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भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

पृष्ठ 708, कुल 1058 में से

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पृष्ठ 708

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  • रामचरितमानस *

सो पुनि गईं जहाँ रघुनाथा । जाइ कमल पद नाएसि माथा ॥ नाना भाँति बिनय तेहिं कीन्ही । अनपायनी भगति प्रभु दीन्ही ॥

और वह स्वयं वहाँ गयी जहाँ श्रीरघुनाथजी थे। उसने जाकर प्रभुके चरणकमलोंमें मस्तक नवाया और बहुत प्रकारसे विनती की। प्रभुने उसे अपनी अनपायिनी (अचल) भक्ति दी ॥ ४ ॥

दो०—बदरीबन कहूँ सो गई प्रभु अग्या धरि सीस।

उर धरि राम चरन जुग जे बंदत अज ईस ॥ २५ ॥

प्रभुकी आज्ञा सिरपर धारणकर और श्रीरामजीके युगल चरणोंको, जिनकी ब्रह्मा और महेश भी वन्दना करते हैं, हृदयमें धारणकर वह (स्वयंप्रभा) बदरिकाश्रमको चली गयी ॥ २५ ॥

इहाँ बिचारहिं कपि मन माहीं । बीती अवधि काज कछु नाहीं ॥

सब मिलि कहहिं परस्पर बाता । बिनु सुधि लएँ करब का भाता ॥

यहाँ वानरगण मनमें विचार कर रहे हैं कि अवधि तो बीत गयी; पर काम कुछ न हुआ। सब मिलकर आपसमें बात करने लगे कि हे भाई! अब तो सीताजीकी खबर लिये बिना लौटकर भी क्या करेंगे ? ॥ १ ॥

कह अंगद लोचन भरि बारी । दुहुँ प्रकार भइ मृत्यु हमारी ॥

इहाँ न सुधि सीता कै पाई । उहाँ गएँ मारिहि कपिराई ॥

अंगदने नेत्रोंमें जल भरकर कहा कि दोनों ही प्रकारसे हमारी मृत्यु हुई। यहाँ तो सीताजीकी सुध नहीं मिली और वहाँ जानेपर वानरराज सुप्रीव मार डालेंगे ॥ २ ॥

पिता बधे पर मारत मोही । राखा राम निहोर न ओही ॥

पुनि पुनि अंगद कह सब पाहीं । मरन भयउ कछु संसय नाहीं ॥

वे तो पिताके वध होनेपर ही मुझे मार डालते। श्रीरामजीने ही मेरी रक्षा की, इसमें सुप्रीवका कोई एहसान नहीं है। अंगद बार-बार सबसे कह रहे हैं कि अब मरण हुआ, इसमें कुछ भी सन्देह नहीं है ॥ ३ ॥

अंगद बचन सुनत कपि बीरा । बोलि न सकहिं नयन बह नीरा ॥

छन एक सोच मगन होइ रहे । पुनि अस बचन कहत सब भए ॥

वानर वीर अंगदके वचन सुनते हैं; किन्तु कुछ बोल नहीं सकते। उनके नेत्रोंसे जल बह रहा है। एक क्षणके लिये सब सोचमें मग्न हो रहे। फिर सब ऐसा वचन कहने लगे— ॥ ४ ॥

हम सीता कै सुधि लीन्हें बिना । नहिं जैहैं जुबराज प्रबीना ॥

अस कहि लवन सिंधु तट जाई । बैठे कपि सब दर्भ डसाई ॥

हे सुयोग्य युवराज! हमलोग सीताजीकी खोज लिये बिना नहीं लौटेंगे। ऐसा कहकर लवणसागरके तटपर जाकर सब वानर कुश बिछाकर बैठ गये ॥ ५ ॥

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