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भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

पृष्ठ 809, कुल 1058 में से

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पृष्ठ 809
  • लङ्काकाण्ड *

८०७

साँझ जानि दसकंधर भवन गयउ बिलखाइ।

मन्दोदरीं रावनहि बहुरि कहा समुझाइ ॥ ३५ (ख) ॥

सन्ध्या हो गयी जानकर दशग्रीव विलखता हुआ (उदास होकर) महलमें गया। मन्दोदरीने रावणको समझाकर फिर कहा— ॥ ३५ (ख) ॥

कंत समुझि मन तजहु कुमतिही। सोह न समर तुम्हि रिघुपतिही ॥ रामानुज लघु रेख खचाई। सोउ नहिं नाधेहु असि मनुसाई ॥

हे कान्त! मनमें समझकर (विचारकर) कुबुद्धिको छोड़ दो। आपसे और श्रीरघुनाथजीसे युद्ध शोभा नहीं देता। उनके छोटे भाईने एक जरा-सी रेखा खींच दी थी, उसे भी आप नहीं लाँघ सके, ऐसा तो आपका पुरुषत्व है ॥ १ ॥

पिय तुम्ह ताहि जितब संग्रामा। जाके दूत केर यह कामा ॥ कौतुक सिंधु नाधि तव लंका। आयउ कपि केहरी असंका ॥

हे प्रियतम! आप उन्हें संग्राममें जीत पायेंगे, जिनके दूतका ऐसा काम है? खेलसे ही समुद्र लाँघकर वह वानरोंमें सिंह (हनुमान्) आपकी लंकामें निर्भय चला आया! ॥ २ ॥

रखवारे हति बिपिन उजारा। देखत तोहि अच्छ तेहिं मारा ॥ जारि सकल पुर कीन्हैसि छारा। कहाँ रहा बल गर्ब तुम्हारा ॥

रखवालोंको मारकर उसने अशोकवन उजाड़ डाला। आपके देखते-देखते उसने अक्षयकुमारको मार डाला और सम्पूर्ण नगरको जलाकर राख कर दिया। उस समय आपके बलका गर्व कहाँ चला गया था? ॥ ३ ॥

अब पति मूषा गाल जनि मारहु। मोर कहा कछु हृदयँ बिचारहु ॥ पति रघुपतिहि नृपति जनि मानहु। अग जग नाथ अतुलबल जानहु ॥

अब हे स्वामी! झूठ (व्यर्थ) गाल न मारिये (डींग न हॉकिये) मेरे कहनेपर हृदयमें कुछ विचार कीजिये। हे पति! आप श्रीरघुपतिको [निरा] राजा मत समझिये, बल्कि अग-जगनाथ (चराचरके स्वामी) और अतुलनीय बलवान् जानिये ॥ ४ ॥

बान प्रताप जान मारीचा। तासु कहा नहिं मानेहि नीचा ॥ जनक सभाँ अगनि त भूपाला। रहे तुम्हुउ बल अतुल बिसाला ॥

श्रीरामजीके बाणका प्रताप तो नीच मारीच भी जानता था। परन्तु आपने उसका कहना भी नहीं माना। जनककी सभामें अगनि राजागण थे। वहाँ विशाल और अतुलनीय बलवाले आप भी थे ॥ ५ ॥