श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 734, कुल 1058 में से
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- रामचरितमानस *
अति बिसाल तरु एक उपारा । बिरथ कीन्ह लंकेस कुमार॥ रहे महाभट ताके संग। गहि गहि कपि मर्दड़ निज अंगा॥
उन्होंने एक बहुत बड़ा वृक्ष उखाड़ लिया और [उसके प्रहारसे] लंकेश्वर रावणके पुत्र मेघनादको बिना रथका कर दिया (रथको तोड़कर उसे नीचे पटक दिया)। उसके साथ जो बड़े-बड़े योद्धा थे, उनको पकड़-पकड़कर हनुमान्जी अपने शरीरसे मसलने लगे॥ ३ ॥
तिन्हहि निपाति ताहि सन बाजा । भिरे जुगल मानहुँ गजराजा॥ मुठिका मारि चढ़ा तरु जाई । ताहि एक छन मुरुछा आई॥
उन सबको मारकर फिर मेघनादसे लड़ने लगे। [लड़ते हुए वे ऐसे मालूम होते थे] मानो दो गजराज (श्रेष्ठ हाथी) भिड़ गये हों। हनुमान्जी उसे एक घूँसा मारकर वृक्षपर जा चढ़े। उसको क्षणभरके लिये मूर्च्छा आ गयी॥ ४ ॥
उठि बहोरि कीन्हिसि बहु माया । जीति न जाइ प्रभंजन जाया॥
फिर उठकर उसने बहुत माया रची; परन्तु पवनके पुत्र उससे जीते नहीं जाते॥ ५ ॥
दो०—ब्रह्म अस्त्र तेहि साँधा कपि मन कीन्ह बिचार।
जौं न ब्रह्मसर मानउँ महिमा मिटड़ अपार॥ १९ ॥
अन्तमें उसने ब्रह्मास्त्रका सन्धान (प्रयोग) किया, तब हनुमान्जीने मनमें विचार किया कि यदि ब्रह्मास्त्रको नहीं मानता हूँ तो उसकी अपार महिमा मिट जायगी॥ १९ ॥
ब्रह्मबान कपि कहँ तेहिं मारा । परतिहुँ बार कटकु संघारा॥
तेहिं देखा कपि मुरुछित भयऊ । नागपास बाँधेसि लै गयऊ॥
उसने हनुमान्जीको ब्रह्मबाण मारा, [जिसके लगते ही वे वृक्षसे नीचे गिर पड़े] परन्तु गिरते समय भी उन्होंने बहुत-सी सेना मार डाली। जब उसने देखा कि हनुमान्जी मूर्छित हो गये हैं, तब वह उनको नागपाशसे बाँधकर ले गया॥ १ ॥
जामु नाम जपि सुनहु भवानी । भव बंधन काटहिं नर ग्यानी॥
तासु दूत कि बंध तरु आवा । प्रभु कारज लगि कपिहिं बँधावा॥
[शिवजी कहते हैं—] हे भवानी! सुनो, जिनका नाम जपकर ज्ञानी (विवेकी) मनुष्य संसार (जन्म-मरण) के बन्धनको काट डालते हैं, उनका दूत कहीं बन्धनमें आ सकता है? किन्तु प्रभुके कार्यके लिये हनुमान्जीने स्वयं अपनेको बँधा लिया॥ २ ॥
कपि बंधन सुनि निसिचर धाए । कौतुक लागि सभा सव आए॥
दसमुख सभा दीखि कपि जाई । कहि न जाइ कछु अति प्रभुताई॥