सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

पृष्ठ 745, कुल 1058 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 745
  • सुन्दरकाण्ड *

७४३

हनुमान्जीने कहा—हे प्रभो! विपत्ति तो वही (तभी) है जब आपका भजन-स्मरण न हो। हे प्रभो! राक्षसोंकी बात ही कितनी है? आप शत्रुको जीतकर जानकीजीको ले आवेंगे ॥ २ ॥

सुनु कपि तोहि समान उपकारी । नहीं कोउ सुर नर मुनि तनुधारी ॥ प्रति उपकार करौँ का तोरा । सनमुख होइ न सकत मन मोरा ॥

[भगवान् कहने लगे—] हे हनुमान्! सुन; तेरे समान मेरा उपकारी देवता, मनुष्य अथवा मुनि कोई भी शरीरधारी नहीं है। मैं तेरा प्रत्युपकार (बदलेमें उपकार) तो क्या करूँ, मेरा मन भी तेरे सामने नहीं हो सकता ॥ ३ ॥

सुनु सुत तोहि उरिन मैं नाहीँ । देखेउँ करि बिचार मन माहीं ॥ पुनि पुनि कपिहि चितव सुरत्राता । लोचन नीर पुलक अति गाता ॥

हे पुत्र! सुन; मैंने मनमें [खूब] विचार करके देख लिया कि मैं तुझसे उन्नृण नहीं हो सकता। देवताओंके रक्षक प्रभु बार-बार हनुमान्जीको देख रहे हैं। नेत्रोंमें प्रेमाश्रुओंका जल भरा है और शरीर अत्यन्त पुलकित है ॥ ४ ॥

दो०— सुनि प्रभु बचन बिलोकि मुख गात हरषि हनुमंत ।

चरन परेउ प्रेमाकुल त्राहि त्राहि भगवंत ॥ ३२ ॥

प्रभुके वचन सुनकर और उनके [प्रसन्न] मुख तथा [पुलकित] अंगोंको देखकर हनुमान्जी हर्षित हो गये और प्रेममें विकल होकर 'हे भगवन्! मेरी रक्षा करो, रक्षा करो' कहते हुए श्रीरामजीके चरणोंमें गिर पड़े ॥ ३२ ॥

बार बार प्रभु चहड़ उठावा । प्रेम मगन तेहि उठब न भावा ॥ प्रभु कर पंकज कपि कें सीसा । सुमिरि सो दसा मगन गौरीसा ॥

प्रभु उनको बार-बार उठाना चाहते हैं, परन्तु प्रेममें डूबे हुए हनुमान्जीको चरणोंसे उठना सुहाता नहीं। प्रभुका कर-कमल हनुमान्जीके सिरपर है। उस स्थितिका स्मरण करके शिवजी प्रेममग्न हो गये ॥ १ ॥

सावधान मन करि पुनि संकर । लागे कहन कथा अति सुंदर ॥ कपि उठाइ प्रभु हृदयै लगावा । कर गहि परम निकट बैठावा ॥

फिर मनको सावधान करके शङ्करजी अत्यन्त सुन्दर कथा कहने लगे—हनुमान्जीको उठाकर प्रभुने हृदयसे लगाया और हाथ पकड़कर अत्यन्त निकट बैठा लिया ॥ २ ॥

कहु कपि रावन पालित लंका । केहि बिधि देहेउ दुर्ग अति बंका ॥ प्रभु प्रसन्न जाना हनुमाना । बोला बचन बिगत अभिमाना ॥