श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 792, कुल 1058 में से
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- रामचरितमानस *
भुजाएँ वृक्षोंके और सिर पर्वतोंके शिखरोंके समान हैं। रोमावली मानो बहुत-सी लताएँ हैं। मुँह, नाक, नेत्र और कान पर्वतकी कन्दराओं और खोहोंके बराबर हैं ॥ ३ ॥
गयउ सभाँ मन नेकु न मुरा । बालितनय अतिबल बाँकुरा ॥ उठे सभासद कपि कहुँ देखी । रावन उर भा क्रोध बिसेषी ॥
अत्यन्त बलवान् बाँके वीर बालिपुत्र अंगद सभामें गये, वे मनमें जरा भी नहीं झिझके। अंगदको देखते ही सब सभासद् उठ खड़े हुए। यह देखकर रावणके हृदयमें बड़ा क्रोध हुआ ॥ ४ ॥
दो०— जथा मत्त गज जूथ महुँ पंचानन चलि जाइ।
राम प्रताप सुमिरि मन बैठ सभाँ सिरु नाइ ॥ १९ ॥
जैसे मतवाले हाथियोंके झुंडमें सिंह [निःशङ्क होकर] चला जाता है, वैसे ही श्रीरामजीके प्रतापका हृदयमें स्मरण करके वे [निर्भय] सभामें सिर नवाकर बैठ गये ॥ १९ ॥
कह दसकंठ कवन तैं बंदर । मैं रघुबीर दूत दसकंधर ॥ मम जनकहि तोहि रही मिताई । तव हित कारन आयउँ भाई ॥
रावणने कहा—अरे बंदर! तू कौन है? [अंगदने कहा—] हे दशग्रीव! मैं श्रीरघुवीरका दूत हूँ। मेरे पितासे और तुमसे मित्रता थी। इसलिये हे भाई! मैं तुम्हारी भलाईके लिये ही आया हूँ ॥ १ ॥
उत्तम कुल पुलस्ति कर नाती । सिव बिरंचि पूजेहु बहु भाँती ॥ बर पायहु कीन्हेहु सब काजा । जीतेहु लोकपाल सब राजा ॥
तुम्हारा उत्तम कुल है, पुलस्त्य ऋषिके तुम पौत्र हो। शिवजीकी और ब्रह्माजीकी तुमने बहुत प्रकारसे पूजा की है। उनसे वर पाये हैं और सब काम सिद्ध किये हैं। लोकपालों और सब राजाओंको तुमने जीत लिया है ॥ २ ॥
नृप अभिमान मोह बस किंबा । हरि आनिहु सीता जगदंबा ॥ अब सुभ कहा सुनुहु तुम्ह मोरा । सब अपराध छमिहि प्रभु तोरा ॥
राजमदसे या मोहवश तुम जगज्जननी सीताजीको हर लाये हो। अब तुम मेरे शुभ वचन (मेरी हितभरी सलाह) सुनो! [उसके अनुसार चलनेसे] प्रभु श्रीरामजी तुम्हारे सब अपराध क्षमा कर देंगे ॥ ३ ॥
दसन गहहु तून कंठ कुठारी । परिजन सहित संग निज नारी ॥ सादर जनकसुता करि आगें । एहि बिधि चलहु सकल भय त्यागें ॥
दांतोंमें तिनका दबाओ, गलेमें कुल्हाड़ी डालो और कुटुम्बियोंसहित अपनी स्त्रियोंको साथ लेकर, आदरपूर्वक जानकीजीको आगे करके, इस प्रकार सब भय छोड़कर चलो— ॥ ४ ॥