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भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

पृष्ठ 800, कुल 1058 में से

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पृष्ठ 800

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  • रामचरितमानस *

अरे रावण! चतुराई (कपट) छोड़कर सुन। कृपाके समुद्र श्रीरघुनाथजीका तू भजन क्यों नहीं करता? अरे दुष्ट! यदि तू श्रीरामजीका वैरो हुआ तो तुझे ब्रह्मा और रुद्र भी नहीं बचा सकेंगे ॥ १ ॥

मूह बूथा जनि मारसि गाला। राम बयर अस होइहि हाला ॥ तव सिर निकर कपिन्ह के आगें। परिहहिं धरनि राम सर लागें ॥

हे मूह! व्यर्थ गाल न मार (डींग न हाँक)। श्रीरामजीसे वैर करनेपर तेरा ऐसा हाल होगा कि तेरे सिर-समूह श्रीरामजीके बाण लगते ही वानरोंके आगे पृथ्वीपर पड़ेंगे, ॥ २ ॥

ते तव सिर कंदुक सम नाना। खेलिहहिं भालु कीस चौगाना ॥ जबहिं समर कोपिहि रघुनायक। छुटिहहिं अति कराल बहु सायक ॥

और रीछ-वानर तेरे उन गेंदके समान अनेकों सिरोंसे चौगान खेलेंगे। जब श्रीरघुनाथजी युद्धमें कोप करेंगे और उनके अत्यन्त तीक्ष्ण बहुत-से बाण छूटेंगे, ॥ ३ ॥

तब कि चलिहि अस गाल तुम्हारा। अस बिचारि भजु राम उदारा ॥ सुनत बचन रावन परजरा। जरत महानल जनु घृत परा ॥

तब क्या तेरा ऐसा गाल चलेगा? ऐसा विचारकर उदार (कृपालु) श्रीरामजीको भज। अंगदके ये वचन सुनकर रावण बहुत अधिक जल उठा। मानो जलती हुई प्रचण्ड अग्निमें घी पड़ गया हो ॥ ४ ॥

दो०—कुंभकरण अस बंधु मम सुत प्रसिद्ध सक्रारि।

मोर पराक्रम नहीं सुनेहि जितेउँ चराचर झारि ॥ २७ ॥

[वह बोला—अरे मूर्ख!] कुम्भकर्ण-ऐसा मेरा भाई है, इन्द्रका शत्रु सुप्रसिद्ध मेघनाद मेरा पुत्र है! और मेरा पराक्रम तो तूने सुना ही नहीं कि मैंने सम्पूर्ण जड-चेतन जगत्को जीत लिया है! ॥ २७ ॥

सठ सारखामृग जोरि सहाई। बाँधा सिंधु इहइ प्रभुताई ॥ नाघहिं खग अनेक बारीसा। सूर न होहिं ते सुनु सब कीसा ॥

रे दुष्ट! वानरोंकी सहायता जोड़कर रामने समुद्र बाँध लिया; बस, यही उसकी प्रभुता है। समुद्रको तो अनेकों पक्षी भी लाँघ जाते हैं। पर इसीसे वे सभी शूरवीर नहीं हो जाते। अरे मूर्ख बंदर! सुन— ॥ १ ॥

मम भुज सागर बल जल पूरा। जहाँ बूड़े बहु सुर नर सूर ॥ बीस पयोधि अगाध अपारा। को अस बीर जो पाइहि पारा ॥

मेरी एक-एक भुजारूपी समुद्र बलरूपी जलसे पूर्ण है, जिसमें बहुत-से शूरवीर देवता और मनुष्य डूब चुके हैं। [बता,] कौन ऐसा शूरवीर है जो मेरे इन अथाह और अपार बीस समुद्रोंका पार पा जायगा? ॥ २ ॥