श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 692, कुल 1058 में से
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- रामचरितमानस *
तदनन्तर सुग्रीवको साथ लेकर और हाथोंमें धनुष-बाण धारण करके श्रीरघुनाथजी चले। तब श्रीरघुनाथजीने सुग्रीवको बालिके पास भेजा। वह श्रीरामजीका बल पाकर बालिके निकट जाकर गरजा ॥ १३ ॥
सुनत बालि क्रोधातुर धावा। गहि कर चरन नारि समुद्गावा ॥ सुनु पति जिन्हहि मिलेउ सुग्रीवा। ते द्वौ बंधु तेज बल सीवा ॥
बालि सुनते ही क्रोधमें भरकर वेगसे दौड़ा। उसकी स्त्री ताराने चरण पकड़कर उसे समझाया कि हे नाथ! सुनिये, सुग्रीव जिनसे मिले हैं वे दोनों भाई तेज और बलकी सीमा हैं ॥ १४ ॥
कोसलेस सुत लछिमन रामा। कालहु जीति सकहि संग्रामा ॥
वे कोसलाधीश दशरथजीके पुत्र राम और लक्ष्मण संग्राममें कालको भी जीत सकते हैं ॥ १५ ॥
दो०—कह बाली सुनु भीरु प्रिय समदरसी रघुनाथ।
जौं कदाचि मोहि मारहिं तौ पुनि होऊं सनाथ ॥ ७ ॥
बालिने कहा—हे भीरु! (डरपोक) प्रिये! सुनो, श्रीरघुनाथजी समदर्शी हैं। जो कदाचित् वे मुझे मारेंगे ही तो मैं सनाथ हो जाऊँगा (परमपद पा जाऊँगा) ॥ ७ ॥
अस कहि चला महा अभिमानी। तून समान सुग्रीवहि जानी ॥
भिरे उभौ बाली अति तर्जा। मुठिका मारि महाधुनि गर्जा ॥
ऐसा कहकर वह महान् अभिमानी बालि सुग्रीवको तिनकेके समान जानकर चला। दोनों भिड़ गये। बालिने सुग्रीवको बहुत धमकाया और घूँसा मारकर बड़े जोरसे गरजा ॥ १ ॥
तब सुग्रीव बिकल होइ भागा। मुष्टि प्रहार बज्र सम लागा ॥
मैं जो कहा रघुबीर कृपाला। बंधु न होइ मोर यह काला ॥
तब सुग्रीव व्याकुल होकर भागा। घूँसेकी चोट उसे वज्रके समान लगी। [सुग्रीवने आकर कहा—] हे कृपालु रघुवीर! मैंने आपसे पहले ही कहा था कि बालि मेरा भाई नहीं है, काल है ॥ २ ॥
एकरूप तुम्ह भ्राता दोऊ। तेहि भ्रम तें नहिं मारेऊं सोऊ ॥
कर परसा सुग्रीव सरीरा। तनु भा कुलिस गई सब पीरा ॥
[श्रीरामजीने कहा—] तुम दोनों भाइयोंका एक-सा ही रूप है। इसी भ्रमसे मैंने उसको नहीं मारा। फिर श्रीरामजीने सुग्रीवके शरीरको हाथसे स्पर्श किया, जिससे उसका शरीर वज्रके समान हो गया और सारी पीड़ा जाती रही ॥ ३ ॥
मेली कंठ सुमन कै माला। पठवा पुनि बल देइ बिसाला ॥
पुनि नाना बिधि भई लराई। बिटप ओट देखहिं रघुराई ॥
तब श्रीरामजीने सुग्रीवके गलेमें फूलोंकी माला डाल दी और फिर उसे बड़ा भारी बल देकर भेजा। दोनोंमें पुनः अनेक प्रकारसे युद्ध हुआ। श्रीरघुनाथजी वृक्षकी आड़से देख रहे थे ॥ ४ ॥