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श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

पृष्ठ 706, कुल 1058 में से

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पृष्ठ 706

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  • रामचरितमानस *

सोइ गुनगय सोई बड़भागी । जो रघुबीर चरन अनुरागी ॥ आयसु मागि चरन सिरु नाई । चले हरषि सुमिरत रघुराई ॥

सदगुणोंको पहचाननेवाला (गुणवान्) तथा बड़भागी वही है जो श्रीरघुनाथजीके चरणोंका प्रेमी है । आज्ञा माँगकर और चरणोंमें फिर सिर नवाकर श्रीरघुनाथजीका स्मरण करते हुए सब हर्षित होकर चले ॥ ४ ॥

पाछें पवन तनय सिरु नावा । जानि काज प्रभु निकट बोलावा ॥ परसा सीस सरोरुह पानी । करमुद्रिका दीन्हि जन जानी ॥

सबके पीछे पवनसुत श्रीहनुमान्जीने सिर नवाया । कार्यका विचार करके प्रभुने उन्हें अपने पास बुलाया । उन्होंने अपने कर-कमलसे उनके सिरका स्पर्श किया तथा अपना सेवक जानकर उन्हें अपने हाथकी अँगूठी उतारकर दी ॥ ५ ॥

बहु प्रकार सीतहि समुझाएहु । कहि बल बिरह बेगि तुम्ह आएहु ॥ हनुमत जन्म सुफल करि माना । चलेउ हृदयँ धरि कृपानिधाना ॥

[और कहा—] बहुत प्रकारसे सीताको समझाना और मेरा बल तथा विरह (प्रेम) कहकर तुम शीघ्र लौट आना । हनुमान्जीने अपना जन्म सफल समझा और कृपानिधान प्रभुको हृदयमें धारण करके वे चले ॥ ६ ॥

जद्यपि प्रभु जानत सब बाता । राजनीति राखत सुरत्राता ॥

जद्यपि देवताओंकी रक्षा करनेवाले प्रभु सब बात जानते हैं, तो भी वे राजनीतिकी रक्षा कर रहे हैं । (नीतिकी मर्यादा रखनेके लिये सीताजीका पता लगानेको जहाँ-तहाँ वानरोंको भेज रहे हैं) ॥ ७ ॥

दो०—चले सकल बन खोजत सरिता सर गिरि खोह ।

राम काज लयलीन मन बिसरा तन कर छोह ॥ २३ ॥

सब वानर वन, नदी, तालाब, पर्वत और पर्वतोंकी कन्दराओंमें खोजते हुए चले जा रहे हैं । मन श्रीरामजीके कार्यमें लवलीन है । शरीरतकका प्रेम (ममत्व) भूल गया है ॥ २३ ॥

कतहुँ होइ निसिचर सँ भँटा । प्रान लेहिँ एक एक चपेटा ॥

बहु प्रकार गिरि कानन हेरहिँ । कोउ मुनि मिलइ ताहि सब घेरहिँ ॥

कहीं किसी राक्षससे भँट हो जाती है, तो एक-एक चपतमें ही उसके प्राण ले लेते हैं । पर्वतों और वनोंको बहुत प्रकारसे खोज रहे हैं । कोई मुनि मिल जाता है तो पता पूछनेके लिये उसे सब घेर लेते हैं ॥ १ ॥

लागि तृष्णा अतिसय अकुलाने । मिलइ न जल घन गहन भुलाने ॥

मन हनुमान कीन्ह अनुमाना । मरन चहत सब बिनु जल पाना ॥

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