श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 816, कुल 1058 में से
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- रामचरितमानस *
मैं जिसे रणसे पीठ देकर भागा हुआ अपने कानों सुनूँगा, उसे स्वयं भयानक दुधारी तलवारसे मारूँगा। मेरा सब कुछ ख़ाया, भाँति-भाँतिके भोग किये और अब रणभूमिमें प्राण प्यारे हो गये!॥ ४ ॥
उग्र बचन सुनि सकल डेराने । चले क्रोध करि सुभट लजाने ॥ सन्मुख मरन बीर कै सोभा । तब तिन्ह तजा प्राण कर लोभा ॥
रावणके उग्र (कठोर) वचन सुनकर सब वीर डर गये और लज्जित होकर क्रोध करके युद्धके लिये लौट चले। रणमें [शत्रुके] सम्मुख (युद्ध करते हुए) मरनेमें ही वीरकी शोभा है। [यह सोचकर] तब उन्होंने प्राणोंका लोभ छोड़ दिया॥ ५ ॥
दो०—बहु आयुध धर सुभट सब भिरहिं पचारि पचारि ।
व्याकुल किए भालु कपि परिघ त्रिसूलन्हि मारि ॥ ४२ ॥
बहुत-से अस्त्र-शस्त्र धारण किये सब वीर ललकार-ललकारकर भिड़ने लगे। उन्होंने परिघों और त्रिशूलोंसे मार-मारकर सब रीछ-वानरोंको व्याकुल कर दिया॥ ४२ ॥
भय आतुर कपि भागन लागे । जद्यपि उमा जीतिहहिं आगे ॥ कोउ कह कहैं अंगद हनुमंता । कहैं नल नील दुबिद बलवंता ॥
[शिवजी कहते हैं—] वानर भयातुर होकर (डरके मारे घबड़ाकर) भागने लगे, यद्यपि हे उमा! आगे चलकर [वे ही] जीतेंगे। कोई कहता है—अंगद-हनुमान् कहाँ हैं? बलवान् नल, नील और द्विविद कहाँ हैं?॥ १ ॥
निज दल बिकल सुना हनुमाना । पच्छिम द्वार रहा बलवाना ॥ मेघनाद तहैं करइ लराई । टूट न द्वार परम कठिनाई ॥
हनुमान्जीने जब अपने दलको विकल (भयभीत) हुआ सुना, उस समय वे बलवान् पश्चिम द्वारपर थे। वहाँ उनसे मेघनाद युद्ध कर रहा था। वह द्वार टूटता न था, बड़ी भारी कठिनाई हो रही थी॥ २ ॥
पवनतनय मन भा अति क्रोधा । गजैउ प्रबल काल सम जोधा ॥ कूदि लंक गढ़ ऊपर आवा । गहि गिरि मेघनाद कहूँ धावा ॥
तब पवनपुत्र हनुमान्जीके मनमें बड़ा भारी क्रोध हुआ। वे कालके समान योद्धा बड़े जोरसे गरजे और कूदकर लङ्काके किलेपर आ गये और पहाड़ लेकर मेघनादकी ओर दौड़े॥ ३ ॥
भंजेउ रथ सारथी निपाता । ताहि हृदय महुँ मारेसि लाता ॥ दुसरे सूत बिकल तेहि जाना । स्यंदन घालि तुरत गृह आना ॥