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भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

पृष्ठ 691, कुल 1058 में से

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पृष्ठ 691
  • किष्किन्धाकाण्ड *

६८९

उपजा ग्यान बचन तब बोला । नाथ कृपाँ मन भयउ अलोल्ला ॥ सुख संपत्ति परिवार बड़ाई । सब परिहरि करिहउँ सेवकाई ॥

जब ज्ञान उत्पन्न हुआ तब वे ये वचन बोले कि हे नाथ! आपकी कृपासे अब मेरा मन स्थिर हो गया। सुख, सम्पत्ति, परिवार और बड़ाई (बड़पन) सबको त्यागकर मैं आपकी सेवा ही करूँगा ॥ ८ ॥

ए सब राम भगति के बाधक । कहहिं संत तव पद अवराधक ॥ सत्रु मित्र सुख दुख जग माहीं । मायाकृत परमारथ नाहीं ॥

क्योंकि आपके चरणोंकी आराधना करनेवाले संत कहते हैं कि ये सब (सुख-सम्पत्ति आदि) रामभक्तिके विरोधी हैं। जगत्में जितने भी शत्रु-मित्र और सुख-दुःख [आदि द्वन्द्व] हैं, सब-के-सब मायारचित हैं, परमार्थतः (वास्तवमें) नहीं हैं ॥ ९ ॥

बालि परम हित जासु प्रसादा । मिलेहु राम तुम्ह समन बिषादा ॥ सपनें जेहि सन होइ लराई । जागें समुझत मन सकुचाई ॥

हे श्रीरामजी! बालि तो मेरा परम हितकारी है, जिसकी कृपासे शोकका नाश करनेवाले आप मुझे मिले; और जिसके साथ अब स्वप्नमें भी लड़ाई हो तो जागनेपर उसे समझकर मनमें संकोच होगा [कि स्वप्नमें भी मैं उससे क्यों लड़ा] ॥ १० ॥

अब प्रभु कृपा करहु एहि भाँती । सब तजि भजनु करौं दिन राती ॥ सुनि बिराग संजुत कपि बानी । बोले बिहँसि रामु धनुपानी ॥

हे प्रभो! अब तो इस प्रकार कृपा कीजिये कि सब छोड़कर दिन-रात मैं आपका भजन ही करूँ। सुग्रीवकी वैराग्ययुक्त वाणी सुनकर (उसके क्षणिक वैराग्यको देखकर) हाथमें धनुष धारण करनेवाले श्रीरामजी मुसकराकर बोले— ॥ ११ ॥

जो कछु कहेहु सत्य सब सोई । सखा बचन मम मूषा न होई ॥ नट मरकट इव सबहि नचावत । रामु खगेस बेद अस गावत ॥

तुमने जो कुछ कहा है, वह सभी सत्य है; परन्तु हे सखा! मेरा वचन मिथ्या नहीं होता (अर्थात् बालि मारा जायगा और तुम्हें राज्य मिलेगा)। [काकभुशुण्डिजी कहते हैं कि—] हे पक्षियोंके राजा गरुड़! नट (मदारी) के बंदरकी तरह श्रीरामजी सबको नचाते हैं, वेद ऐसा कहते हैं ॥ १२ ॥

लै सुग्रीव संग रघुनाथा । चले चाप सायक गहि हाथा ॥ तब रघुपति सुग्रीव पठावा । गर्जेंसि जाड़ निकट बल पावा ॥