श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 809, कुल 1058 में से
संदर्भ में पढ़ें- लङ्काकाण्ड *
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साँझ जानि दसकंधर भवन गयउ बिलखाइ।
मन्दोदरीं रावनहि बहुरि कहा समुझाइ ॥ ३५ (ख) ॥
सन्ध्या हो गयी जानकर दशग्रीव विलखता हुआ (उदास होकर) महलमें गया। मन्दोदरीने रावणको समझाकर फिर कहा— ॥ ३५ (ख) ॥
कंत समुझि मन तजहु कुमतिही। सोह न समर तुम्हि रिघुपतिही ॥ रामानुज लघु रेख खचाई। सोउ नहिं नाधेहु असि मनुसाई ॥
हे कान्त! मनमें समझकर (विचारकर) कुबुद्धिको छोड़ दो। आपसे और श्रीरघुनाथजीसे युद्ध शोभा नहीं देता। उनके छोटे भाईने एक जरा-सी रेखा खींच दी थी, उसे भी आप नहीं लाँघ सके, ऐसा तो आपका पुरुषत्व है ॥ १ ॥
पिय तुम्ह ताहि जितब संग्रामा। जाके दूत केर यह कामा ॥ कौतुक सिंधु नाधि तव लंका। आयउ कपि केहरी असंका ॥
हे प्रियतम! आप उन्हें संग्राममें जीत पायेंगे, जिनके दूतका ऐसा काम है? खेलसे ही समुद्र लाँघकर वह वानरोंमें सिंह (हनुमान्) आपकी लंकामें निर्भय चला आया! ॥ २ ॥
रखवारे हति बिपिन उजारा। देखत तोहि अच्छ तेहिं मारा ॥ जारि सकल पुर कीन्हैसि छारा। कहाँ रहा बल गर्ब तुम्हारा ॥
रखवालोंको मारकर उसने अशोकवन उजाड़ डाला। आपके देखते-देखते उसने अक्षयकुमारको मार डाला और सम्पूर्ण नगरको जलाकर राख कर दिया। उस समय आपके बलका गर्व कहाँ चला गया था? ॥ ३ ॥
अब पति मूषा गाल जनि मारहु। मोर कहा कछु हृदयँ बिचारहु ॥ पति रघुपतिहि नृपति जनि मानहु। अग जग नाथ अतुलबल जानहु ॥
अब हे स्वामी! झूठ (व्यर्थ) गाल न मारिये (डींग न हॉकिये) मेरे कहनेपर हृदयमें कुछ विचार कीजिये। हे पति! आप श्रीरघुपतिको [निरा] राजा मत समझिये, बल्कि अग-जगनाथ (चराचरके स्वामी) और अतुलनीय बलवान् जानिये ॥ ४ ॥
बान प्रताप जान मारीचा। तासु कहा नहिं मानेहि नीचा ॥ जनक सभाँ अगनि त भूपाला। रहे तुम्हुउ बल अतुल बिसाला ॥
श्रीरामजीके बाणका प्रताप तो नीच मारीच भी जानता था। परन्तु आपने उसका कहना भी नहीं माना। जनककी सभामें अगनि राजागण थे। वहाँ विशाल और अतुलनीय बलवाले आप भी थे ॥ ५ ॥