। प्रभु विरहीकी तरह विषाद करते हुए अनेकों कथाएँ और संवाद कहते हैं— ॥ १ ॥
लछिमन देखु बिपिन कइ सोभा। देखत केहि कर मन नहिं छोभा ॥
नारि सहित सब खग मृग बृंदा। मानहुँ मोरि करत हहिं निंदा ॥
हे लक्ष्मण! जरा वनकी शोभा तो देखो। इसे देखकर किसका मन शुब्ध नहीं होगा? पक्षी और पशुओंके समूह सभी स्त्रीसहित हैं। मानो वे मेरी निन्दा कर रहे हैं ॥ २ ॥
हमहि देखि मृग निकर पराहीं। मूर्गी कहहिं तुम्ह कहँ भय नाहीं ॥
तुम्ह आनंद करहु मृग जाए। कंचन मृग खोजन ए आए ॥
हमें देखकर [जब डरके मारे] हिरनोंके झुंड भागने लगते हैं, तब हिरनियाँ उनसे कहती हैं— तुमको भय नहीं है। तुम तो साधारण हिरनोंसे पैदा हुए हो, अतः तुम आनन्द करो। ये तो सोनेका हिरन खोजने आये हैं ॥ ३ ॥
संग लाड़ करिनीं करि लेहीं। मानहुँ मोहि सिखावनु देहीं ॥
सास्त्र सुचिंतित पुनि पुनि देखिअ। भूप सुसेवित बस नहिं लेखिअ ॥
हाथी हथिनियोंको साथ लगा लेते हैं। वे मानो मुझे शिक्षा देते हैं [कि स्त्रीको कभी अकेली नहीं छोड़ना चाहिये]। भलीभाँति चिन्तन किये हुए शास्त्रको भी बार-बार देखते रहना चाहिये।
अच्छी तरह सेवा किये हुए भी राजाको वशमें नहीं समझना चाहिये ॥ ४ ॥
राखिअ नारि जदपि उर माहीं। जुबती सास्त्र नृपति बस नाहीं ॥
देखहु तात बसंत सुहावा। प्रिया हीन मोहि भय उपजावा ॥
६७०
- रामचरितमानस *
और स्त्रीको चाहे हृदयमें ही क्यों न रखा जाय; परन्तु युवती स्त्री, शास्त्र और राजा किसीके वशमें नहीं रहते। हे तात! इस सुन्दर वसन्तको तो देखो। प्रियाके बिना मुझको यह भय उत्पन्न कर रहा है ॥ ५ ॥
दो०—बिरह बिकल बलहीन मोहि जानेसि निपट अकेल।
सहित बिपिन मधुकर खग मदन कीन्ह बगमेल ॥ ३७ ( क ) ॥
मुझे विरहसे व्याकुल, बलहीन और बिलकुल अकेला जानकर कामदेवने वन, भौरों और पक्षियोंको साथ लेकर मुझपर धावा बोल दिया ॥ ३७ ( क ) ॥
देखि गयउ भ्राता सहित तासु दूत सुनि बात।
डेरा कीन्हेटु मनहुँ तब कटकु हटकि मनजात ॥ ३७ ( ख ) ॥
परन्तु जब उसका दूत यह देख गया कि मैं भाईके साथ हूँ (अकेला नहीं हूँ), तब उसकी बात सुनकर कामदेवने मानो सेनाको रोककर डेरा डाल दिया है ॥ ३७ ( ख ) ॥
बिटप बिसाल लता अरुझानी । बिबिध बितान दिए जनु तानी ॥
कदलि ताल बर धुजा पताका । देखि न मोह धीर मन जाका ॥
विशाल वृक्षोंमें लताएँ उलझी हुई ऐसी मालूम होती हैं मानो नाना प्रकारके तंबू तान दिये गये हैं। केला और ताड़ सुन्दर ध्वजा-पताकाके समान हैं। इन्हें देखकर वही नहीं मोहित होता जिसका मन धीर है ॥ १ ॥
बिबिध भाँति फूले तरु नाना । जनु बनैत बने बहु बाना ॥
कहुँ कहुँ सुंदर बिटप सुहाए । जनु भट बिलग बिलग होइ छाए ॥
अनेकों वृक्ष नाना प्रकारसे फूले हुए हैं। मानो अलग-अलग बाना (वर्दी) धारण किये हुए बहुत-से तीरंदाज हों। कहीं-कहीं सुन्दर वृक्ष शोभा दे रहे हैं। मानो योद्धालोग अलग-अलग होकर छावनी डाले हों ॥ २ ॥
कूजत पिक मानहुँ गज माते । ठेक महोख ऊंट बिसराते ॥
मोर चकोर कीर बर बाजी । पारावत मराल सब ताजी ॥
कोयलें कूज रही हैं, वही मानो मतवाले हाथी [चिग्गाड़ रहे] हैं। ठेक और महोख पक्षी मानो ऊंट और खच्चर हैं। मोर, चकोर, तोते, कबूतर और हंस मानो सब सुन्दर ताजी (अरबी) घोड़े हैं ॥ ३ ॥
तीतिर लावक पदचर जूथा । बरनि न जाइ मनोज बरुथा ॥
रथ गिरि सिला दुंदुभीं झरना । चातक बंदी गुन गन बरना ॥
- अरण्यकाण्ड *
६७१
तीतर और बटेर पैदल सिपाहियोंके झुंड हैं। कामदेवकी सेनाका वर्णन नहीं हो सकता। पर्वतोंकी शिलाएँ रथ और जलके झरने नगाड़े हैं। पपीहे भाट हैं, जो गुणसमूह (विरदावली) का वर्णन करते हैं ॥ ४ ॥
मधुकर मुखर भेरि सहनाई। त्रिबिध बयारि बसीठीं आई॥ चतुरंगिनी सेन सँग लीन्हें। बिचरत सबहि चुनौती दीन्हें॥
भौरोंकी गुंजार भेरी और शहनाई है। शीतल, मन्द और सुगन्धित हवा मानो दूतका काम लेकर आयी है। इस प्रकार चतुरङ्गिनी सेना साथ लिये कामदेव मानो सबको चुनौती देता हुआ विचर रहा है ॥ ५ ॥
लछिमन देखत काम अनीका। रहहिं धीर तिन्ह कै जग लीका॥ एहि कें एक परम बल नारी। तेहि तें उबर सुभट सोड़ भारी॥
हे लक्ष्मण! कामदेवकी इस सेनाको देखकर जो धीर बने रहते हैं, जगत्में उन्हींकी [वीरोंमें] प्रतिष्ठा होती है। इस कामदेवके एक स्त्रीका बड़ा भारी बल है। उससे जो बच जाय, वही श्रेष्ठ योद्धा है ॥ ६ ॥
दो०—तात तीनि अति प्रबल खल काम क्रोध अरु लोभ।
मुनि बिग्यान धाम मन करहिं निमिष महूँ छोभ॥ ३८ ( क )॥
हे तात! काम, क्रोध और लोभ—ये तीन अत्यन्त प्रबल दुष्ट हैं। ये विज्ञानके धाम मुनियोंके भी मनोंको पलभरमें क्षुब्ध कर देते हैं ॥ ३८ ( क ) ॥
लोभ कें इच्छा दंभ बल काम कें केवल नारि।
क्रोधकें परुष बचन बल मुनिबर कहहिं बिचारि॥ ३८ ( ख )॥
लोभको इच्छा और दम्भका बल है, कामको केवल स्त्रीका बल है और क्रोधको कठोर वचनोंका बल है; श्रेष्ठ मुनि विचारकर ऐसा कहते हैं ॥ ३८ ( ख ) ॥
गुनातीत सचराचर स्वामी। राम उमा सब अंतरजामी॥ कामिन्ह कै दीनता देखाई। धीरन्ह कें मन बिरति दृढ़ाई॥
[शिवजी कहते हैं—] हे पार्वती! श्रीरामचन्द्रजी गुणातीत (तीनों गुणोंसे परे), चराचर जगत्के स्वामी और सबके अन्तरकी जाननेवाले हैं। [उपर्युक्त बातें कहकर] उन्होंने कामी लोगोंकी दीनता (बेबसी) दिखलायी है और धीर (विवेकी) पुरुषोंके मनमें वैराग्यको दृढ़ किया है ॥ १ ॥
क्रोध मनोज लोभ मद माया। छूटहिं सकल राम कीं दाय। सो नर इंद्रजाल नहीं भूला। जा पर होड़ सो नट अनुकूला॥
६७२
- रामचरितमानस *
क्रोध, काम, लोभ, मद और माया—ये सभी श्रीरामजीकी दयासे छूट जाते हैं। वह नट (नटराजभगवान्) जिसपर प्रसन्न होता है, वह मनुष्य इन्द्रजाल (माया) में नहीं भूलता ॥ २ ॥
उमा कहउँ मैं अनुभव अपना । सत हरि भजनु जगत सब सपना ॥ पुनि प्रभु गए सरोबर तीरा । पंपा नाम सुभग गंभीरा ॥
हे उमा! मैं तुम्हें अपना अनुभव कहता हूँ—हरिका भजन ही सत्य है, यह सारा जगत् तो स्वप्न [की भाँति झूठा] है। फिर प्रभु श्रीरामजी पंपा नामक सुन्दर और गहरे सरोवरके तीरपर गये ॥ ३ ॥
संत हृदय जस निर्मल बारी । बाँधे घाट मनोहर चारी ॥ जहँ तहँ पिअहिँ बिबिध मृग नीरा । जनु उदार गूह जाचक भीरा ॥
उसका जल संतोंके हृदय-जैसा निर्मल है। मनको हरनेवाले सुन्दर चार घाट बँधे हुए हैं। भाँति-भाँतिके पशु जहाँ-तहाँ जल पी रहे हैं। मानो उदार दानी पुरुषोंके घर याचकोंकी भीड़ लगी हो! ॥ ४ ॥
दो०—पुरड़नि सघन ओट जल बेगि न पाड़अ मर्म ।
मायाछन्न न देखिए जैसे निर्गुन ब्रह्म ॥ ३९ (क) ॥
घनी पुरड़नों (कमलके पत्तों)-की आड़में जलका जल्दी पता नहीं मिलता। जैसे मायासे ढके रहनेके कारण निर्गुन ब्रह्म नहीं दीखता ॥ ३९ (क) ॥
सुखी मीन सब एकरस अति अगाध जल माहिँ ।
जथा धर्मसीलन्ह के दिन सुख संजुत जाहिँ ॥ ३९ (ख) ॥
उस सरोवरके अत्यन्त अथाह जलमें सब मछलियाँ सदा एकरस (एक समान) सुखी रहती हैं। जैसे धर्मशील पुरुषोंके सब दिन सुखपूर्वक बीतते हैं ॥ ३९ (ख) ॥
बिकसे सरसिज नाना रंगा । मधुर मुखर गुंजत बहु भूंगा ॥
बोलत जलकुक्कुट कलहंसा । प्रभु बिलोकि जनु करत प्रसंसा ॥
उसमें रंग-बिरंगे कमल खिले हुए हैं। बहुत-से भौर मधुर स्वरसे गुंजार कर रहे हैं। जलके मुर्गे और राजहंस बोल रहे हैं, मानो प्रभुको देखकर उनकी प्रशंसा कर रहे हों ॥ १ ॥
चक्रबाक बक खग समुदाई । देखत बनइ बरनि नहिं जाई ॥
सुंदर खग गन गिरा सुहाई । जात पथिक जनु लेत बोलाई ॥
चक्रवाक, बगुले आदि पक्षियोंका समुदाय देखते ही बनता है, उनका वर्णन नहीं किया जा सकता। सुन्दर पक्षियोंकी बोली बड़ी सुहावनी लगती है, मानो [रास्तेमें] जाते हुए पथिकको
- अरण्यकाण्ड *
६७३
बुलाये लेती हो ॥ २ ॥
ताल समीप मुनिन्ह गृह छाए । चहु दिसि कानन बिटप सुहाए ॥ चंपक बकुल कदंब तमाला । पाटल पनस परास रसाला ॥
उस झील (पंपासरोवर) के समीप मुनियोंने आश्रम बना रखे हैं। उसके चारों ओर बनके सुन्दर वृक्ष हैं। चम्पा, मौलसिरी, कदम्ब, तमाल, पाटल, कटहल, ढाक और आम आदि— ॥ ३ ॥
नव पल्लव कुसुमित तरु नाना । चंचरीक पटली कर गाना ॥ सीतल मंद सुगंध सुभाऊ । संतत बहड़ मनोहर बाऊ ॥
बहुत प्रकारके वृक्ष नये-नये पत्तों और [सुगन्धित] पुष्पोंसे युक्त हैं, [जिनपर] भौरोंके समूह गुंजार कर रहे हैं। स्वभावसे ही शीतल, मन्द, सुगन्धित एवं मनको हरनेवाली हवा सदा बहती रहती है ॥ ४ ॥
कुहू कुहू कोकिल धुनि करहीं । सुनि रव सरस ध्यान मुनि टरहीं ॥
कोयलें 'कुहू' 'कुहू' का शब्द कर रही हैं। उनकी रसीली बोली सुनकर मुनियोंका भी ध्यान टूट जाता है ॥ ५ ॥
दो०—फल भारन नमि बिटप सब रहे भूमि निअराइ ।
पर उपकारी पुरुष जिमि नवहँ सुसंपति पाइ ॥ ४० ॥
फलोंके बोझसे झुककर सारे वृक्ष पृथ्वीके पास आ लगे हैं, जैसे परोपकारी पुरुष बड़ी सम्पत्ति पाकर [विनयसे] झुक जाते हैं ॥ ४० ॥
देखि राम अति रुचिर तलावा । मज्जनु कीन्ह परम सुख पावा ॥
देखी सुंदर तरुबर छाया । बैठे अनुज सहित रघुराया ॥
श्रीरामजीने अत्यन्त सुन्दर तालाब देखकर स्नान किया और परम सुख पाया। एक सुन्दर उत्तम वृक्षकी छाया देखकर श्रीरघुनाथजी छोटे भाई लक्ष्मणजीसहित बैठ गये ॥ १ ॥
तहँ पुनि सकल देव मुनि आए । अस्तुति करि निज धाम सिधाए ॥
बैठे परम प्रसन्न कृपाला । कहत अनुज सन कथा रसाला ॥
फिर वहाँ सब देवता और मुनि आये और स्तुति करके अपने-अपने धामको चले गये। कृपालु श्रीरामजी परम प्रसन्न बैठे हुए छोटे भाई लक्ष्मणजीसे रसीली कथाएँ कह रहे हैं ॥ २ ॥
बिरहवंत भगवंतहि देखी । नारद मन भा सोच बिसेषी ॥
मोर साप करि अंगीकारा । सहत राम नाना दुख भारा ॥
भगवान्को विरहयुक्त देखकर नारदजीके मनमें विशेषरूपसे सोच हुआ। [उन्होंने विचार किया कि] मेरे ही शापको स्वीकार करके श्रीरामजी नाना प्रकारके दुःखोंका भार सह रहे हैं
६७४
- रामचरितमानस *
(दुःख उठा रहे हैं) ॥ ३ ॥
ऐसे प्रभुहि बिलोकऊँ जाई । पुनि न बनिहि अस अवसरु आई ॥ यह बिचारि नारद कर बीना । गए जहाँ प्रभु सुख आसीना ॥
ऐसे (भक्तवत्सल) प्रभुको जाकर देखूँ। फिर ऐसा अवसर न बन आवेगा। यह विचारकर नारदजी हाथमें वीणा लिये हुए वहाँ गये, जहाँ प्रभु सुखपूर्वक बैठे हुए थे ॥ ४ ॥
गावत राम चरित मृदु बानी । प्रेम सहित बहु भाँति बखानी ॥ करत दंडवत लिए उठाई । राखे बहुत बार उर लाई ॥
वे कोमल वाणीसे प्रेमके साथ बहुत प्रकारसे बखान-बखानकर रामचरितका गान कर [ते हुए चले आ] रहे थे। दण्डवत् करते देखकर श्रीरामचन्द्रजीने नारदजीको उठा लिया और बहुत देरतक हृदयसे लगाये रखा ॥ ५ ॥
स्वागत पूँछि निकट बैठारे । लछिमन सादर चरन पखारे ॥
फिर स्वागत (कुशल) पूछकर पास बैठा लिया। लक्ष्मणजीने आदरके साथ उनके चरण धोये ॥ ६ ॥
दो०—नाना बिधि बिनती करि प्रभु प्रसन्न जियँ जानि ।
नारद बोले बचन तब जोरि सरोरुह पानि ॥ ४१ ॥
बहुत प्रकारसे विनती करके और प्रभुको मनमें प्रसन्न जानकर तब नारदजी कमलके समान हाथोंको जोड़कर वचन बोले— ॥ ४१ ॥
सुनहु उदार सहज रघुनायक । सुंदर अगम सुगम बर दायक ॥ देहु एक बर मागउँ स्वामी । जद्यपि जानत अंतरजामी ॥
हे स्वभावसे ही उदार श्रीरघुनाथजी! सुनिये। आप सुन्दर अगम और सुगम वरके देनेवाले हैं। हे स्वामी! मैं एक वर माँगता हूँ, वह मुझे दीजिये, यद्यपि आप अन्तर्यामी होनेके नाते सब जानते ही हैं ॥ १ ॥
जानहु मुनि तुम्ह मोर सुभाऊ । जन सन कबहुँ कि करउँ दुराऊ ॥ कवन बस्तु असि प्रिय मोहि लागी । जो मुनिबर न सकहु तुम्ह मागी ॥
[श्रीरामजीने कहा—] हे मुनि! तुम मेरा स्वभाव जानते ही हो। क्या मैं अपने भक्तोंसे कभी कुछ छिपाव करता हूँ? मुझे ऐसी कौन-सी वस्तु प्रिय लगती है, जिसे हे मुनिश्रेष्ठ! तुम नहीं माँग सकते? ॥ २ ॥
जन कहँ कछु अदेय नहिं मोरें । अस बिस्वास तजहु जनि भोरें ॥
- अरण्यकाण्ड *
६७५
तब नारद बोले हरषाई। अस बर मागउँ करउँ ढिठाई॥
मुझे भक्तके लिये कुछ भी अदेय नहीं है। ऐसा विश्वास भूलकर भी मत छोड़ो। तब नारदजी हर्षित होकर बोले—मैं ऐसा वर माँगता हूँ, यह धृष्टता करता हूँ—॥ ३ ॥
जद्यपि प्रभु के नाम अनेका। श्रुति कह अधिक एक तें एका॥
राम सकल नामन्ह तें अधिका। होउ नाथ अघ खग गन बधिका॥
यद्यपि प्रभुके अनेकों नाम हैं और वेद कहते हैं कि वे सब एक-से-एक बढ़कर हैं, तो भी हे नाथ! रामनाम सब नामोंसे बढ़कर हो और पापरूपी पक्षियोंके समूहके लिये यह बधिकके समान हो॥ ४ ॥
दो०—राका रजनी भगति तव राम नाम सोइ सोम।
अपर नाम उडगन बिमल बसहुँ भगत उर व्योम॥ ४२ ( क )॥
आपकी भक्ति पूर्णिमाकी रात्रि है; उसमें 'राम' नाम यही पूर्ण चन्द्रमा होकर और अन्य सब नाम तारागण होकर भक्तोंके हृदयरूपी निर्मल आकाशमें निवास करें॥ ४२ ( क )॥
एवमस्तु मुनि सन कहेउ कृपासिंधु रघुनाथ।
तब नारद मन हरष अति प्रभु पद नायउ माथ॥ ४२ ( ख )॥
कृपासागर श्रीरघुनाथजीने मुनिसे 'एवमस्तु' (ऐसा ही हो) कहा। तब नारदजीने मनमें अत्यन्त हर्षित होकर प्रभुके चरणोंमें मस्तक नवाया॥ ४२ ( ख )॥
अति प्रसन्न रघुनाथहि जानी। पुनि नारद बोले मृदु बानी॥
राम जबहिं प्रेरेउ निज माया। मोहेहु मोहि सुनहु रघुराया॥
श्रीरघुनाथजीको अत्यन्त प्रसन्न जानकर नारदजी फिर कोमल वाणी बोले—हे रामजी! हे रघुनाथजी! सुनिये, जब आपने अपनी मायाको प्रेरित करके मुझे मोहित किया था, ॥ १ ॥
तब बिबाह मैं चाहउँ कीन्हा। प्रभु केहि कारन करै न दीन्हा॥
सुनु मुनि तोहि कहउँ सहरोसा। भजहिं जे मोहि तजि सकल भरोसा॥
तब मैं विवाह करना चाहता था। हे प्रभु! आपने मुझे किस कारण विवाह नहीं करने दिया? [प्रभु बोले—] हे मुनि! सुनो, मैं तुम्हें हर्षके साथ कहता हूँ कि जो समस्त आशा-भरोसा छोड़कर केवल मुझको ही भजते हैं, ॥ २ ॥
करउँ सदा तिन्ह कै रखवारी। जिमि बालक राखइ महतारी॥
गह सिसु बच्छ अनल अहि धाई। तहाँ राखइ जननी अरगाई॥
६७६
- रामचरितमानस *
मैं सदा उनकी वैसे ही रखवाली करता हूँ जैसे माता बालककी रक्षा करती है। छोटा बच्चा जब दौड़कर आग और साँपको पकड़ने जाता है तो वहाँ माता उसे [अपने हाथों] अलग करके बचा लेती है ॥ ३ ॥
प्रौढ़ भएँ तेहि सुत पर माता। प्रीति करइ नहिं पाछिलि बाता ॥ मोरें प्रौढ़ तनय सम ग्यानी। बालक सुत सम दास अमानी ॥
सयाना हो जानेपर उस पुत्रपर माता प्रेम तो करती है, परन्तु पिछली बात नहीं रहती (अर्थात् मातृपरायण शिशुकी तरह फिर उसको बचानेकी चिन्ता नहीं करती; क्योंकि वह मातापर निर्भर न कर अपनी रक्षा आप करने लगता है)। ज्ञानी मेरे प्रौढ़ (सयाने) पुत्रके समान है और [तुम्हारे-जैसा] अपने बलका मान न करनेवाला सेवक मेरे शिशु पुत्रके समान है ॥ ४ ॥
जनहि मोर बल निज बल ताही। दुहु कहैं काम क्रोध रिपु आही ॥ यह बिचारि पंडित मोहि भजहीं। पाएहुँ ग्यान भगति नहिं तजहीं ॥
मेरे सेवकको केवल मेरा ही बल रहता है और उसे (ज्ञानीको) अपना बल होता है। पर काम-क्रोधरूपी शत्रु तो दोनोंके लिये हैं। [भक्तके शत्रुओंको मारनेकी जिम्मेवारी मुझपर रहती है, क्योंकि वह मेरे परायण होकर मेरा ही बल मानता है; परन्तु अपने बलको माननेवाले ज्ञानीके शत्रुओंका नाश करनेकी जिम्मेवारी मुझपर नहीं है।] ऐसा विचारकर पण्डितजन (बुद्धिमान् लोग) मुझको ही भजते हैं। वे ज्ञान प्राप्त होनेपर भी भक्तिको नहीं छोड़ते ॥ ५ ॥
दो०—काम क्रोध लोभादि मद प्रबल मोह कै धारि। तिन्ह महँ अति दारुन दुखद मायारूपी नारि ॥ ४३ ॥
काम, क्रोध, लोभ और मद आदि मोह (अज्ञान) की प्रबल सेना है। इनमें मायारूपिणी (मायाकी साक्षात् मूर्ति) स्त्री तो अत्यन्त दारुण दुःख देनेवाली है ॥ ४३ ॥
सुनु मुनि कह पुरान श्रुति संता। मोह बिपिन कहुँ नारि बसंता ॥ जप तप नेम जलाश्रय झारी। होइ ग्रीषम सोषइ सब नारी ॥
हे मुनि! सुनो, पुराण, वेद और संत कहते हैं कि मोहरूपी वन [को विकसित करने] के लिये स्त्री वसन्त ऋतुके समान है। जप, तप, नियमरूपी सम्पूर्ण जलके स्थानोंको स्त्री ग्रीष्मरूप होकर सर्वथा सोख लेती है ॥ १ ॥
काम क्रोध मद मत्सर भेका। इन्हहि हरषप्रद बरषा एका ॥ दुर्बासना कुमुद समुदाई। तिन्ह कहैं सरद सदा सुखदाई ॥
काम, क्रोध, मद और मत्सर (डाह) आदि मेढक हैं। इनको वर्षा-ऋतु होकर हर्ष प्रदान करनेवाली एकमात्र यही (स्त्री) है। बुरी वासनाएँ कुमुदोंके समूह हैं। उनको सदैव सुख देनेवाली यह शरद् ऋतु है ॥ २ ॥
- अरण्यकाण्ड *
६७७
धर्म सकल सरसीरुह बृंदा । होइ हिम तिन्हहि दहइ सुख मंदा ॥ पुनि ममता जवास बहुताई । पलुहइ नारि सिसिर रिनु पाई ॥
समस्त धर्म कमलोंके झुंड हैं। यह नीच (विषयजन्य) सुख देनेवाली स्त्री हिम-ऋतु होकर उन्हें जला डालती है। फिर ममतारूपी जवासका समूह (वन) स्त्रीरूपी शिशिर-ऋतुको पाकर हरा-भरा हो जाता है ॥ ३ ॥
पाप उलूक निकर सुखकारी । नारि निबिड़ रजनी अँधिआरी ॥ बुधि बल सील सत्य सब मीना । बनसी सम त्रिय कहहिं प्रबीना ॥
पापरूपी उल्लुओंके समूहके लिये यह स्त्री सुख देनेवाली घोर अन्धकारमयी रात्रि है। बुद्धि, बल, शील और सत्य—ये सब मछलियाँ हैं और उन [को फँसाकर नष्ट करने] के लिये स्त्री बंसीके समान है, चतुर पुरुष ऐसा कहते हैं ॥ ४ ॥
दो०—अवगुन मूल सूलप्रद प्रमदा सब दुख खानि। ताते कीन्ह निवारन मुनि मैं यह जियँ जानि ॥ ४४ ॥
युवती स्त्री अवगुणोंकी मूल, पीड़ा देनेवाली और सब दुःखोंकी खान है। इसलिये हे मुनि! मैंने जीमें ऐसा जानकर तुमको विवाह करनेसे रोका था ॥ ४४ ॥
मुनि रघुपति के बचन सुहाए । मुनि तन पुलक नयन भरि आए ॥ कहहु कवन प्रभु कै असि रीती । सेवक पर ममता अरु प्रीती ॥
श्रीरघुनाथजीके सुन्दर वचन सुनकर मुनिका शरीर पुलकित हो गया और नेत्र [प्रेमाश्रुओंके जलसे] भर आये। [वे मन-ही-मन कहने लगे—] कहो तो किस प्रभुकी ऐसी रीति है, जिसका सेवकपर इतना ममत्व और प्रेम हो ॥ १ ॥
जे न भजहिं अस प्रभु भ्रम त्यागी । ग्यान रंक नर मंद अभागी ॥ पुनि सादर बोले मुनि नारद । सुनुहु राम बिग्यान बिसारद ॥
जो मनुष्य भ्रमको त्यागकर ऐसे प्रभुको नहीं भजते, वे ज्ञानके कंगाल, दुर्बुद्धि और अभागे हैं। फिर नारद मुनि आदरसहित बोले—हे विज्ञान-विशारद श्रीरामजी! सुनिये— ॥ २ ॥
संतन्ह के लच्छन रघुबीरा । कहहु नाथ भव भंजन भीरा ॥ सुनु मुनि संतन्ह के गुन कहऊँ । जिन्ह ते मैं उन्ह कें बस रहऊँ ॥
हे रघुवीर! हे भव-भय (जन्म-मरणके भय)-का नाश करनेवाले मेरे नाथ! अब कृपा कर संतोंके लक्षण कहिये। [श्रीरामजीने कहा—] हे मुनि! सुनो, मैं संतोंके गुणोंको कहता हूँ, जिनके कारण मैं उनके वशमें रहता हूँ ॥ ३ ॥
६७८
- रामचरितमानस *
षट बिकार जित अनघ अकामा । अचल अकिंचन सुचि सुखधामा ॥ अमित बोध अनीह मितभोगी । सत्यसार कबि कोबिद जोगी ॥
वे संत [काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर—इन] छः विकारों (दोषों) को जीते हुए, पापरहित, कामनारहित, निश्चल (स्थिरबुद्धि), अकिञ्चन (सर्वत्यागी), बाहर-भीतरसे पवित्र, सुखके धाम, असीम ज्ञानवान्, इच्छारहित, मिताहारी, सत्यनिष्ठ, कवि, विद्वान्, योगी, ॥ ४ ॥
सावधान मानद मदहीना । धीर धर्म गति परम प्रबीना ॥
सावधान, दूसरोंको मान देनेवाले, अभिमानरहित, धैर्यवान्, धर्मके ज्ञान और आचरणमें अत्यन्त निपुण, ॥ ५ ॥
दो०—गुनागार संसार दुख रहित बिगत संदेह ।
तजि मम चरन सरोज प्रिय तिन्ह कहँ देह न गेह ॥ ४५ ॥
गुणोंके घर, संसारके दुःखोंसे रहित और सन्देहोंसे सर्वथा छूटे हुए होते हैं। मेरे चरणकमलोंको छोड़कर उनको न देह ही प्रिय होती है, न घर ही ॥ ४५ ॥
निज गुन श्रवन सुनत सकुचाहीं । पर गुन सुनत अधिक हरषाहीं ॥
सम सीतल नहीं त्यागहिं नीती । सरल सुभाउ सबहि सन प्रीती ॥
कानोंसे अपने गुण सुननेमें सकुचाते हैं, दूसरोंके गुण सुननेसे विशेष हर्षित होते हैं। सम और शीतल हैं, न्यायका कभी त्याग नहीं करते। सरलस्वभाव होते हैं और सभीसे प्रेम रखते हैं ॥ १ ॥
जप तप ब्रत दम संजम नेमा । गुरु गोबिंद बिप्र पद प्रेमा ॥
श्रद्धा छमा मयत्री दाय। मुदिता मम पद प्रीति अमाया ॥
वे जप, तप, ब्रत, दम, संजम और नियममें रत रहते हैं और गुरु, गोविन्द तथा ब्राह्मणोंके चरणोंमें प्रेम रखते हैं। उनमें श्रद्धा, क्षमा, मैत्री, दया, मुदिता (प्रसन्नता) और मेरे चरणोंमें निष्कपट प्रेम होता है ॥ २ ॥
बिरति बिबेक बिनय बिग्याना । बोध जथारथ बेद पुराना ॥
दंभ मान मद करहिं न काऊ । भूलि न देहिं कुमारग पाऊ ॥
तथा वैराग्य, विवेक, विनय, विज्ञान (परमात्माके तत्त्वका ज्ञान) और वेद-पुराणका यथार्थ ज्ञान रहता है। वे दम्भ, अभिमान और मद कभी नहीं करते और भूलकर भी कुमार्गपर पैर नहीं रखते ॥ ३ ॥
गावहिं सुनहिं सदा मम लीला । हेतु रहित परहित रत सीला ॥
- अरण्यकाण्ड *
६७९
मुनि सुनु साधुन्ह के गुन जेते । कहि न सकहिं सारद श्रुति तेते ॥
सदा मेरी लीलाओंको गाते-सुनते हैं और बिना ही कारण दूसरोंके हितमें लगे रहनेवाले होते हैं। हे मुनि! सुनो, संतोंके जितने गुण हैं, उनको सरस्वती और वेद भी नहीं कह सकते ॥ ४ ॥
छं०—कहि सक न सारद सेष नारद सुनत पद पंकज गहे ।
अस दीनबंधु कृपाल अपने भगत गुन निज मुख कहे ॥
सिरु नाइ बारहिं बार चरनन्हि ब्रह्मपुर नारद गए ।
ते धन्य तुलसीदास आस बिहाइ जे हरि रँग रँग ॥
‘शेष और शारदा भी नहीं कह सकते’ यह सुनते ही नारदजीने श्रीरामजीके चरणकमल पकड़ लिये। दीनबन्धु कृपालु प्रभुने इस प्रकार अपने श्रीमुखसे अपने भक्तोंके गुण कहे। भगवान्के चरणोंमें बार-बार सिर नवाकर नारदजी ब्रह्मलोकको चले गये। तुलसीदासजी कहते हैं कि वे पुरुष धन्य हैं, जो सब आशा छोड़कर केवल श्रीहरिके रंगमें रँग गये हैं।
दो०—रावनारि जसु पावन गावहिं सुनहिं जे लोग ।
राम भगति दृढ़ पावहिं बिनु बिराग जप जोग ॥ ४६ (क) ॥
जो लोग रावणके शत्रु श्रीरामजीका पवित्र यश गावेंगे और सुनेंगे, वे वैराग्य, जप और योगके बिना ही श्रीरामजीकी दृढ़ भक्ति पावेंगे ॥ ४६ (क) ॥
दीप सिखा सम जुबति तन मन जनि होसि पतंग ।
भजहि राम तजि काम मद करहि सदा सतसंग ॥ ४६ (ख) ॥
युवती स्त्रियोंका शरीर दीपककी लौके समान है, हे मन! तू उसका पतिंगा न बन। काम और मदको छोड़कर श्रीरामचन्द्रजीका भजन कर और सदा सत्संग कर ॥ ४६ (ख) ॥
मासपारायण, बाईसवाँ विश्राम
इति श्रीमद्भामचरितमानसे सकलकलिकलुषविध्वंसने तृतीयः सोपानः समाप्तः ।
कलियुगके सम्पूर्ण पापोंको विध्वंस करनेवाले श्रीरामचरितमानसका
यह तीसरा सोपान समाप्त हुआ।
(अरण्यकाण्ड समाप्त)
भगवान् रामकी सुग्रीवसे मैत्री
सखा सोच त्यागहु बल मोरें। सब बिधि घटब काज मैं तोरें ॥