सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

पृष्ठ 785, कुल 1058 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 785
  • लङ्काकाण्ड *

७८३

पूर्व दिशारूपी पर्वतकी गुफामें रहनेवाला, अत्यन्त प्रताप, तेज और बलकी राशि यह चन्द्रमारूपी सिंह अन्धकाररूपी मतवाले हाथीके मस्तकको विदीर्ण करके आकाशरूपी वनमें निर्भय विचर रहा है ॥ १ ॥

बिथुरे नभ मुकुताहल तारा । निसि सुंदरी केर सिंगारा ॥ कह प्रभु ससि महुँ मेचकताई । कहहु काह निज निज मति भाई ॥

आकाशमें बिखरे हुए तारे मोतियोंके समान हैं, जो रात्रिरूपी सुन्दर स्त्रीके शृङ्गार हैं। प्रभुने कहा—भाइयो! चन्द्रमामें जो कालापन है वह क्या है? अपनी-अपनी बुद्धिके अनुसार कहो ॥ २ ॥

कह सुग्रीव सुनहु रघुराई । ससि महुँ प्रगट भूमि कै झाँई ॥ मारेउ राहु ससिहि कह कोई । उर महुँ परी स्यामता सोई ॥

सुग्रीवने कहा—हे रघुनाथजी! सुनिये। चन्द्रमामें पृथ्वीकी छाया दिखायी दे रही है। किसीने कहा—चन्द्रमाको राहुने मारा था। वही [चोटका] काला दाग हृदयपर पड़ा हुआ है ॥ ३ ॥

कोउ कह जब बिधि रति मुख कीन्हा । सार भाग ससि कर हरि लीन्हा ॥ छिद्र सो प्रगट इंदु उर माहीं । तेहि मग देखिअ नभ परिछाहीं ॥

कोई कहता है—जब ब्रह्मणे [कामदेवकी स्त्री] रतिका मुख बनाया, तब उसने चन्द्रमाका सार भाग निकाल लिया [जिससे रतिका मुख तो परम सुन्दर बन गया, परन्तु चन्द्रमाके हृदयमें छेद हो गया]। वही छेद चन्द्रमाके हृदयमें वर्तमान है, जिसकी राहसे आकाशकी काली छाया उसमें दिखायी पड़ती है ॥ ४ ॥

प्रभु कह गरल बंधु ससि केरा । अति प्रिय निज उर दीन्ह बसेरा ॥ बिष संजुत कर निकर पसारी । जारत बिरहवंत नर नारी ॥

प्रभु श्रीरामजीने कहा—विष चन्द्रमाका बहुत प्यारा भाई है। इसीसे उसने विषको अपने हृदयमें स्थान दे रखा है। विषयुक्त अपने किरणसमूहको फैलाकर वह वियोगी नर-नारियोंको जलाता रहता है ॥ ५ ॥

दो०— कह हनुमंत सुनहु प्रभु ससि तुम्हार प्रिय दास ।

तव मूरति बिधु उर बसति सोड़ स्यामता अभ्रास ॥ १२ ( क ) ॥

हनुमान्जीने कहा—हे प्रभो! सुनिये, चन्द्रमा आपका प्रिय दास है। आपकी सुन्दर श्याम मूर्ति चन्द्रमाके हृदयमें बसती है, वही श्यामताकी झलक चन्द्रमामें है ॥ १२ ( क ) ॥

नवाह्यपारायण, सातवाँ विश्राम

पवन तनय के बचन सुनि बिहँसे रामु सुजान ।

दच्छिन दिसि अवलोकि प्रभु बोले कृपा निधान ॥ १२ ( ख ) ॥