श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 807, कुल 1058 में से
संदर्भ में पढ़ें- लङ्काकाण्ड *
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[और कहा—] अरे मूर्ख! यदि तू मेरा चरण हटा सके तो श्रीरामजी लौट जायेंगे, मैं सीताजीको हार गया। रावणने कहा—हे सब वीरो! सुनो, पैर पकड़कर बंदरको पृथ्वीपर पछाड़ दो ॥५॥
इंद्रजीत आदिक बलवाना । हरषि उठे जहाँ तहाँ भट नाना ॥ झपटहिं करि बल बिपुल उपाई । पद न टरइ बैठहिं सिरु नाई ॥
इन्द्रजीत (मेघनाद) आदि अनेकों बलवान् योद्धा जहाँ-तहाँसे हर्षित होकर उठे। वे पूरे बलसे बहुत-से उपाय करके झपटते हैं। पर पैर टलता नहीं, तब सिर नीचा करके फिर अपने-अपने स्थानपर जा बैठ जाते हैं ॥६॥
पुनि उठि झपटहिं सुर आराती । टरइ न कीस चरन एहि भाँती ॥ पुरुष कुजोगी जिमि उरगारी । मोह बिटप नहिं सकहिं उपारी ॥
[काकभुशुण्डिजी कहते हैं—] वे देवताओंके शत्रु (राक्षस) फिर उठकर झपटते हैं। परन्तु हे सर्पोंके शत्रु गरुड़जी! अङ्गदका चरण उनसे वैसे ही नहीं टलता जैसे कुजोगी (विषयी) पुरुष मोहरूपी वृक्षको नहीं उखाड़ सकते ॥७॥
दो०—कोटिन्ह मेघनाद सम सुभट उठे हरषाइ।
झपटहिं टैर न कपि चरन पुनि बैठहिं सिर नाइ ॥ ३४ ( क ) ॥
करोड़ों वीर योद्धा जो बलमें मेघनादके समान थे, हर्षित होकर उठे। वे बार-बार झपटते हैं, पर वानरका चरण नहीं उठता, तब लज्जाके मारे सिर नवाकर बैठ जाते हैं ॥३४ (क)॥
भूमि न छोड़ित कपि चरन देखत रिपु मद भाग ।
कोटि बिघ्न ते संत कर मन जिमि नीति न त्याग ॥ ३४ ( ख ) ॥
जैसे करोड़ों विघ्न आनेपर भी संतका मन नीतिको नहीं छोड़ता, वैसे ही वानर (अंगद)-का चरण पृथ्वीको नहीं छोड़ता। यह देखकर शत्रु (रावण)-का मद दूर हो गया! ॥३४ (ख)॥
कपि बल देखि सकल हियँ हारे । उठा आपु कपि कें परचारे ॥ गहत चरन कह बालिकुमारा । मम पद गहें न तोर उबारा ॥
अङ्गदका बल देखकर सब हृदयमें हार गये। तब अङ्गदके ललकारनेपर रावण स्वयं उठा। जब वह अङ्गदका चरण पकड़ने लगा, तब बालिकुमार अङ्गदने कहा—मेरा चरण पकड़नेसे तेरा बचाव नहीं होगा! ॥१॥
गहसि न राम चरन सठ जाई । सुनत फिरा मन अति सकुचाई ॥ भयउ तेजहत श्री सब गई । मध्य दिवस जिमि ससि सोहई ॥