श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 805, कुल 1058 में से
संदर्भ में पढ़ें- लङ्काकाण्ड *
८०३
पवनपुत्र श्रीहनुमान्जीने उछलकर उनको हाथसे पकड़ लिया और लाकर प्रभुके पास रख दिया। रीछ और वानर तमाशा देखने लगे। उनका प्रकाश सूर्यके समान था ॥ ३२ (क) ॥
उहाँ सकोपि दसानन सब सन कहत रिसाइ।
धरहु कपिहि धरि मारहु सुनि अंगद मुसुकाइ ॥ ३२ (ख) ॥
वहाँ (सभामें) क्रोधयुक्त रावण सबसे क्रोधित होकर कहने लगा कि—बंदरको पकड़ लो और पकड़कर मार डालो। अंगद यह सुनकर मुसकराने लगे ॥ ३२ (ख) ॥
एहि बधि बेगि सुभट सब धावहु । खाहु भालु कपि जहाँ जहाँ पावहु ॥
मर्कटहीन करहु महि जाई । जिअत धरहु तापस द्वौ भाई ॥
[रावण फिर बोला—] इसे मारकर सब योद्धा तुरंत दौड़ो और जहाँ-कहीं रीछ-वानरोंको पाओ, वहीं खा डालो। पृथ्वीको बंदरोंसे रहित कर दो और जाकर दोनों तपस्वी भाइयों (राम-लक्ष्मण) को जीते-जी पकड़ लो ॥ १ ॥
पुनि सकोप बोलेउ जुबराजा । गाल बजावत तोहि न लाजा ॥
मरु गर काटि निलज कुलधाती । बल बिलोकि बिहरति नहिं छाती ॥
[रावणके ये कोपभरे वचन सुनकर] तब युवराज अंगद क्रोधित होकर बोले—तुझे गाल बजाते लाज नहीं आती! अरे निर्लज! अरे कुलनाशक! गला काटकर (आत्महत्या करके) मर जा! मेरा बल देखकर भी क्या तेरी छाती नहीं फटती! ॥ २ ॥
रे त्रिय चोर कुमारग गामी । खल मल रासि मंदमति कामी ॥
सन्यपात जल्पसि दुर्बादा । भएसि कालबस खल मनुजादा ॥
अरे स्त्रीके चोर! अरे कुमारगपर चलनेवाले! अरे दुष्ट, पापकी राशि, मन्दबुद्धि और कामी! तू सन्निपातमें क्या दुर्वचन बक रहा है? अरे दुष्ट राक्षस! तू कालके वश हो गया है! ॥ ३ ॥
याको फलु पावहिगो आगें । बानर भालु चपेटन्हि लागें ॥
रामु मनुज बोलत असि बानी । गिरहिं न तव रसना अभिमानी ॥
इसका फल तू आगे वानर और भालुओंके चपेटे लगनेपर पावेगा। राम मनुष्य हैं, ऐसा वचन बोलते ही, अरे अभिमानी! तेरी जीभें नहीं गिर पड़ती? ॥ ४ ॥
गिरिहिं रसना संसय नाही । सिरन्हि समेत समर महि माहीं ॥
इसमें सन्देह नहीं है कि तेरी जीभें [अकेले नहीं वरं] सिरोंके साथ रणभूमिमें गिरेगी ॥ ५ ॥
सो०—सो नर क्यों दसकंध बालि बध्यो जेहिं एक सर।
बीसहुं लोचन अंध धिग तव जन्म कुजाति जड़ ॥ ३३ (क) ॥