श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 786, कुल 1058 में से
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- रामचरितमानस *
पवनपुत्र हनुमान्जीके वचन सुनकर सुजान श्रीरामजी हँसे। फिर दक्षिणकी ओर देखकर कृपानिधान प्रभु बोले— ॥ १२ (ख) ॥
देखु बिभीषण दच्छिन्न आसा। घन घमंड दामिनी बिलासा॥ मधुर मधुर गरजइ घन घोरा। होइ बृष्टि जनि उपल कठोरा॥
हे विभीषण! दक्षिण दिशाकी ओर देखो, बादल कैसा घुमड़ रहा है और बिजली चमक रही है। भयानक बादल मीठे-मीठे (हलके-हलके) स्वरसे गरज रहा है। कहीं कठोर ओलोंकी वर्षा न हो! ॥ १ ॥
कहत बिभीषण सुनहु कृपाला। होइ न तडित न बारिद माला॥ लंका सिखर उपर आगारा। तहँ दसकंधर देख अखारा॥
विभीषण बोले—हे कृपालु! सुनिये, यह न तो बिजली है, न बादलोंकी घटा। लंकाकी चोटीपर एक महल है। दशग्रीव रावण वहाँ [नाच-गानका] अखाड़ा देख रहा है ॥ २ ॥
छत्र मेघडंबर सिर धारी। सोड़ जनु जलद घटा अति कारी॥ मन्दोदरी श्रवन ताटंका। सोड़ प्रभु जनु दामिनी दमंका॥
रावणने सिरपर मेघडंबर (बादलोंके डंबर-जैसा विशाल और काला) छत्र धारण कर रखा है। वही मानो बादलोंकी अत्यन्त काली घटा है। मन्दोदरीके कानोंमें जो कर्णफूल हिल रहे हैं, हे प्रभो! वही मानो बिजली चमक रही है ॥ ३ ॥
बाजहिं ताल मृदंग अनुपा। सोड़ रव मधुर सुनहु सुरभूपा॥ प्रभु मुसुकान समुझि अभिमाना। चाप चढ़ाइ बान संधाना॥
हे देवताओंके सम्राट्! सुनिये, अनुपम ताल और मृदंग बज रहे हैं। वही मधुर [गर्जन] ध्वनि है। रावणका अभिमान समझकर प्रभु मुसकराये। उन्होंने धनुष चढ़ाकर उसपर बाणका सन्धान किया; ॥ ४ ॥
दो०—छत्र मुकुट ताटंक तब होते एकहीं बान।
सब कें देखत महि परे मरमु न कोऊ जान ॥ १३ (क) ॥
और एक ही बाणसे [रावणके] छत्र-मुकुट और [मन्दोदरीके] कर्णफूल काट गिराये। सबके देखते-देखते वे जमीनपर आ पड़े, पर इसका भेद (कारण) किसाने नहीं जाना ॥ १३ (क) ॥
अस कौतुक करि राम सर प्रबिसेउ आइ निषंग।
रावन सभा संसंक सब देखि महा रसभंग ॥ १३ (ख) ॥
ऐसा चमत्कार करके श्रीरामजीका बाण [वापस] आकर [फिर] तरकसमें जा घुसा। यह महान् रस-भंग (रंगमें भंग) देखकर रावणकी सारी सभा भयभीत हो गयी ॥ १३ (ख) ॥