श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 719, कुल 1058 में से
संदर्भ में पढ़ें- सुन्दरकाण्ड *
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[शिवजी कहते हैं—] हे उमा! इसमें वानर हनुमान्की कुछ बड़ाई नहीं है। यह प्रभुका प्रताप है, जो कालको भी खा जाता है। पर्वतपर चढ़कर उन्होंने लङ्का देखी। बहुत ही बड़ा किला है, कुछ कहा नहीं जाता ॥ ५ ॥
अति उत्तंग जलनिधि चहु पासा । कनक कोट कर परम प्रकासा ॥
वह अत्यन्त ऊँचा है, उसके चारों ओर समुद्र है। सोनेके परकोटे (चहारदीवारी) का परम प्रकाश हो रहा है ॥ ६ ॥
छं०— कनक कोट बिचित्र मनि कृत सुंदरायतना घना । चउहद्वु हद्वु सुबद्वु बीर्थीं चारु पुर बहु बिधि बना ॥ गज बाजि खच्चर निकर पदचर रथ बरुथन्हि को गनै । बहुरूप निसिचर जूथ अतिबल सेन बरनत नहिं बनै ॥
विचित्र मणियोंसे जड़ा हुआ सोनेका परकोटा है, उसके अंदर बहुत-से सुन्दर-सुन्दर घर हैं। चौराहे, बाजार, सुन्दर मार्ग और गलियाँ हैं; सुन्दर नगर बहुत प्रकारसे सजा हुआ है। हाथी, घोड़े, खच्चरोंके समूह तथा पैदल और रथोंके समूहोंको कौन गिन सकता है! अनेक रूपोंके राक्षसोंके दल हैं, उनकी अत्यन्त बलवती सेना वर्णन करते नहीं बनती ॥ १ ॥
बन बाग उपवन बाटिका सर कूप बापीं सोहहीं । नर नाग सुर गंधर्ब कन्या रूप मुनि मन मोहहीं ॥ कहुँ माल देह बिसाल सैल समान अतिबल गर्जहीं । नाना अखारेन्ह भिरहिं बहुबिधि एक एकन्ह तर्जहीं ॥
वन, बाग, उपवन (बगीचे), फुलवाड़ी, तालाब, कुएँ और बावलियाँ सुशोभित हैं। मनुष्य, नाग, देवताओं और गन्धर्वोंकी कन्याएँ अपने सौन्दर्यसे मुनियोंके भी मनोंको मोहे लेती हैं। कहीं पर्वतके समान विशाल शरीरवाले बड़े ही बलवान् मल्ल (पहलवान) गरज रहे हैं। वे अनेकों अखाड़ोंमें बहुत प्रकारसे भिड़ते और एक-दूसरेको ललकारते हैं ॥ २ ॥
करि जतन भट कोटिन्ह बिकट तन नगर चहुँ दिसि रच्छहीं । कहुँ महिष मानुष धेनु खर अज खल निसाचर भच्छहीं ॥ एहि लागि तुलसीदास इन्ह की कथा कछु एक है कही । रघुबीर सर तीरथ सरीरन्हि त्यागि गति पैहहिं सही ॥