श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 747, कुल 1058 में से
संदर्भ में पढ़ें- सुन्दरकाण्ड *
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प्रभुके वचन सुनकर वानरगण कहने लगे—कृपालु आनन्दकन्द श्रीरामजीकी जय हो, जय हो, जय हो! तब श्रीरघुनाथजीने कपिराज सुग्रीवको बुलाया और कहा—चलनेकी तैयारी करो ॥ ३ ॥ अब बिलंबु केहि कारन कीजे । तुरत कपिन्ह कहुँ आयसु दीजे ॥ कौतुक देखि सुमन बहु बरषी । नभ तें भवन चले सुर हरषी ॥
अब विलम्ब किस कारण किया जाय? वानरोंको तुरंत आज़्ञा दो। [भगवान्की] यह लीला (रावणवधकी तैयारी) देखकर, बहुत-से फूल बरसाकर और हर्षित होकर देवता आकाशसे अपने-अपने लोकको चले ॥ ४ ॥
दो०—कपिपति बेगि बोलाए आए जूथप जूथ।
नाना बरन अतुल बल वानर भालु बस्त्रथ ॥ ३४ ॥
वानरराज सुग्रीवने शीघ्र ही वानरोंको बुलाया, सेनापतियोंके समूह आ गये। वानर-भालुओंके झुंड अनेक रंगोंके हैं और उनमें अतुलनीय बल है ॥ ३४ ॥
प्रभु पद पंकज नावहिं सीसा । गर्जहिं भालु महाबल कीसा ॥ देखी राम सकल कपि सेना । चितइ कृपा करि राजिव नैना ॥
वे प्रभुके चरणकमलोंमें सिर नवाते हैं। महान् बलवान् रीछ और वानर गरज रहे हैं। श्रीरामजीने वानरोंकी सारी सेना देखी। तब कमलनेत्रोंसे कृपापूर्वक उनकी ओर दृष्टि डाली ॥ १ ॥
राम कृपा बल पाइ कपिंदा । भए पच्छजुत मनहुँ गिरिंदा ॥ हरषि राम तब कीन्ह पयाना । सगुन भए सुंदर सुभ नाना ॥
रामकृपाका बल पाकर श्रेष्ठ वानर मानो पंखवाले बड़े पर्वत हो गये। तब श्रीरामजीने हर्षित होकर प्रस्थान (कूच) किया। अनेक सुन्दर और शुभ शकुन हुए ॥ २ ॥
जासु सकल मंगलमय कीती । तासु पयान सगुन यह नीती ॥ प्रभु पयान जाना बैदेहीं । फरकि बाम अँग जनु कहि देहीं ॥
जिनकी कीर्ति सब मङ्गलोंसे पूर्ण है, उनके प्रस्थानके समय शकुन होना, यह नीति है (लीलाकी मर्यादा है)। प्रभुका प्रस्थान जानकीजीने भी जान लिया। उनके बायें अङ्ग फड़क-फड़ककर मानो कहे देते थे [कि श्रीरामजी आ रहे हैं] ॥ ३ ॥
जोड़ जोड़ सगुन जानकिहि होई । असगुन भयउ रावनहि सोई ॥ चला कटकु को बरनैं पारा । गर्जहिं वानर भालु अपारा ॥
जानकीजीको जो-जो शकुन होते थे, वही-वही रावणके लिये अपशकुन हुए। सेना चली, उसका वर्णन कौन कर सकता है? असंख्य वानर और भालू गर्जना कर रहे हैं ॥ ४ ॥