श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 787, कुल 1058 में से
संदर्भ में पढ़ें- लङ्काकाण्ड *
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कंप न भूमि न मरुत बिसेषा । अस्त्र सस्त्र कछु नयन न देखा ॥ सोचहिं सब निज हृदय मझारी । असगुन भयउ भयंकर भारी ॥
न भूकम्प हुआ, न बहुत जोरकी हवा (आँधी) चली। न कोई अस्त्र-शस्त्र ही नेत्रोंसे देखे। [फिर ये छत्र, मुकुट और कर्णफूल कैसे कटकर गिर पड़े?] सभी अपने-अपने हृदयमें सोच रहे हैं कि यह बड़ा भयङ्कर अपशकुन हुआ!! १ ॥
दसमुख देखि सभा भय पाई । बिहसि बचन कह जुगुति बनाई ॥ सिरउ गिरे संतत सुभ जाही । मुकुट परे कस असगुन ताही ॥
सभाको भयभीत देखकर रावणने हँसकर युक्ति रचकर ये वचन कहे—सिरोंका गिरना भी जिसके लिये निरन्तर शुभ होता रहा है, उसके लिये मुकुटका गिरना अपशकुन कैसा? ॥ २ ॥
सयन करहु निज निज गृह जाई । गवने भवन सकल सिर नाई ॥ मंदोदरी सोच उर बसेऊ । जब ते श्रवनपूर महि खसेऊ ॥
अपने-अपने घर जाकर सो रहो [डरनेकी कोई बात नहीं है] तब सब लोग सिर नवाकर घर गये। जबसे कर्णफूल पृथ्वीपर गिरा, तबसे मन्दोदरीके हृदयमें सोच बस गया ॥ ३ ॥
सजल नयन कह जुग कर जोरी । सुनुहु प्रानपति बिनती मोरी ॥ कंत राम विरोध परिहरहू । जानि मनुज जनि हठ मन धरहू ॥
नेत्रोंमें जल भरकर, दोनों हाथ जोड़कर वह [रावणसे] कहने लगी—हे प्राणनाथ! मेरी विनती सुनिये। हे प्रियतम! श्रीरामसे विरोध छोड़ दीजिये। उन्हें मनुष्य जानकर मनमें हठ न पकड़े रहिये ॥ ४ ॥
दो०—बिस्वरूप रघुबंस मनि करहु बचन बिस्वासु। लोक कल्पना बेद कर अंग अंग प्रति जासु ॥ १४ ॥
मेरे इन वचनोंपर विश्वास कीजिये कि वे रघुकुलके शिरोमणि श्रीरामचन्द्रजी विश्वरूप हैं—(यह सारा विश्व उन्हींका रूप है) वेद जिनके अङ्ग-अङ्गमें लोकोंकी कल्पना करते हैं ॥ १४ ॥
पद पाताल सीस अज धामा । अपर लोक अँग अँग बिश्रामा ॥ भूकृति बिलास भयंकर काला । नयन दिवाकर कच घन माला ॥
पाताल [जिन विश्वरूप भगवान्का] चरण है, ब्रह्मलोक सिर है, अन्य (बीचके सब) लोकोंका विश्राम (स्थिति) जिनके अन्य भिन्न-भिन्न अङ्गोंपर है। भयङ्कर काल जिनका भूकृटिसंचालन (भौहोंका चलना) है। सूर्य नेत्र है, बादलोंका समूह बाल है ॥ १ ॥