श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 791, कुल 1058 में से
संदर्भ में पढ़ें- लङ्काकाण्ड *
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उसने अंगदपर लात उठायी। अंगदने [वही] पैर पकड़कर उसे घुमाकर जमीनपर दे पटक (मार गिराया)। राक्षसके समूह भारी योद्धा देखकर जहाँ-तहाँ [भाग] चले, वे डरके मारे पुकार भी न मचा सके ॥ ३ ॥
एक एक सन मरमु न कहहीं। समुद्धि तासु बध चुप करि रहहीं ॥ भयउ कोलाहल नगर मझारी। आवा कपि लंका जेहिं जारी ॥
एक-दूसरेको मर्म (असली बात) नहीं बतलाते, उस (रावणके पुत्र)का बध समझकर सब चुप मारकर रह जाते हैं। [रावण-पुत्रकी मृत्यु जानकर और राक्षसोंको भयके मारे भागते देखकर] नगरभरमें कोलाहल मच गया कि जिसने लङ्का जलायी थी, वही वानर फिर आ गया है ॥ ४ ॥
अब थीं कहा करिहि करतारा। अति सभीत सब करहिं बिचारा ॥ बिनु पूछें मगु देहिं दिखाई। जेहि बिलोक सोड़ जाइ सुखाई ॥
सब अत्यन्त भयभीत होकर विचार करने लगे कि विधाता अब न जाने क्या करेगा। वे बिना पूछे ही अंगदको [रावणके दरबारकी] राह बता देते हैं। जिसे ही वे देखते हैं वही डरके मारे सूख जाता है ॥ ५ ॥
दो०—गयउ सभा दरबार तब सुमिरि राम पद कंज।
सिंह ठवनि इत उत चितव धीर बीर बल पुंज ॥ १८ ॥
श्रीरामजीके चरणकमलोंका स्मरण करके अंगद रावणकी सभाके द्वारपर गये। और वे धीर, वीर और बलकी राशि अंगद सिंहकी-सी ऐंड (शान) से इधर-उधर देखने लगे ॥ १८ ॥
तुरत निसाचर एक पठावा। समाचार रावनहि जनावा ॥ सुनत बिहँसि बोला दससीसा। आनहु बोलि कहाँ कर कीसा ॥
तुरंत ही उन्होंने एक राक्षसको भेजा और रावणको अपने आनेका समाचार सूचित किया। सुनते ही रावण हँसकर बोला—बुला लाओ, [देखें] कहाँका बंदर है ॥ १ ॥
आयसु पाइ दूत बहु धाए। कपिकुंजरहि बोलि लै आए ॥ अंगद दीख दसानन बैसें। सहित प्रान कज्जलगिरि जैसें ॥
आज्ञा पाकर बहुत-से दूत दौड़े और वानरोंमें हाथीके समान अंगदको बुला लाये। अंगदने रावणको ऐसे बैठे हुए देखा जैसे कोई प्राणयुक्त (सजीव) काजलका पहाड़ हो! ॥ २ ॥
भुजा बिटप सिर सृंग समाना। रोमावली लता जनु नाना ॥ मुख नासिका नयन अरु काना। गिरि कंदरा खोह अनुमाना ॥