श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 788, कुल 1058 में से
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- रामचरितमानस *
जासु घ्रान अस्विनीकुमारा । निसि अरु दिवस निमेष अपारा ॥ श्रवन दिसा दस बेद बखानी । मारुत स्वास निगम निज बानी ॥
अश्विनीकुमार जिनकी नासिका हैं, रात और दिन जिनके अपार निमेष (पलक मारना और खोलना) हैं। दसों दिशाएँ कान हैं, वेद ऐसा कहते हैं। वायु श्वास है और वेद जिनकी अपनी वाणी है ॥ २ ॥
अधर लोभ जम दसन कराला । माया हास बाहु दिगपाला ॥ आनन अनल अंबुपति जीहा । उत्पति पालन प्रलय समीहा ॥
लोभ जिनका अधर (होठ) है, यमराज भयानक दाँत है। माया हँसी है, दिग्पाल भुजाएँ हैं। अग्नि मुख है, वरुण जीभ है। उत्पति, पालन और प्रलय जिनकी चेष्टा (क्रिया) है ॥ ३ ॥
रोम राजि अष्टादस भारा । अस्थि सैल सरिता नस जारा ॥ उदर उदधि अधगो जातना । जगमय प्रभु का बहु कल्पना ॥
अठारह प्रकारकी असंख्य वनस्पतियाँ जिनकी रोमावली हैं, पर्वत अस्थियाँ हैं, नदियाँ नसोंका जाल हैं, समुद्र पेट है और नरक जिनकी नीचेकी इन्द्रियाँ हैं। इस प्रकार प्रभु विश्वमय हैं, अधिक कल्पना (ऊहापोह) क्या की जाय ? ॥ ४ ॥
दो०—अहंकार सिव बुद्धि अज मन ससि चित्त महान ।
मनुज बास सचराचर रूप राम भगवान ॥ १५ ( क ) ॥
शिव जिनका अहंकार हैं, ब्रह्मा बुद्धि हैं, चन्द्रमा मन हैं और महान् (विष्णु) ही चित्त हैं। उन्हीं चराचररूप भगवान् श्रीरामजीने मनुष्यरूपमें निवास किया है ॥ १५ ( क ) ॥
अस बिचारि सुनु प्रानपति प्रभु सन बयरु बिहाइ ।
प्रीति करहु रघुबीर पद मम अहिवात न जाइ ॥ १५ ( ख ) ॥
हे प्राणपति! सुनिये, ऐसा विचारकर प्रभुसे वैर छोड़कर श्रीरघुवीरके चरणोंमें प्रेम कीजिये, जिससे मेरा सुहाग न जाय ॥ १५ ( ख ) ॥
बिहँसा नारि बचन सुनि काना । अहो मोह महिमा बलवाना ॥ नारि सुभाउ सत्य सब कहहीं । अवगुन आठ सदा उर रहहीं ॥
पत्नीके वचन कानोंसे सुनकर रावण खूब हँसा [और बोला—] अहो! मोह (अज्ञान) की महिमा बड़ी बलवान् है! स्त्रीका स्वभाव सब सत्य ही कहते हैं कि उसके हृदयमें आठ अवगुण सदा रहते हैं— ॥ १ ॥
साहस अनूत चपलता माया । भय अबिबेक असौच अदाया ॥ रिपु कर रूप सकल तैं गावा । अति बिसाल भय मोहि सुनावा ॥