श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 810, कुल 1058 में से
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- रामचरितमानस *
भंजि धनुष जानकी बिआही । तब संग्राम जितेहु किन ताही ॥ सुरपति सुत जानड़ बल थोरा । राखा जिअत आँखि गहि फोरा ॥
वहाँ शिवजीका धनुष तोड़कर श्रीरामजीने जानकीको ब्याहा, तब आपने उनको संग्राममें क्यों नहीं जीता ? इन्द्रपुत्र जयन्त उनके बलको कुछ-कुछ जानता है । श्रीरामजीने पकड़कर, केवल उसकी एक आँख ही फोड़ दी और उसे जीवित ही छोड़ दिया ॥ ६ ॥
सूपनखा कै गति तुम्ह देखी । तदपि हृदयँ नहिं लाज बिसेषी ॥
शूर्पणखाकी दशा तो आपने देख ही ली । तो भी आपके हृदयमें [उनसे लड़नेकी बात सोचते] विशेष (कुछ भी) लज्जा नहीं आती ! ॥ ७ ॥
दो०— बधि विराध खर दूषनहि लीलाँ हत्यो कबंध ।
बालि एक सर मार्यो तेहि जानहु दसकंध ॥ ३६ ॥
जिन्होंने विराध और खर-दूषणको मारकर लीलासे ही कबन्धको भी मार डाला; और जिन्होंने बालिको एक ही बाणसे मार दिया, हे दशकन्ध ! आप उन्हें (उनके महत्त्वको) समझिये ! ॥ ३६ ॥
जेहिं जलनाथ बँधायउ हेला । उतरे प्रभु दल सहित सुबेला ॥
कारुनीक दिनकर कुल केतू । दूत पठायउ तव हित हेतू ॥
जिन्होंने खेलसे ही समुद्रको बँधा लिया और जो प्रभु सेनासहित सुबेल पर्वतपर उतर पड़े, उन सूर्यकुलके ध्वजास्वरूप (कीर्तिको बढ़ानेवाले) करुणामय भगवान्ने आपहीके हितके लिये दूत भेजा ॥ १ ॥
सभा माझ जेहिं तव बल मथा । करि बरुथ महुँ मृगपति जथा ॥
अंगद हनुमत अनुचर जाके । रन बाँकुरे बीर अति बाँके ॥
जिसने बीच सभामें आकर आपके बलको उसी प्रकार मथ डाला जैसे हाथियोंके झुंडमें आकर सिंह [उसे छिन्न-भिन्न कर डालता है] । रणमें बाँके अत्यन्त विकट वीर अंगद और हनुमान् जिनके सेवक हैं, ॥ २ ॥
तेहि कहँ पिय पुनि पुनि नर कहहू । मुधा मान ममता मद बहहू ॥
अहह कंत कृत राम विरोधा । काल बिबस मन उपज न बोधा ॥
हे पति ! उन्हें आप बार-बार मनुष्य कहते हैं । आप व्यर्थ ही मान, ममता और मदका बोझा ढो रहे हैं ! हा प्रियतम ! आपने श्रीरामजीसे विरोध कर लिया और कालके विशेष वश होनेसे आपके मनमें अब भी ज्ञान नहीं उत्पन्न होता ॥ ३ ॥
काल दंड गहि काहु न मारा । हरइ धर्म बल बुद्धि बिचारा ॥
निकट काल जेहि आवत साई । तेहि भ्रम होइ तुम्हारिहि नाई ॥