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भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

पृष्ठ 703, कुल 1058 में से

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पृष्ठ 703
  • किष्किन्धाकाण्ड *

७०१

चरन नाड़ सिरु बिनती कीन्ही। लछिमन अभय बाँह तेहि दीन्ही ॥ क्रोधवंत लछिमन सुनि काना। कह कपीस अति भयँ अकुलाना ॥

अंगदने उनके चरणोंमें सिर नवाकर विनती की (क्षमायाचना की)। तब लक्ष्मणजीने उनको अभय बाँह दी (भुजा उठाकर कहा कि डरो मत)। सुग्रीवने अपने कानोंसे लक्ष्मणजीको क्रोधयुक्त सुनकर भयसे अत्यन्त व्याकुल होकर कहा— ॥ १ ॥

सुनु हनुमंत संग लै तारा। करि बिनती समुझाउ कुमारा ॥ तारा सहित जाड़ हनुमाना। चरन बंदि प्रभु सुजस बखाना ॥

हे हनुमान्! सुनो, तुम ताराको साथ ले जाकर विनती करके राजकुमारको समझाओ (समझा-बुझाकर शान्त करो)। हनुमान्जीने तारासहित जाकर लक्ष्मणजीके चरणोंकी वन्दना की और प्रभुके सुन्दर यशका बखान किया ॥ २ ॥

करि बिनती मंदिर लै आए। चरन पखाारि पलँग बैठाए ॥ तब कपीस चरनन्हि सिरु नावा। गहि भुज लछिमन कंठ लगावा ॥

वे विनती करके उन्हें महलमें ले आये तथा चरणोंको धोकर उन्हें पलँगपर बैठाया। तब वानरराज सुग्रीवने उनके चरणोंमें सिर नवाया और लक्ष्मणजीने हाथ पकड़कर उनको गलेसे लगा लिया ॥ ३ ॥

नाथ बिषय सम मद कछु नाहीं। मुनि मन मोह करड़ छन माहीं ॥ सुनत बिनीत बचन सुख पावा। लछिमन तेहि बहु बिधि समुझावा ॥

[सुग्रीवने कहा—] हे नाथ! विषयके समान और कोई मद नहीं है। यह मुनियोंके मनमें भी क्षणमात्रमें मोह उत्पन्न कर देता है [फिर मैं तो विषयी जीव ही ठहरा]। सुग्रीवके विनययुक्त बचन सुनकर लक्ष्मणजीने सुख पाया और उनको बहुत प्रकारसे समझाया ॥ ४ ॥

पवन तनय सब कथा सुनाई। जेहि बिधि गए दूत समुदाई ॥

तब पवनसुत हनुमान्जीने जिस प्रकार सब दिशाओंमें दूतोंके समूह गये थे वह सब हाल सुनाया ॥ ५ ॥

दो०—हरषि चले सुग्रीव तब अंगदादि कपि साथ।

रामानुज आगें करि आए जहाँ रघुनाथ ॥ २० ॥

तब अंगद आदि वानरोंको साथ लेकर और श्रीरामजीके छोटे भाई लक्ष्मणजीको आगे करके (अर्थात् उनके पीछे-पीछे) सुग्रीव हर्षित होकर चले और जहाँ रघुनाथजी थे वहाँ आये ॥ २० ॥

नाड़ चरन सिरु कह कर जोरी। नाथ मोहि कछु नाहिन खोरी ॥ अतिसय प्रबल देव तव माया। छूटड़ राम करहु जौं दाय। ॥