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भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

पृष्ठ 718, कुल 1058 में से

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पृष्ठ 718

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  • रामचरितमानस *

बदन पड़ठि पुनि बाहेर आवा । मागा बिदा ताहि सिरु नावा ॥ मोहि सुरन्ह जेहि लागि पठावा । बुधि बल मरमु तोर मैं पावा ॥

और वे उसके मुखमें घुसकर [तुरंत] फिर बाहर निकल आये और उसे सिर नवाकर विदा माँगने लगे। [उसने कहा—] मैंने तुम्हारे बुद्धि-बलका भेद पा लिया, जिसके लिये देवताओंने मुझे भेजा था ॥ ६ ॥

दो०—राम काजु सबु करिहहु तुम्ह बल बुद्धि निधान ।

आसिष देइ गई सो हरषि चलेउ हनुमान ॥ २ ॥

तुम श्रीरामचन्द्रजीका सब कार्य करोगे, क्योंकि तुम बल-बुद्धिके भण्डार हो। यह आशीर्वाद देकर वह चली गयी, तब हनुमानजी हर्षित होकर चले ॥ २ ॥

निसिचरि एक सिंधु महुँ रहई । करि माया नभु के खग गहई ॥

जीव जंतु जे गगन उड़ाहीं । जल बिलोकि तिन्ह कै परिछाहीं ॥

समुद्रमें एक राक्षसी रहती थी। वह माया करके आकाशमें उड़ते हुए पक्षियोंको पकड़ लेती थी। आकाशमें जो जीव-जन्तु उड़ा करते थे, वह जलमें उनकी परछाई देखकर ॥ १ ॥

गहड़ छाहँ सक सो न उड़ाई । एहि बिधि सदा गगनचर खाई ॥

सोइ छल हनुमान कहँ कीन्हा । तासु कपटु कपि तुरतहिं चीन्हा ॥

उस परछाईको पकड़ लेती थी, जिससे वे उड़ नहीं सकते थे [और जलमें गिर पड़ते थे] इस प्रकार वह सदा आकाशमें उड़नेवाले जीवोंको खाया करती थी। उसने वही छल हनुमानजीसे भी किया। हनुमानजीने तुरंत ही उसका कपट पहचान लिया ॥ २ ॥

ताहि मारि मारुतसुत बीरा । बारिधि पार गयउ मतिधीरा ॥

तहाँ जाइ देखी बन सोभा । गुंजत चंचरीक मधु लोभा ॥

पवनपुत्र धीरबुद्धि वीर श्रीहनुमानजी उसको मारकर समुद्रके पार गये। वहाँ जाकर उन्होंने वनकी शोभा देखी। मधु (पुष्परस) के लोभसे भौरें गुज़ार कर रहे थे ॥ ३ ॥

नाना तरु फल फूल सुहाए । खग मृग बृंद देखि मन भाए ॥

सैल बिसाल देखि एक आगें । ता पर धाइ चढ़ेउ भय त्यागें ॥

अनेकों प्रकारके वृक्ष फल-फूलसे शोभित हैं। पक्षी और पशुओंके समूहको देखकर तो वे मनमें [बहुत ही] प्रसन्न हुए। सामने एक विशाल पर्वत देखकर हनुमानजी भय त्यागकर उसपर दौड़कर जा चढ़े ॥ ४ ॥

उमा न कछु कपि कै अधिकाई । प्रभु प्रताप जो कालहि खाई ॥

गिरि पर चढ़ि लंका तेहिं देखी । कहि न जाइ अति दुर्ग बिसेषी ॥