श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 799, कुल 1058 में से
संदर्भ में पढ़ें- लङ्काकाण्ड *
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उस (महान् प्रतापी और जगत्प्रसिद्ध) रावणको (मुझे) तू छोटा कहता है और मनुष्यकी बड़ाई करता है? अरे दुष्ट, असभ्य, तुच्छ बंदर! अब मैंने तेरा ज्ञान जान लिया ॥ २५ ॥
सुनि अंगद सकोप कह बानी । बोलु सँभारि अधम अभिमानी ॥ सहसबाहु भुज गहन अपारा । दहन अनल सम जासु कुठारा ॥
रावणके ये वचन सुनकर अंगद क्रोधसहित वचन बोले—अरे नीच अभिमानी! सँभालकर (सोच-समझकर) बोल। जिनका फरसा सहसबाहुकी भुजाओंरूपी अपार वनको जलानेके लिये अग्निके समान था, ॥ १ ॥
जासु परसु सागर खर धारा । बूड़े नृप अगनिनत बहु बारा ॥ तासु गर्ब जेहि देखत भागा । सो नर क्यों दससीस अभागा ॥
जिनके फरसारूपी समुद्रकी तीव्र धारामें अनगिनत राजा अनेकों बार डूब गये, उन परशुरामजीका गर्व जिन्हें देखते ही भाग गया, अरे अभागे दशशीश! वे मनुष्य क्योंकर हैं? ॥ २ ॥
राम मनुज कस रे सठ बंगा । धन्वी कामु नदी पुनि गंगा ॥ पसु सुरधेनु कल्पतरु रूखा । अन्न दान अरु रस पीयूषा ॥
क्यों रे मूर्ख उद्दण्ड! श्रीरामचन्द्रजी मनुष्य हैं? कामदेव भी क्या धनुर्धारी है? और गङ्गाजी क्या नदी है? कामधेनु क्या पशु है? और कल्पवृक्ष क्या पेड़ है? अन्न भी क्या दान है? और अमृत क्या रस है? ॥ ३ ॥
बैनतेय खग अहि सहसानन । चिंतामनि पुनि उपल दसानन ॥ सुनु मतिमंद लोक बैकुंठा । लाभ कि रघुपति भगति अकुंठा ॥
गरुड़जी क्या पक्षी हैं? शेषजी क्या सर्प हैं? अरे रावण! चिन्तामणि भी क्या पत्थर है? अरे ओ मूर्ख! सुनु, बैकुण्ठ भी क्या लोक है? और श्रीरघुनाथजीकी अखण्ड भक्ति क्या [और लाभों-जैसा ही] लाभ है? ॥ ४ ॥
दो०— सेन सहित तव मान मथि बन उजारि पुर जारि ।
कस रे सठ हनुमान कपि गयउ जो तव सुत मारि ॥ २६ ॥
सेनासमेत तेरा मान मथकर, अशोकवनको उजाड़कर, नगरको जलाकर और तेरे पुत्रको मारकर जो लौट गये [तू उनका कुछ भी न बिगाड़ सका], क्यों रे दुष्ट! वे हनुमानजी क्या वानर हैं? ॥ २६ ॥
सुनु रावन परिहरि चतुराई । भजसि न कृपासिंधु रघुराई ॥ जौं खल भएसि राम कर द्रोही । ब्रह्म रुद्र सक राखि न तोही ॥