श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 801, कुल 1058 में से
संदर्भ में पढ़ें- लङ्काकाण्ड *
७११
दिगपालन्ह मैं नीर भरावा । भूप सुजस खल मोहि सुनावा ॥ जौं पै समर सुभट तव नाथा । पुनि पुनि कहसि जासु गुन गाथा ॥
अरे दुष्ट! मैंने दिक्पालोंतकसे जल भरवाया और तू एक राजाका मुझे सुयश सुनाता है! यदि तेरा मालिक, जिसकी गुणगाथा तू बार-बार कह रहा है, संग्राममें लड़नेवाला योद्धा है— ॥ ३ ॥
तौ बसीठ पठवत केहि काजा । रिपु सन प्रीति करत नहिं लाजा ॥ हरगिरि मथन निरखु मम बाहू । पुनि सठ कपि निज प्रभुहि सराहू ॥
तो [फिर] वह दूत किसलिये भेजता है? शत्रुसे प्रीति (सन्धि) करते उसे लाज नहीं आती? [पहले] कैलासका मथन करनेवाली मेरी भुजाओंको देख। फिर अरे मूर्ख वानर! अपने मालिककी सराहना करना ॥ ४ ॥
दो०— सूर कवन रावन सरिस स्वकर काटि जेहिं सीस ।
हुने अनल अति हरष बहु बार साखि गौरीस ॥ २८ ॥
रावणके समान शूरवीर कौन है? जिसने अपने ही हाथोंसे सिर काट-काटकर अत्यन्त हर्षके साथ बहुत बार उन्हें अग्रिममें होम दिया! स्वयं गौरीपति शिवजी इस बातके साक्षी हैं ॥ २८ ॥
जरत बिलोकेउँ जबहिं कपाला । बिधि के लिखे अंक निज भाला ॥
नर कें कर आपन बध बाँची । हसेउँ जानि बिधि गिरा असाँची ॥
मस्तकोंके जलते समय जब मैंने अपने ललाटोंपर लिखे हुए विधाताके अक्षर देखे, तब मनुष्यके हाथसे अपनी मृत्यु होना बाँचकर, विधाताकी वाणी (लेखको) असत्य जानकर मैं हँसा ॥ १ ॥
सोउ मन समुझि त्रास नहिं मोरें । लिखा बिरंचि जरठ मति भोरें ॥
आन बीर बल सठ मम आगें । पुनि पुनि कहसि लाज पति त्यागें ॥
उस बातको समझकर (स्मरण करके) भी मेरे मनमें डर नहीं है। [क्योंकि मैं समझता हूँ कि] बूढ़े ब्रह्मणे बुद्धिभ्रमसे ऐसा लिख दिया है। अरे मूर्ख! तू लज्जा और मर्यादा छोड़कर मेरे आगे बार-बार दूसरे वीरका बल कहता है!! ॥ २ ॥
कह अंगद सलज्ज जग माहीं । रावन तोहि समान कोउ नाहीं ॥
लाजवंत तव सहज सुभाऊ । निज मुख निज गुन कहसि न काऊ ॥
अंगदने कहा—अरे रावण! तेरे समान लज्जावान् जगत्में कोई नहीं है। लज्जाशीलता तो तेरा सहज स्वभाव ही है। तू अपने मुँहसे अपने गुण कभी नहीं कहता ॥ ३ ॥
सिर अरु सैल कथा चित रही । ताते बार बीस तैं कही ॥
सो भुजबल राखेहु उर घाली । जीतेहु सहसबाहु बलि बाली ॥