श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 707, कुल 1058 में से
संदर्भ में पढ़ें- किष्किन्धाकाण्ड *
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इतनेमें ही सबको अत्यन्त प्यास लगी, जिससे सब अत्यन्त ही व्याकुल हो गये। किन्तु जल कहीं नहीं मिला। घने जंगलमें सब भुला गये। हनुमान्जीने मनमें अनुमान किया कि जल पिये बिना सब लोग मरना ही चाहते हैं ॥ २ ॥
चढ़ि गिरि सिखर चहुँ दिसि देखा । भूमि बिबर एक कौतुक पेखा ॥ चक्रबाक बक हंस उड़ाहीं । बहुतक खग प्रबिसहिं तेहि माहीं ॥
उन्होंने पहाड़की चोटीपर चढ़कर चारों ओर देखा तो पृथ्वीके अंदर एक गुफामें उन्हें एक कौतुक (आश्चर्य) दिखायी दिया। उसके ऊपर चकवे, बगुले और हंस उड़ रहे हैं और बहुत-से पक्षी उसमें प्रवेश कर रहे हैं ॥ ३ ॥
गिरि ते उतरि पवनसुत आवा । सब कहुँ लै सोड़ बिबर देखावा ॥ आगें कै हनुमंतहि लीन्हा । पैठे बिबर बिलंबु न कीन्हा ॥
पवनकुमार हनुमान्जी पर्वतसे उतर आये और सबको ले जाकर उन्होंने वह गुफा दिखलायी। सबने हनुमान्जीको आगे कर लिया और वे गुफामें घुस गये, देर नहीं की ॥ ४ ॥
दो०— दीख जाइ उपबन बर सर बिगसित बहु कंज ।
मंदिर एक रुचिर तहाँ बैठि नारि तप पुंज ॥ २४ ॥
अंदर जाकर उन्होंने एक उत्तम उपबन (बगीचा) और तालाब देखा, जिसमें बहुत-से कमल खिले हुए हैं। वहाँ एक सुन्दर मन्दिर है, जिसमें एक तपोमूर्ति स्त्री बैठी है ॥ २४ ॥
दूरि ते ताहि सबन्हि सिरु नावा । पूछें निज बृत्तांत सुनावा ॥ तेहिं तब कहा करहु जल पाना । खाहु सुरस सुंदर फल नाना ॥
दूरसे ही सबने उसे सिर नवाया और पूछनेपर अपना सब वृत्तान्त कह सुनाया। तब उसने कहा—जलपान करो और भाँति-भाँतिके रसीले सुन्दर फल खाओ ॥ १ ॥
मज्जनु कीन्ह मधुर फल खाए । तासु निकट पुनि सब चलि आए ॥ तेहिं सब आपनि कथा सुनाई । मैं अब जाब जहाँ रघुराई ॥
[आज्ञा पाकर] सबने स्नान किया, मीठे फल खाये और फिर सब उसके पास चले आये। तब उसने अपनी सब कथा कह सुनायी [और कहा—] मैं अब वहाँ जाऊँगी जहाँ श्रीरघुनाथजी हैं ॥ २ ॥
मूदहु नयन बिबर तजि जाहू । पैहहु सीतहि जनि पछिताहू ॥ नयन मूदि पुनि देखहिं बीरा । ठाढ़े सकल सिंधु कें तीरा ॥
तुमलोग आँखें मूँद लो और गुफाको छोड़कर बाहर जाओ। तुम सीताजीको पा जाओगे, पछताओ नहीं (निराश न होओ)। आँखें मूँदकर फिर जब आँखें खोलीं तो सब वीर क्या देखते हैं कि सब समुद्रके तीरपर खड़े हैं ॥ ३ ॥