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भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

पृष्ठ 720, कुल 1058 में से

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पृष्ठ 720

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  • रामचरितमानस *

भयंकर शरीरवाले करोड़ों योद्धा यत्न करके (बड़ी सावधानीसे) नगरकी चारों दिशाओंमें (सब ओरसे) रखवाली करते हैं। कहीं दुष्ट राक्षस भैंसों, मनुष्यों, गायों, गदहों और बकरोंको खा रहे हैं। तुलसीदासने इनकी कथा इसीलिये कुछ थोड़ी-सी कही है कि ये निश्चय ही श्रीरामचन्द्रजीके बाणरूपी तीर्थमें शरीरोंको त्यागकर परमगति पावेंगे ॥ ३ ॥

दो०—पुर रखवारे देखि बहु कपि मन कीन्ह बिचार।

अति लघु रूप धरौँ निसि नगर करौँ पड़सार ॥ ३ ॥

नगरके बहुसंख्यक रखवालोंको देखकर हनुमान्जीने मनमें विचार किया कि अत्यन्त छोटा रूप धरूँ और रातके समय नगरमें प्रवेश करूँ ॥ ३ ॥

मसक समान रूप कपि धरी । लंकहि चलेउ सुमिरि नरहरी ॥

नाम लंकिनी एक निसिचरी । सो कह चलेसि मोहि निंदरी ॥

हनुमान्जी मच्छड़के समान (छोटा-सा) रूप धारण कर नररूपसे लीला करनेवाले भगवान् श्रीरामचन्द्रजीका स्मरण करके लङ्काको चले। [लङ्काके द्वारपर] लङ्किनी नामकी एक राक्षसी रहती थी। वह बोली—मेरा निरादर करके (बिना मुझसे पूछे) कहाँ चला जा रहा है? ॥ १ ॥

जानेहि नहीं मरमु सठ मोरा । मोर अहार जहाँ लंगि चोरा ॥

मुठिका एक महा कपि हनी । रुधिर बमत धरनीं ढनमनी ॥

हे मूर्ख! तूने मेरा भेद नहीं जाना? जहाँतक (जितने) चोर हैं, वे सब मेरे आहार हैं। महाकपि हनुमान्जीने उसे एक घूँसा मारा, जिससे वह खूनकी उलटी करती हुई पृथ्वीपर लुढ़क पड़ी ॥ २ ॥

पुनि संभारि उठी सो लंका । जोरि पानि कर बिनय ससंका ॥

जब रावनहि ब्रह्म बर दीन्हा । चलत बिरंचि कहा मोहि चीन्हा ॥

वह लङ्किनी फिर अपनेको सँभालकर उठी और डरके मारे हाथ जोड़कर विनती करने लगी। [वह बोली—] रावणको जब ब्रह्माजीने वर दिया था, तब चलते समय उन्होंने मुझे राक्षसोंके विनाशकी यह पहचान बता दी थी कि— ॥ ३ ॥

बिकल होसि तैं कपि कें मारे । तब जानेसु निसिचर संधारे ॥

तात मोर अति पुन्य बहूता । देखेउँ नयन राम कर दूता ॥

जब तू बंदरके मारनेसे व्याकुल हो जाय, तब तू राक्षसोंका संहार हुआ जान लेना। हे तात! मेरे बड़े पुण्य हैं, जो मैं श्रीरामचन्द्रजीके दूत (आप) को नेत्रोंसे देख पायी ॥ ४ ॥

दो०—तात स्वर्ग अपर्बर्ग सुख धरिअ तुला एक अंग।

तूल न ताहि सकल मिलि जो सुख लव सतसंग ॥ ४ ॥