श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 664, कुल 1058 में से
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- रामचरितमानस *
किमि सहि जात अनख तोहि पाहीं । प्रिया बेगि प्रगटसि कस नाहीं ॥ एहि बिधि खोजत बिलपत स्वामी । मनहु महा बिरही अति कामी ॥
तुमसे यह अनख (स्पर्धा) कैसे सही जाती है ? हे प्रिये ! तुम शीघ्र ही प्रकट क्यों नहीं होती ? इस प्रकार [अनन्त ब्रह्माण्डोंके अथवा महामहिमाययी स्वरूपाशक्ति श्रीसीताजीके] स्वामी श्रीरामजी सीताजीको खोजते हुए [इस प्रकार] विलाप करते हैं, मानो कोई महाविरही और अत्यन्त कामी पुरुष हो ॥ ८ ॥
पूरनकाम राम सुख रासी । मनुजचरित कर अज अविनासी ॥ आगें परा गीधपति देखा । सुमिरत राम चरन जिन्ह रेखा ॥
पूर्णकाम, आनन्दकी राशि, अजन्मा और अविनाशी श्रीरामजी मनुष्योंके-से चरित्र कर रहे हैं। आगे [जानेपर] उन्होंने गृध्रपति जटायुको पड़ा देखा। वह श्रीरामजीके चरणोंका स्मरण कर रहा था, जिनमें [ध्वजा-कुलिश आदिकी] रेखाएँ (चिह्न) हैं ॥ ९ ॥
दो०— कर सरोज सिर परसेउ कृपासिंधु रघुबीर ।
निरखि राम छबि धाम मुख बिगत भई सब पीर ॥ ३० ॥
कृपासागर श्रीरघुवीरने अपने करकमलसे उसके सिरका स्पर्श किया (उसके सिरपर कर-कमल फेर दिया)। शोभाधाम श्रीरामजीका [परम सुन्दर] मुख देखकर उसकी सब पीड़ा जाती रही ॥ ३० ॥
तब कह गीध बचन धरि धीरा । सुनहु राम भंजन भव भीरा ॥ नाथ दसानन यह गति कीन्ही । तेहिं खल जनकसुता हरि लीन्ही ॥
तब धीरज धरकर गीधने यह वचन कहा—हे भव (जन्म-मृत्यु) के भयका नाश करनेवाले श्रीरामजी ! सुनिये। हे नाथ ! रावणने मेरी यह दशा की है। उसी दुष्टने जानकीजीको हर लिया है ॥ १ ॥
लै दच्छिन दिसि गयउ गोसाई । बिलपति अति कुररी की नाई ॥ दरस लागि प्रभु राखेउँ प्राना । चलन चहत अब कृपानिधाना ॥
हे गोसाई ! वह उन्हें लेकर दक्षिण दिशाको गया है। सीताजी कुररी (कुर्ज) की तरह अत्यन्त विलाप कर रही थीं। हे प्रभो ! मैंने आपके दर्शनोंके लिये ही प्राण रोक रखे थे। हे कृपानिधान ! अब ये चलना ही चाहते हैं ॥ २ ॥
राम कहा तनु राखहु ताता । मुख मुसुकाइ कही तेहिं बाता ॥ जा कर नाम मरत मुख आवा । अधमउ मुकृत होइ श्रुति गावा ॥
श्रीरामचन्द्रजीने कहा—हे तात ! शरीरको बनाये रखिये। तब उसने मुसकराते हुए मुँहसे यह बात कही—मरते समय जिनका नाम मुखमें आ जानेसे अधम (महान् पापी) भी मुक्त हो जाता है, ऐसा वेद गाते हैं— ॥ ३ ॥