श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 746, कुल 1058 में से
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- रामचरितमानस *
हे हनुमान्! बताओ तो, रावणके द्वारा सुरक्षित लङ्का और उसके बड़े बाँके किलेको तुमने किस तरह जलाया? हनुमान्जीने प्रभुको प्रसन्न जाना और वे अभिमानरहित वचन बोले— ॥ ३ ॥
सारखामृग कै बड़ि मनुसाई । सारखा तें सारखा पर जाई ॥ नाधि सिंधु हाटकपुर जारा । निसिचर गन बधि बिपिन उजारा ॥
बंदरका बस, यही बड़ा पुरुषार्थ है कि वह एक डालसे दूसरी डालपर चला जाता है। मैंने जो समुद्र लाँधकर सोनेका नगर जलाया और राक्षसगणको मारकर अशोकवनको उजाड़ डाला, ॥ ४ ॥
सो सब तव प्रताप रघुराई । नाथ न कछू मोरि प्रभुताई ॥
यह सब तो हे श्रीरघुनाथजी! आपहीका प्रताप है। हे नाथ! इसमें मेरी प्रभुता (बड़ाई) कुछ भी नहीं है ॥ ५ ॥
दो०— ता कहूँ प्रभु कछु अगम नहीं जा पर तुम्ह अनुकूल ।
तव प्रभावें बड़वानलहि जारि सकड़ खलु तूल ॥ ३३ ॥
हे प्रभु! जिसपर आप प्रसन्न हों, उसके लिये कुछ भी कठिन नहीं है। आपके प्रभावसे रूई [जो स्वयं बहुत जल्दी जल जानेवाली वस्तु है] बड़वानलको निश्चय ही जला सकती है (अर्थात् असम्भव भी सम्भव हो सकता है) ॥ ३३ ॥
नाथ भगति अति सुखदायनी । देहु कृपा करि अनपायनी ॥ सुनि प्रभु परम सरल कपि बानी । एवमस्तु तब कहेउ भवानी ॥
हे नाथ! मुझे अत्यन्त सुख देनेवाली अपनी निश्चल भक्ति कृपा करके दीजिये। हनुमान्जीकी अत्यन्त सरल वाणी सुनकर, हे भवानी! तब प्रभु श्रीरामचन्द्रजीने ‘एवमस्तु’ (ऐसा ही हो) कहा ॥ १ ॥
उमा राम सुभाउ जेहिन जाना । ताहि भजनु तजि भाव न आना ॥ यह संवाद जासु उर आवा । रघुपति चरन भगति सोड़ पावा ॥
हे उमा! जिसने श्रीरामजीका स्वभाव जान लिया, उसे भजन छोड़कर दूसरी बात ही नहीं सुहाती! यह स्वामी-सेवकका संवाद जिसके हृदयमें आ गया, वही श्रीरघुनाथजीके चरणोंकी भक्ति पा गया ॥ २ ॥
सुनि प्रभु बचन कहहिन कपिबृंदा । जय जय जय कृपाल सुखकंददा ॥ तब रघुपति कपिपतिहि बोलावा । कहा चलैं कर करहु बनावा ॥