श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 693, कुल 1058 में से
संदर्भ में पढ़ें- किष्किन्धाकाण्ड *
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दो०—बहु छल बल सुग्रीव कर हिर्ष हारा भय मानि।
मारा बालि राम तब हृदय माझ सर तानि॥ ८ ॥
सुग्रीवने बहुत-से छल-बल किये, किन्तु [अन्तमें] भय मानकर हृदयसे हार गया। तब श्रीरामजीने तानकर बालिके हृदयमें बाण मारा॥ ८ ॥
परा बिकल महि सर के लागें। पुनि उठि बैठ देखि प्रभु आगें॥ स्याम गात सिर जटा बनाएँ। अरुन नयन सर चाप चढ़ाएँ॥
बाणके लगते ही बालि व्याकुल होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा। किन्तु प्रभु श्रीरामचन्द्रजीको आगे देखकर वह फिर उठ बैठ। भगवान्का श्याम शरीर है, सिरपर जटा बनाये हैं, लाल नेत्र हैं, बाण लिये हैं और धनुष चढ़ाये हैं॥ १ ॥
पुनि पुनि चितइ चरन चित दीन्हा। सुफल जन्म माना प्रभु चीन्हा॥ हृदयँ प्रीति मुख बचन कठोरा। बोला चितइ राम की ओरा॥
बालिने बार-बार भगवान्की ओर देखकर चित्तको उनके चरणोंमें लगा दिया। प्रभुको पहचानकर उसने अपना जन्म सफल माना। उसके हृदयमें प्रीति थी, पर मुखमें कठोर वचन थे। वह श्रीरामजीकी ओर देखकर बोला—॥ २ ॥
धर्म हेतु अवतरेहु गोसाई। मारेहु मोहि व्याध की नाई॥ मैं बैरी सुग्रीव पिआरा। अवगुन कवन नाथ मोहि मारा॥
हे गोसाई! आपने धर्मकी रक्षाके लिये अवतार लिया है और मुझे व्याधकी तरह (छिपकर) मारा? मैं वैरी और सुग्रीव प्यारा? हे नाथ! किस दोषसे आपने मुझे मारा?॥ ३ ॥
अनुज बधू भगिनी सुत नारी। सुनु सठ कन्या सम ए चारी॥ इन्हहि कुट्टष्टि बिलोकइ जोई। ताहि बधें कछु पाप न होई॥
[श्रीरामजीने कहा—] हे मूर्ख! सुन, छोटे भाईकी स्त्री, बहिन, पुत्रकी स्त्री और कन्या—ये चारों समान हैं। इनको जो कोई बुरी दृष्टिसे देखता है, उसे मारनेमें कुछ भी पाप नहीं होता॥ ४ ॥
मूढ़ तोहि अतिसय अभिमाना। नारि सिखावन करसि न काना॥ मम भुज बल आश्रित तेहि जानी। मारा चहसि अधम अभिमानी॥
हे मूढ़! तुझे अत्यन्त अभिमान है। तूने अपनी स्त्रीकी सीखपर भी कान (ध्यान) नहीं दिया। सुग्रीवको मेरी भुजाओंके बलका आश्रित जानकर भी अरे अधम अभिमानी! तूने उसको मारना चाहा!॥ ५ ॥
दो०—सुनहु राम स्वामी सन चल न चातुरी मोरि।
प्रभु अजहूँ मैं पापी अंतकाल गति तोरि॥ ९ ॥