श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 804, कुल 1058 में से
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- रामचरितमानस *
जिनके बलका तुझे गर्व है, ऐसे अनेकों मनुष्योंको तो राक्षस रात-दिन खाया करते हैं। अरे मूह! जिद छोड़कर समझ (विचार कर) ॥ ३१ (ख) ॥
जब तेहिं कीन्हि राम कै निंदा । क्रोधवंत अति भयउ कर्पिंदा ॥ हरि हर निंदा सुनइ जो काना । होइ पाप गोघात समाना ॥
जब उसने श्रीरामजीकी निन्दा की, तब तो कपिश्रेष्ठ अंगद अत्यन्त क्रोधित हुए। क्योंकि [शास्त्र ऐसा कहते हैं कि] जो अपने कानोंसे भगवान् विष्णु और शिवकी निन्दा सुनता है, उसे गोवधके समान पाप होता है ॥ १ ॥
कटकटान कपिकुंजर भारी । दुहु भुजदंड तमकि महि मारी ॥ डोलत धरनि सभासद खसे । चले भाजि भय मारुत ग्रसे ॥
वानरश्रेष्ठ अंगद बहुत जोरसे कटकटाये (शब्द किया) और उन्होंने तमककर (जोरसे) अपने दोनों भुजदण्डोंको पृथ्वीपर दे मारा। पृथ्वी हिलने लगी, [जिससे बैठे हुए] सभासद् गिर पड़े और भयरूपी पवन (भूत) से ग्रस्त होकर भाग चले ॥ २ ॥
गिरत सँभारि उठा दसकंधर । भूतल परे मुकुट अति सुंदर ॥ कछु तेहिं लै निज सिरन्हि सँवारे । कछु अंगद प्रभु पास पबारे ॥
रावण गिरते-गिरते सँभलकर उठा। उसके अत्यन्त सुन्दर मुकुट पृथ्वीपर गिर पड़े। कुछ तो उसने उठाकर अपने सिरोंपर सुधारकर रख लिया और कुछ अंगदने उठाकर प्रभु श्रीरामचन्द्रजीके पास फेंक दिये ॥ ३ ॥
आवत मुकुट देखि कपि भागे । दिनहीं लूक परन बिधि लागे ॥ की रावन करि कोप चलाए । कुलिस चारि आवत अति धाए ॥
मुकुटोंको आते देखकर वानर भागे। [सोचने लगे] विधाता! क्या दिनमें ही उल्कापात होने लगा (तारे टूटकर गिरने लगे)? अथवा क्या रावणने क्रोध करके चार वज्र चलाये हैं, जो बड़े धायेके साथ (वेगसे) आ रहे हैं? ॥ ४ ॥
कह प्रभु हँसि जनि हृदयें डेराहू । लूक न असनि केतु नहिं राहू ॥ ए किरीट दसकंधर केरे । आवत बालितनय के प्रेरे ॥
प्रभुने [उनसे] हँसकर कहा—मनमें डरो नहीं। ये न उल्का हैं, न वज्र हैं और न केतु या राहु ही हैं। अरे भाई! ये तो रावणके मुकुट हैं; जो बालिपुत्र अंगदके फेंके हुए आ रहे हैं ॥ ५ ॥
दो०— तरकि पवनसुत कर गहे आनि धरे प्रभु पास ।
कौतुक देखहिं भालु कपि दिनकर सरिस प्रकास ॥ ३२ ( क ) ॥