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भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

पृष्ठ 694, कुल 1058 में से

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पृष्ठ 694

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  • रामचरितमानस *

[बालिने कहा—] हे श्रीरामजी! सुनिये, स्वामी (आप) से मेरी चतुराई नहीं चल सकती। हे प्रभो! अन्तकालमें आपकी गति (शरण) पाकर मैं अब भी पापी ही रहा? ॥ १ ॥

सुनत राम अति कोमल बानी । बालि सीस परसेउ निज पानी ॥ अचल करौं तनु राखहु प्राना । बालि कहा सुनु कृपानिधाना ॥

बालिकी अत्यन्त कोमल वाणी सुनकर श्रीरामजीने उसके सिरको अपने हाथसे स्पर्श किया [और कहा—] मैं तुम्हारे शरीरको अचल कर दूँ, तुम प्राणोंको रखो। बालिने कहा—हे कृपानिधान! सुनिये— ॥ १ ॥

जन्म जन्म मुनि जतनु कराहीं । अंत राम कहि आवत नाहीं ॥ जासु नाम बल संकर कासी । देत सबहि सम गति अबिनासी ॥

मुनिगण जन्म-जन्ममें (प्रत्येक जन्ममें)[अनेकों प्रकारका] साधन करते रहते हैं। फिर भी अन्तकालमें उन्हें 'राम' नहीं कह आता (उनके मुखसे रामनाम नहीं निकलता)। जिनके नामके बलसे शङ्करजी काशीमें सबको समानरूपसे अविनाशिनी गति (मुक्ति) देते हैं ॥ २ ॥

मम लोचन गोचर सोड़ आवा । बहुरि कि प्रभु अस बनिहि बनावा ॥

वह श्रीरामजी स्वयं मेरे नेत्रोंके सामने आ गये हैं। हे प्रभो! ऐसा संयोग क्या फिर कभी बन पड़ेगा? ॥ ३ ॥

छं०—सो नयन गोचर जासु गुन नित नेति कहि श्रुति गावहीं । जिति पवन मन गो निरस करि मुनि ध्यान कबहुँक पावहीं ॥ मोहि जानि अति अभिमान बस प्रभु कहेउ राखु सरीरही । अस कवन सठ हठि काटि सुरतरु बारि करिहि बबूरही ॥

श्रुतियाँ 'नेति-नेति' कहकर निरन्तर जिनका गुणगान करती रहती हैं, तथा प्राण और मनको जीतकर एवं इन्द्रियोंको [विषयोंके रससे सर्वथा] नीरस बनाकर मुनिगण ध्यानमें जिनकी कभी क्रचित् ही झलक पाते हैं, वे ही प्रभु (आप) साक्षात् मेरे सामने प्रकट हैं। आपने मुझे अत्यन्त अभिमानवश जानकर यह कहा कि तुम शरीर रख लो। परन्तु ऐसा मूर्ख कौन होगा जो हठपूर्वक कल्पवृक्षको काटकर उससे बबूरेके बाड़ लगावेगा (अर्थात् पूर्णकाम बना देनेवाले आपको छोड़कर आपसे इस नक्षत्र शरीरकी रक्षा चाहेगा)? ॥ १ ॥

अब नाथ करि करुना बिलोकहु देहु जो बर मागऊँ । जेहिं जोनि जन्मौं कर्म बस तहाँ राम पद अनुरागऊँ ॥ यह तनय मम सम बिनय बल कल्यानप्रद प्रभु लीजिए । गहि बाँह सुर नर नाह आपन दास अंगद कीजिए ॥