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भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

पृष्ठ 704, कुल 1058 में से

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पृष्ठ 704

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  • रामचरितमानस *

श्रीरघुनाथजीके चरणोंमें सिर नवाकर हाथ जोड़कर सुग्रीवने कहा—हे नाथ! मुझे कुछ भी दोष नहीं है। हे देव! आपकी माया अत्यन्त ही प्रबल है। आप जब दया करते हैं, हे राम! तभी यह छूटती है ॥ १ ॥

बिषय बस्य सुर नर मुनि स्वामी । मैं पावैर पसु कपि अति कामी ॥ नारि नयन सर जाहि न लागा । घोर क्रोध तम निसि जो जागा ॥

हे स्वामी! देवता, मनुष्य और मुनि सभी विषयोंके वशमें हैं। फिर मैं तो पामर पशु और पशुओंमें भी अत्यन्त कामी बंदर हूँ। स्त्रीका नयन-बाण जिसको नहीं लगा, जो भयङ्कर क्रोधरूपी अंधेरी रातमें भी जागता रहता है (क्रोधान्ध नहीं होता) ॥ २ ॥

लोभ पाँस जेहिं गर न बँधाया । सो नर तुम्ह समान रघुराया ॥ यह गुन साधन तें नहिं होई । तुम्हरी कृपाँ पाव कोइ कोई ॥

और लोभकी फाँसीसे जिसने अपना गला नहीं बँधाया, हे रघुनाथजी! वह मनुष्य आपहीके समान है। ये गुण साधनसे नहीं प्राप्त होते। आपकी कृपासे ही कोई-कोई इन्हें पाते हैं ॥ ३ ॥

तब रघुपति बोले मुसुकाई । तुम्ह प्रिय मोहि भरत जिमि भाई ॥ अब सोइ जतनु करहु मन लाई । जेहि बिधि सीता कै सुधि पाई ॥

तब श्रीरघुनाथजी मुसकराकर बोले—हे भाई! तुम मुझे भरतके समान प्यारे हो। अब मन लगाकर वही उपाय करो जिस उपायसे सीताकी खबर मिले ॥ ४ ॥

दो०—एहि बिधि होत बतकही आए बानर जूथ । नाना बरन सकल दिसि देखिअ कीस बरुथ ॥ २१ ॥

इस प्रकार बातचीत हो रही थी कि वानरोंके यूथ (झुंड) आ गये। अनेक रंगोंके वानरोंके दल सब दिशाओंमें दिखायी देने लगे ॥ २१ ॥

बानर कटक उमा मैं देखा । सो मूरुख जो करन चह लेखा ॥ आइ राम पद नावहिं माथा । निरखि बदनु सब होहिं सनाथा ॥

[शिवजी कहते हैं—] हे उमा! वानरोंकी वह सेना मैंने देखी थी। उसकी जो गिनती करना चाहे वह महान् मूर्ख है। सब वानर आ-आकर श्रीरामजीके चरणोंमें मस्तक नवाते हैं और [सौन्दर्य-माधुर्यनिधि] श्रीमुखके दर्शन करके कृतार्थ होते हैं ॥ १ ॥

अस कपि एक न सेना माहीं । राम कुसल जेहि पूछी नाहीं ॥ यह कछु नहिं प्रभु कइ अधिकाई । बिस्वरूप व्यापक रघुराई ॥

सेनामें एक भी वानर ऐसा नहीं था जिससे श्रीरामजीने कुशल न पूछी हो। प्रभुके लिये यह कोई बड़ी बात नहीं है; क्योंकि श्रीरघुनाथजी विश्वरूप तथा सर्वव्यापक हैं (सारे रूपों और सब स्थानोंमें हैं) ॥ २ ॥