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भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

पृष्ठ 802, कुल 1058 में से

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पृष्ठ 802

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  • रामचरितमानस *

सिर काटने और कैलास उठानेकी कथा चित्तमें चढ़ी हुई थी, इससे तूने उसे बीसों बार कहा। भुजाओंके उस बलको तो तूने हृदयमें ही टाल (छिपा) रखा है, जिससे तूने सहस्रबाहु, बलि और बालिको जीता था ॥ ४ ॥

सुनु मतिमंद देहि अब पूरा। काटें सीस कि होइअ सूर। इंद्रजालि कहूं कहिअ न बीरा। काटइ निज कर सकल सरीरा ॥

अरे मन्दबुद्धि! सुन, अब बस कर। सिर काटनेसे भी क्या कोई शूरवीर हो जाता है? इंद्रजाल रचनेवालेको वीर नहीं कहा जाता, यद्यपि वह अपने ही हाथों अपना सारा शरीर काट डालता है! ॥ ५ ॥

दो०—जरहिं पतंग मोह बस भार बहहिं खर बृंद।

ते नहिं सूर कहावहिं समुझि देखु मतिमंद ॥ २९ ॥

अरे मन्दबुद्धि! समझकर देख। पतंगे मोहवश आगमें जल मरते हैं, गदहोंके झुंड बोझ लादकर चलते हैं; पर इस कारण वे शूरवीर नहीं कहलाते ॥ २९ ॥

अब जनि बतबढ़ाव खल करही। सुनु मम बचन मान परिहरही ॥

दसमुख मैं न बसीठीं आयउँ। अस बिचारि रघुबीर पठायउँ ॥

अरे दुष्ट! अब बतबढ़ाव मत कर; मेरा वचन सुन और अभिमान त्याग दे! हे दशमुख! मैं दूतकी तरह [सन्धि करने] नहीं आया हूँ। श्रीरघुवीरने ऐसा विचारकर मुझे भेजा है— ॥ १ ॥

बार बार अस कहइ कृपाला। नहिं गजारि जसु बधें सूकाला ॥

मन महुं समुझि बचन प्रभु केरे। सहेउँ कठोर बचन सठ तेरे ॥

कृपालु श्रीरामजी बार-बार ऐसा कहते हैं कि स्यारके मारनेसे सिंहको यश नहीं मिलता। अरे मूर्ख! प्रभुके [उन] वचनोंको मनमें समझकर (याद करके) ही मैंने तेरे कठोर वचन सहे हैं ॥ २ ॥

नाहिं त करि मुख भंजन तोरा। लै जातेउँ सीतहि बरजोरा ॥

जानेउँ तव बल अधम सुरारी। सूनें हरि आनिहि परनारी ॥

नहीं तो तेरे मुँह तोड़कर मैं सीताजीको जबरदस्ती ले जाता। अरे अधम! देवताओंके शत्रु! तेरा बल तो मैंने तभी जान लिया जब तू सूनेमें परायी स्त्रीको हर (चुरा) लाया ॥ ३ ॥

तैं निसिचरपति गर्ब बहूता। मैं रघुपति सेवक कर दूता ॥

जौं न राम अपमानहि डरऊँ। तोहि देखत अस कौतुक करऊँ ॥

तू राक्षसोंका राजा और बड़ा अभिमानी है। परन्तु मैं तो श्रीरघुनाथजीके सेवक (सुग्रीव) का दूत (सेवकका भी सेवक) हूँ। यदि मैं श्रीरामजीके अपमानसे न डरूँ तो तेरे देखते-देखते ऐसा तमाशा करूँ कि— ॥ ४ ॥