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भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

पृष्ठ 806, कुल 1058 में से

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पृष्ठ 806

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  • रामचरितमानस *

रे दशकन्ध! जिसने एक ही बाणसे बालिको मार डाला, वह मनुष्य कैसे है? अरे कुजाति, अरे जड़! बीस आँखें होनेपर भी तू अन्धा है। तेरे जन्मको धिक्कार है ॥ ३३ (क) ॥

तव सोनित कौँ प्यास तृषित राम सायक निकर।

तजउँ तोहि तेहि त्रास कटु जल्पक निसिचर अधम ॥ ३३ (ख) ॥

श्रीरामचन्द्रजीके बाणसमूह तेरे रक्तकी प्याससे प्यासे हैं। [वे प्यासे ही रह जायँगे] इस डरसे, अरे कड़वी बकवाद करनेवाले नीच राक्षस! मैं तुझे छोड़ता हूँ ॥ ३३ (ख) ॥

मैं तव दसन तोरिबे लायक। आयसु मोहि न दीन्ह रघुनायक ॥

असि रिस होति दसउ मुख तोरौं। लंका गहि समुद्र महँ बोरौं ॥

मैं तेरे दाँत तोड़नेमें समर्थ हूँ। पर क्या करूँ? श्रीरघुनाथजीने मुझे आज्ञा नहीं दी। ऐसा क्रोध आता है कि तेरे दसों मुँह तोड़ डालूँ और [तेरी] लङ्काको पकड़कर समुद्रमें डुबा दूँ ॥ १ ॥

गूलरि फल समान तव लंका। बसहु मध्य तुम्ह जंतु असंका ॥

मैं बानर फल खात न बारा। आयसु दीन्ह न राम उदारा ॥

तेरी लङ्का गूलरके फलके समान है। तुम सब कीड़े उसके भीतर [अज्ञानवश] निडर होकर बस रहे हो। मैं बंदर हूँ, मुझे इस फलको खाते क्या देर थी? पर उदार (कृपालु) श्रीरामचन्द्रजीने वैसी आज्ञा नहीं दी ॥ २ ॥

जुगुति सुनत रावन मुसुकाई। मूढ़ सिखिहि कहँ बहुत झुठाई ॥

बालि न कबहुँ गाल अस मारा। मिलि तपसिन्ह तैं भएसि लबारा ॥

अंगदकी युक्ति सुनकर रावण मुसकराया [और बोला—] अरे मूर्ख! बहुत झूठ बोलना तूने कहाँ सीखा? बालिने तो कभी ऐसा गाल नहीं मारा। जान पड़ता है तू तपस्वियोंसे मिलकर लबार हो गया है ॥ ३ ॥

साँचेहुँ मैं लबार भुज बीहा। जौँ न उपारिउँ तव दस जीहा ॥

समुझि राम प्रताप कपि कोपा। सभा माझ पन करि पद रोपा ॥

[अंगदने कहा—] अरे बीस भुजावाले! यदि तेरी दसों जीभें मैंने नहीं उखाड़ लीं तो सचमुच मैं लबार ही हूँ। श्रीरामचन्द्रजीके प्रतापको समझकर (स्मरण करके) अंगद क्रोधित हो उठे और उन्होंने रावणकी सभामें प्रण करके (दृढ़ताके साथ) पैर रोप दिया ॥ ४ ॥

जौँ मम चरन सकसि सठ टारी। फिरहिं रामु सीता मैं हारी ॥

सुनहु सुभट सब कह दससीसा। पद गहि धरनि पछारहु कीसा ॥