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भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

पृष्ठ 735, कुल 1058 में से

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पृष्ठ 735
  • सुन्दरकाण्ड *

७३३

बंदरका बाँधा जाना सुनकर राक्षस दौड़े और कौतुकके लिये (तमाशा देखनेके लिये) सब सभामें आये। हनुमान्जीने जाकर रावणकी सभा देखी। उसकी अत्यन्त प्रभुता (ऐश्वर्य) कुछ कही नहीं जाती ॥ ३ ॥

कर जोरें सुर दिसिप बिनीता । भूकृटि बिलोकत सकल सभीता ॥ देखि प्रताप न कपि मन संका । जिमि अहिगन महँ गरुड़ असंका ॥

देवता और दिक्पाल हाथ जोड़े बड़ी नम्रताके साथ भयभीत हुए सब रावणकी भाँ ताक रहे हैं। (उसका रुख देख रहे हैं।) उसका ऐसा प्रताप देखकर भी हनुमान्जीके मनमें जरा भी डर नहीं हुआ। वे ऐसे निःशङ्क खड़े रहे जैसे सपोंके समूहमें गरुड़ निःशङ्क (निर्भय) रहते हैं ॥ ४ ॥

दो०—कपिहि बिलोकिक दसानन बिहसा कहि दुर्बादि ।

सुत बध सुरति कीन्हि पुनि उपजा हृदयँ बिषाद ॥ २० ॥

हनुमान्जीको देखकर रावण दुर्वचन कहता हुआ खूब हँसा। फिर पुत्र-बधका स्मरण किया तो उसके हृदयमें विषाद उत्पन्न हो गया ॥ २० ॥

कह लंकेस कवन तैं कीसा । केहि कें बल घालेहि बन खीसा ॥ की धौँ श्रवन सुनेहि नहिं मोही । देखउँ अति असंक सठ तोही ॥

लङ्कापति रावणने कहा—रे वानर! तू कौन है? किसके बलपर तूने बनको उजाड़कर नष्ट कर डाला? क्या तूने कभी मुझे (मेरा नाम और यश) कानोंसे नहीं सुना? रे शठ! मैं तुझे अत्यन्त निःशङ्क देख रहा हूँ ॥ १ ॥

मारे निसिचर केहिं अपराधा । कहु सठ तोहि न प्रान कड़ बाधा ॥

सुनु रावन ब्रह्मांड निकाया । पाड़ जासु बल विरचति माया ॥

तूने किस अपराधसे राक्षसोंको मारा? रे मूर्ख! बता, क्या तुझे प्राण जानेका भय नहीं है? [हनुमान्जीने कहा—] हे रावण! सुन; जिनका बल पाकर माया सम्पूर्ण ब्रह्माण्डोंके समूहोंकी रचना करती है; ॥ २ ॥

जाकें बल विरंचि हरि ईसा । पालत सूजत हरत दससीसा ॥

जा बल सीस धरत सहसानन । अंडकोस समेत गिरि कानन ॥

जिनके बलसे हे दशशीश! ब्रह्मा, विष्णु, महेश (क्रमशः) सृष्टिका सृजन, पालन और संहार करते हैं; जिनके बलसे सहस्रमुख (फणों) वाले शेषजी पर्वत और वनसहित समस्त ब्रह्माण्डको सिरपर धारण करते हैं; ॥ ३ ॥

धरड़ जो बिबिध देह सुरव्राता । तुम्ह से सठन्ह सिखावनु दाता ॥

हर कोदंड कठिन जेहिं भंजा । तेहि समेत नृप दल मद गंजा ॥