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भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

पृष्ठ 743, कुल 1058 में से

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पृष्ठ 743
  • सुन्दरकाण्ड *

७४१

दयाकी राशि श्रीरघुनाथजी सबसे प्रेमसहित गले लगकर मिले और कुशल पूछी। [वानरोने कहा—] हे नाथ! आपके चरणकमलोंके दर्शन पानेसे अब कुशल है ॥ २९ ॥

जामवंत कह सुनु रघुराया । जा पर नाथ करहु तुम्ह दया ॥ ताहि सदा सुभ कुसल निरंतर । सुर नर मुनि प्रसन्न ता ऊपर ॥

जाम्बवान्ने कहा—हे रघुनाथजी! सुनिये। हे नाथ! जिसपर आप दया करते हैं, उसे सदा कल्याण और निरन्तर कुशल है। देवता, मनुष्य और मुनि सभी उसपर प्रसन्न रहते हैं ॥ १ ॥

सोड़ बिजई बिनई गुन सागर । तासु सुजसु त्रैलोक उजागर ॥ प्रभु कौँ कृपा भयउ सबु काजू । जन्म हमार सुफल भा आजू ॥

वही विजयी है, वही विनयी है और वही गुणोंका समुद्र बन जाता है। उसीका सुन्दर यश तीनों लोकोंमें प्रकाशित होता है। प्रभुकी कृपासे सब कार्य हुआ। आज हमारा जन्म सफल हो गया ॥ २ ॥

नाथ पवनसुत कीन्हि जो करनी । सहसहँ मुख न जाड़ सो बरनी ॥ पवनतनय के चरित सुहाए । जामवंत रघुपतिहि सुनाए ॥

हे नाथ! पवनपुत्र हनुमान्ने जो करनी की, उसका हजार मुखोंसे भी वर्णन नहीं किया जा सकता। तब जाम्बवान्ने हनुमान्जीके सुन्दर चरित्र (कार्य) श्रीरघुनाथजीको सुनाये ॥ ३ ॥

सुनत कृपानिधि मन अति भाए । पुनि हनुमान हरषि हियँ लाए ॥ कहहु तात केहि भाँति जानकी । रहति करति रच्छा स्वप्रांन की ॥

[वे चरित्र] सुननेपर कृपानिधि श्रीरामचन्द्रजीके मनको बहुत ही अच्छे लगे। उन्होंने हर्षित होकर हनुमान्जीको फिर हृदयसे लगा लिया और कहा—हे तात! कहो, सीता किस प्रकार रहती और अपने प्राणोंकी रक्षा करती हैं? ॥ ४ ॥

दो०—नाम पाहरू दिवस निसि ध्यान तुम्हार कपाट ।

लोचन निज पद जंत्रित जाहिँ प्रांन केहिँ बाट ॥ ३० ॥

(हनुमान्जीने कहा—) आपका नाम रात-दिन पहरा देनेवाला है, आपका ध्यान ही किंवाड़ है। नेत्रोंको अपने चरणोंमें लगाये रहती हैं, यही ताला लगा है; फिर प्राण जायँ तो किस मार्गसे? ॥ ३० ॥

चलत मोहि चूड़ामनि दीन्ही । रघुपति हृदयँ लाड़ सोड़ लीन्ही ॥ नाथ जुगल लोचन भरि बारी । बचन कहे कछु जनककुमारी ॥

चलते समय उन्होंने मुझे चूड़ामणि [उतारकर] दी। श्रीरघुनाथजीने उसे लेकर हृदयसे लगा लिया। [हनुमान्जीने फिर कहा—] हे नाथ! दोनों नेत्रोंमें जल भरकर जानकीजीने मुझसे कुछ वचन कहे— ॥ १ ॥

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