श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 790, कुल 1058 में से
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- रामचरितमानस *
नीक मंत्र सब के मन माना । अंगद सन कह कृपानिधाना ॥ बालितनय बुधि बल गुन धामा । लंका जाहु तात मम कामा ॥
यह अच्छी सलाह सबके मनमें जँच गयी। कृपाके निधान श्रीरामजीने अंगदसे कहा—हे बल, बुद्धि और गुणोंके धाम बालिपुत्र! हे तात! तुम मेरे कामके लिये लङ्का जाओ ॥ ३ ॥
बहुत बुझाइ तुम्हहि का कहऊँ। परम चतुर मैं जानत अहऊँ ॥ काजु हमार तासु हित होई। रिपु सन करेहु बतकही सोई ॥
तुमको बहुत समझाकर क्या कहूँ! मैं जानता हूँ, तुम परम चतुर हो। शत्रुसे वही बातचीत करना जिससे हमारा काम हो और उसका कल्याण हो ॥ ४ ॥
सो०—प्रभु अग्या धरि सीस चरन बंदि अंगद उठेउ।
सोइ गुन सागर ईस राम कृपा जा पर करहु ॥ १७ (क) ॥
प्रभुकी आज्ञा सिर चढ़ाकर और उनके चरणोंकी वन्दना करके अंगदजी उठे [और बोले—] हे भगवान् श्रीरामजी! आप जिसपर कृपा करें, वही गुणोंका समुद्र हो जाता है ॥ १७ (क) ॥
स्वयंसिद्ध सब काज नाथ मोहि आदरु दियउ।
अस बिचारि जुबराज तन पुलकित हरषित हियउ ॥ १७ (ख) ॥
स्वामीके सब कार्य अपने-आप सिद्ध हैं; यह तो प्रभुने मुझको आदर दिया है [जो मुझे अपने कार्यपर भेज रहे हैं]। ऐसा विचारकर युवराज अंगदका हृदय हर्षित और शरीर पुलकित हो गया ॥ १७ (ख) ॥
बंदि चरन उर धरि प्रभुताई। अंगद चलेउ सबहि सिरु नाई ॥ प्रभु प्रताप उर सहज असंका। रन बाँकुरा बालिसुत बंका ॥
चरणोंकी वन्दना करके और भगवान्की प्रभुता हृदयमें धरकर अंगद सबको सिर नवाकर चले। प्रभुके प्रतापको हृदयमें धारण किये हुए रणबाँकुरे वीर बालिपुत्र स्वाभाविक ही निर्भय हैं ॥ १ ॥
पुर पैठत रावन कर बेटा। खेलत रहा सो होइ गै भेटा ॥ बातहिं बात करष बदि आई। जुगल अतुल बल पुनि तरुनाई ॥
लङ्कामें प्रवेश करते ही रावणके पुत्रसे भेंट हो गयी, जो वहाँ खेल रहा था। बातों-ही-बातोंमें दोनोंमें झगड़ा बढ़ गया। [क्योंकि] दोनों ही अतुलनीय बलवान् थे और फिर दोनोंकी युवावस्था थी ॥ २ ॥
तेहिं अंगद कहुँ लात उठाई। गहि पद पटकेउ भूमि भवाई ॥ निसिचर निकर देखि भट भारी। जहाँ तहाँ चले न सकहिं पुकारी ॥