श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 744, कुल 1058 में से
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- रामचरितमानस *
अनुज समेत गहेहु प्रभु चरना । दीन बंधु प्रनतारति हरना ॥ मन क्रम बचन चरण अनुरागी । केहिं अपराध नाथ हौं त्यागी ॥
छोटे भाईसमेत प्रभुके चरण पकड़ना [और कहना कि] आप दीनबन्धु हैं, शरणागतके दुःखोंको हरनेवाले हैं और मैं मन, वचन और कर्मसे आपके चरणोंकी अनुरागिणी हूँ। फिर स्वामी (आप)ने मुझे किस अपराधसे त्याग दिया? ॥ २ ॥
अवगुन एक मोर मैं माना । बिछुरत प्रान न कीन्ह पयाना ॥ नाथ सो नयनन्हि को अपराधा । निसरत प्रान करहिं हठि बाधा ॥
[हाँ] एक दोष मैं अपना [अवश्य] मानती हूँ कि आपका वियोग होते ही मेरे प्राण नहीं चले गये। किन्तु हे नाथ! यह तो नेत्रोंका अपराध है जो प्राणोंके निकलनेमें हठपूर्वक बाधा देते हैं ॥ ३ ॥
बिरह अगिनि तनु तूल समीरा । स्वास जरड़ छन माहिं सरीरा ॥ नयन स्वर्हिं जलु निज हित लागी । जरें न पाव देह बिरहागी ॥
विरह अग्नि है, शरीर रूई है और श्वास पवन है; इस प्रकार [अग्नि और पवनका संयोग होनेसे] यह शरीर क्षणमात्रमें जल सकता है। परन्तु नेत्र अपने हितके लिये (प्रभुका स्वरूप देखकर सुखी होनेके लिये) जल (आँसू) बरसाते हैं, जिससे विरहकी आगसे भी देह जलने नहीं पाती ॥ ४ ॥
सीता कै अति बिपति बिसाला । बिनिहिं कहें भलि दीनदयाला ॥
सीताजीकी विपत्ति बहुत बड़ी है। हे दीनदयालु! वह बिना कही ही अच्छी है (कहनेसे आपको बड़ा क्लेश होगा) ॥ ५ ॥
दो०— निमिष निमिष करुनानिधि जाहिं कलप सम बीति ।
बेगि चलिअ प्रभु आनिअ भुज बल खल दल जीति ॥ ३१ ॥
हे करुणानिधान! उनका एक-एक पल कल्पके समान बीतता है। अतः हे प्रभु! तुरंत चलिये और अपनी भुजाओंके बलसे दुष्टोंके दलको जीतकर सीताजीको ले आइये ॥ ३१ ॥
सुनि सीता दुख प्रभु सुख अयना । भरि आए जल राजिव नयना ॥
बचन कार्यं मन मम गति जाही । सपनेहुँ बूझिअ बिपति कि ताही ॥
सीताजीका दुःख सुनकर सुखके धाम प्रभुके कमलनेत्रोंमें जल भर आया [और वे बोले—] मन, वचन और शरीरसे जिसे मेरी ही गति (मेरा ही आश्रय) है, उसे क्या स्वप्नमें भी विपत्ति हो सकती है? ॥ १ ॥
कह हनुमंत बिपति प्रभु सोई । जब तव सुमिरन भजन न होई ॥
केतिक बात प्रभु जातुधान की । रिपुहि जीति आनिबी जानकी ॥