श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
८१४
- रामचरितमानस *
मैं जिसे रणसे पीठ देकर भागा हुआ अपने कानों सुनूँगा, उसे स्वयं भयानक दुधारी तलवारसे मारूँगा। मेरा सब कुछ ख़ाया, भाँति-भाँतिके भोग किये और अब रणभूमिमें प्राण प्यारे हो गये!॥ ४ ॥
उग्र बचन सुनि सकल डेराने । चले क्रोध करि सुभट लजाने ॥ सन्मुख मरन बीर कै सोभा । तब तिन्ह तजा प्राण कर लोभा ॥
रावणके उग्र (कठोर) वचन सुनकर सब वीर डर गये और लज्जित होकर क्रोध करके युद्धके लिये लौट चले। रणमें [शत्रुके] सम्मुख (युद्ध करते हुए) मरनेमें ही वीरकी शोभा है। [यह सोचकर] तब उन्होंने प्राणोंका लोभ छोड़ दिया॥ ५ ॥
दो०—बहु आयुध धर सुभट सब भिरहिं पचारि पचारि ।
व्याकुल किए भालु कपि परिघ त्रिसूलन्हि मारि ॥ ४२ ॥
बहुत-से अस्त्र-शस्त्र धारण किये सब वीर ललकार-ललकारकर भिड़ने लगे। उन्होंने परिघों और त्रिशूलोंसे मार-मारकर सब रीछ-वानरोंको व्याकुल कर दिया॥ ४२ ॥
भय आतुर कपि भागन लागे । जद्यपि उमा जीतिहहिं आगे ॥ कोउ कह कहैं अंगद हनुमंता । कहैं नल नील दुबिद बलवंता ॥
[शिवजी कहते हैं—] वानर भयातुर होकर (डरके मारे घबड़ाकर) भागने लगे, यद्यपि हे उमा! आगे चलकर [वे ही] जीतेंगे। कोई कहता है—अंगद-हनुमान् कहाँ हैं? बलवान् नल, नील और द्विविद कहाँ हैं?॥ १ ॥
निज दल बिकल सुना हनुमाना । पच्छिम द्वार रहा बलवाना ॥ मेघनाद तहैं करइ लराई । टूट न द्वार परम कठिनाई ॥
हनुमान्जीने जब अपने दलको विकल (भयभीत) हुआ सुना, उस समय वे बलवान् पश्चिम द्वारपर थे। वहाँ उनसे मेघनाद युद्ध कर रहा था। वह द्वार टूटता न था, बड़ी भारी कठिनाई हो रही थी॥ २ ॥
पवनतनय मन भा अति क्रोधा । गजैउ प्रबल काल सम जोधा ॥ कूदि लंक गढ़ ऊपर आवा । गहि गिरि मेघनाद कहूँ धावा ॥
तब पवनपुत्र हनुमान्जीके मनमें बड़ा भारी क्रोध हुआ। वे कालके समान योद्धा बड़े जोरसे गरजे और कूदकर लङ्काके किलेपर आ गये और पहाड़ लेकर मेघनादकी ओर दौड़े॥ ३ ॥
भंजेउ रथ सारथी निपाता । ताहि हृदय महुँ मारेसि लाता ॥ दुसरे सूत बिकल तेहि जाना । स्यंदन घालि तुरत गृह आना ॥
- लङ्काकाण्ड *
८१५
रथ तोड़ डाला, सारथिको मार गिराया और मेघनादकी छातीमें लात मारी। दूसरा सारथि मेघनादको व्याकुल जानकर, उसे रथमें डालकर, तुरंत घर ले आया ॥ ४ ॥
दो०—अंगद सुना पवनसुत गढ़ पर गयउ अकेल।
रन बाँकुरा बालिसुत तरकि चढ़ेउ कपि खेल ॥ ४३ ॥
इधर अंगदने सुना कि पवनपुत्र हनुमान् किलेपर अकेले ही गये हैं, तो रणमें बाँके बालिपुत्र वानरके खेलकी तरह उछलकर किलेपर चढ़ गये ॥ ४३ ॥
जुद्ध बिरुद्ध क्रुद्ध द्वौ बंदर। राम प्रताप सुमिरि उर अंतर ॥ रावन भवन चढ़े द्वौ धाई। करहिं कोसलाधीस दोहाई ॥
युद्धमें शत्रुओंके विरुद्ध दोनों वानर क्रुद्ध हो गये। हृदयमें श्रीरामजीके प्रतापका स्मरण करके दोनों दौड़कर रावणके महलपर जा चढ़े और कोसलराज श्रीरामजीकी दुहाई बोलने लगे ॥ १ ॥
कलस सहित गहि भवनु ढहावा। देखि निसाचरपति भय पावा ॥ नारि बृंद कर पीटहिं छाती। अब दुड़ कपि आए उत्तपाती ॥
उन्होंने कलशसहित महलको पकड़कर ढहा दिया। यह देखकर राक्षसराज रावण डर गया। सब स्त्रियाँ हाथोंसे छाती पीटने लगीं [और कहने लगीं—] अबकी बार दो उत्पाती वानर [एक साथ] आ गये ॥ २ ॥
कपिलीला करि तिन्हहि डेरावहिं। रामचंद्र कर सुजसु सुनावहिं ॥ पुनि कर गहि कंचन के खंभा। कहैन्हि करिअ उत्तपात अरंभा ॥
वानरलीला करके (घुड़की देकर) दोनों उनको डराते हैं और श्रीरामचन्द्रजीका सुन्दर यश सुनाते हैं। फिर सोनेके खंभोंको हाथोंसे पकड़कर उन्होंने [परस्पर] कहा कि अब उत्पात आरम्भ किया जाय ॥ ३ ॥
गर्जि परे रिपु कटक मझारी। लागे मदैं भुज बल भारी ॥ काहुहि लात चपेटन्हि केहू। भजहु न रामहि सो फल लेहू ॥
वे गर्जकर शत्रुकी सेनाके बीचमें कूद पड़े और अपने भारी भुजबलसे उसका मर्दन करने लगे। किसीकी लातसे और किसीकी थप्पड़से खबर लेते हैं [और कहते हैं कि] तुम श्रीरामजीको नहीं भजते, उसका यह फल लो ॥ ४ ॥
दो०—एक एक सों मर्दहिं तोरि चलावहिं मुंड।
रावन आगें परहिं ते जनु फूटहिं दधि कुंड ॥ ४४ ॥
एकको दूसरेसे [रगड़कर] मसल डालते हैं और सिरोंको तोड़कर फेंकते हैं। वे सिर जाकर रावणके सामने गिरते हैं और ऐसे फूटते हैं मानो दहीके कूँडे फूट रहे हों ॥ ४४ ॥
८१६
- रामचरितमानस *
महा महा मुखिआ जे पावहिं । ते पद गहि प्रभु पास चलावहिं ॥ कहइ बिभीषनु तिन्ह के नामा । देहिं राम तिन्हहू निज धामा ॥
जिन बड़े-बड़े मुखियों (प्रधान सेनापतियों)-को पकड़ पाते हैं उनके पैर पकड़कर उन्हें प्रभुके पास फेंक देते हैं। विभीषणजी उनके नाम बतलाते हैं और श्रीरामजी उन्हें भी अपना धाम (परम पद) दे देते हैं ॥१॥
खल मनुजाद द्विजामिष भोगी । पावहिं गति जो जाचत जोगी । उमा राम मृदुचित करुनाकर । बयर भाव सुमिरत मोहि निस्चर ॥
ब्राह्मणोंका मांस खानेवाले वे नरभोजी दुष्ट राक्षस भी वह परम गति पाते हैं जिसकी योगी भी याचना किया करते हैं [परन्तु सहजमें नहीं पाते] । [शिवजी कहते हैं—] हे उमा ! श्रीरामजी बड़े ही कोमलहृदय और करुणाकी खान हैं । [वे सोचते हैं कि] राक्षस मुझे वैरभावसे ही सही, स्मरण तो करते ही हैं ॥२॥
देहिं परम गति सो जियँ जानी । अस कृपाल को कहहु भवानी ॥ अस प्रभु सुनि न भजहिं भ्रम त्यागी । नर मतिमंद ते परम अभागी ॥
ऐसा हृदयमें जानकर वे उन्हें परमगति (मोक्ष) देते हैं। हे भवानी ! कहो तो ऐसे कृपालु [और] कौन हैं ? प्रभुका ऐसा स्वभाव सुनकर भी जो मनुष्य भ्रम त्यागकर उनका भजन नहीं करते, वे अत्यन्त मन्दबुद्धि और परम भाग्यहीन हैं ॥३॥
अंगद अरु हनुमंत प्रबेसा । कीन्ह दुर्ग अस कह अवधेसा ॥ लंका द्वौ कपि सोहहिं कैसें । मथहिं सिंधु दुड़ मंदर जैसें ॥
श्रीरामजीने कहा कि अङ्गद और हनुमान् किलेमें घुस गये हैं। दोनों वानर लङ्कामें [विध्वंस करते] कैसे शोभा देते हैं, जैसे दो मन्दराचल समुद्रको मथ रहे हों ॥४॥
दो०— भुज बल रिपु दल दलमलि देखि दिवस कर अंत । कूदे जुगल बिगत श्रम आए जहाँ भगवंत ॥४५॥
भुजाओंके बलसे शत्रुकी सेनाको कुचलकर और मसलकर, फिर दिनका अन्त होता देखकर हनुमान् और अङ्गद दोनों कूद पड़े और श्रम (थकावट) रहित होकर वहाँ आ गये जहाँ भगवान् श्रीरामजी थे ॥४५॥
प्रभु पद कमल सीस तिन्ह नाए । देखि सुभट रघुपति मन भाए ॥ राम कृपा करि जुगल निहारे । भए बिगतश्रम परम सुखारे ॥
उन्होंने प्रभुके चरणकमलोंमें सिर नवाये। उत्तम योद्धाओंको देखकर श्रीरघुनाथजी मनमें बहुत प्रसन्न हुए। श्रीरामजीने कृपा करके दोनोंको देखा, जिससे वे श्रमरहित और परम सुखी हो गये ॥१॥
- लङ्काकाण्ड *
८१७
गए जानि अंगद हनुमाना । फिरे भालु मर्कट भट नाना ॥ जातुधान प्रदोष बल पाई । धाए करि दससीस दोहाई ॥
अङ्गद और हनुमान्को गये जानकर सभी भालू और वानर वीर लौट पड़े । राक्षसोंने प्रदोष (सायं) कालका बल पाकर रावणकी दुहाई देते हुए वानरोंपर धावा किया ॥ २ ॥
निसिचर अनी देखि कपि फिरे । जहँ तहँ कटकटाइ भट भिरे ॥ द्वौ दल प्रबल पचारि पचारी । लरत सुभट नहिं मानहिं हारी ॥
राक्षसोंकी सेना आती देखकर वानर लौट पड़े और वे योद्धा जहाँ-तहाँ कटकटाकर भिड़ गये । दोनों ही दल बड़े बलवान् हैं । योद्धा ललकार-ललकारकर लड़ते हैं, कोई हार नहीं मानते ॥ ३ ॥
महाबीर निसिचर सब कारे । नाना बरन बलीमुख भारे ॥ सबल जुगल दल समबल जोधा । कौतुक करत लरत करि क्रोधा ॥
सभी राक्षस महान् वीर और अत्यन्त काले हैं और वानर विशालकाय तथा अनेकों रंगोंके हैं । दोनों ही दल बलवान् हैं और समान बलवाले योद्धा हैं । वे क्रोध करके लड़ते हैं और खेल करते (वीरता दिखलाते) हैं ॥ ४ ॥
प्राबिट सरद पयोद घनैरे । लरत मनहु मारुत के प्रैरे ॥ अनिप अकंपन अरु अतिकाया । बिचलत सेन कीन्हि इन्ह माया ॥
[राक्षस और वानर युद्ध करते हुए ऐसे जान पड़ते हैं] मानो क्रमशः वर्षा और शरद-ऋतुके बहुत-से बादल पवनसे प्रेरित होकर लड़ रहे हों । अकंपन और अतिकाय इन सेनापतियोंने अपनी सेनाको विचलित होते देखकर माया की ॥ ५ ॥
भयउ निमिष महँ अति अँधिआरा । बृष्टि होइ रुधिरोपल छारा ॥
पलभरमें अत्यन्त अन्धकार हो गया । खून, पत्थर और राखकी वर्षा होने लगी ॥ ६ ॥
दो०—देखि निबिड़ तम दसहुँ दिसि कपिदल भयउ खभार ।
एकहि एक न देखई जहँ तहँ करहिं पुकार ॥ ४६ ॥
दसों दिशाओंमें अत्यन्त घना अन्धकार देखकर वानरोंकी सेनामें खलबली पड़ गयी । एकको एक (दूसरा) नहीं देख सकता और सब जहाँ-तहाँ पुकार कर रहे हैं ॥ ४६ ॥
सकल मरमु रघुनायक जाना । लिए बोलि अंगद हनुमाना ॥ समाचार सब कहि समुझाए । सुनत कोपि कपिकुंजर धाए ॥
श्रीरघुनाथजी सब रहस्य जान गये । उन्होंने अङ्गद और हनुमान्को बुला लिया और सब समाचार कहकर समझाया । सुनते ही वे दोनों कपिश्रेष्ठ क्रोध करके दौड़े ॥ १ ॥
८१८
- रामचरितमानस *
पुनि कृपाल हँसि चाप चढ़ावा । पावक सायक सपदि चलावा ॥ भयउ प्रकास कतहुँ तम नाही । ग्यान उदयँ जिमि संसय जाहीं ॥
फिर कृपालु श्रीरामजीने हँसकर धनुष चढ़ाया और तुरंत ही अग्निबाण चलाया, जिससे प्रकाश हो गया, कहीं अँधेरा नहीं रह गया। जैसे ज्ञानके उदय होनेपर [सब प्रकारके] सन्देह दूर हो जाते हैं ॥ २ ॥
भालु बलीमुख पाड़ प्रकासा । धाए हरष बिगत श्रम त्रासा ॥ हनुमान अंगद रन गाजे । हाँक सुनत रजनीचर भाजे ॥
भालू और वानर प्रकाश पाकर श्रम और भयसे रहित तथा प्रसन्न होकर दौड़े। हनुमान् और अङ्गद रणमें गरज उठे। उनकी हाँक सुनते ही राक्षस भाग छूटे ॥ ३ ॥
भागत भट पटकहिं धरि धरनी । करहिं भालु कपि अद्भुत करनी ॥ गहि पद डारहिं सागर माहीं । मकर उरग झष धरि धरि खाहीं ॥
भागते हुए राक्षस योद्धाओंको वानर और भालू पकड़कर पृथ्वीपर दे मारते हैं। और अद्भुत (आश्चर्यजनक) करनी करते हैं (युद्धकौशल दिखलाते हैं)। पैर पकड़कर उन्हें समुद्रमें डाल देते हैं। वहाँ मगर, साँप और मच्छ उन्हें पकड़-पकड़कर खा डालते हैं ॥ ४ ॥
दो०—कछु मारे कछु घायल कछु गढ़ चढ़े पराइ।
गर्जहिं भालु बलीमुख रिपु दल बल बिचलाइ ॥ ४७ ॥
कुछ मारे गये, कुछ घायल हुए, कुछ भागकर गढ़पर चढ़ गये। अपने बलसे शत्रुदलको विचलित करके रीछ और वानर [वीर] गरज रहे हैं ॥ ४७ ॥
निसा जानि कपि चारिउ अनी । आए जहाँ कोसला धनी ॥ राम कृपा करि चितवा सबही । भए बिगतश्रम बानर तबही ॥
रात हुई जानकर वानरोंकी चारों सेनाएँ (टुकड़ियाँ) वहाँ आयीं जहाँ कोसलपति श्रीरामजी थे। श्रीरामजीने ज्यों ही सबको कृपा करके देखा त्यों ही ये वानर श्रमरहित हो गये ॥ १ ॥
उहाँ दसानन सचिव हँकारे । सब सन कहेसि सुभट जे मारे ॥ आधा कटकु कपिन्ह संधारा । कहहु बेगि का करिअ बिचारा ॥
वहाँ [लङ्कामें] रावणने मन्त्रियोंको बुलाया और जो योद्धा मारे गये थे उन सबको सबसे बताया। [उसने कहा—] वानरोंने आधी सेनाका संहार कर दिया! अब शीघ्र बताओ, क्या विचार (उपाय) करना चाहिये? ॥ २ ॥
- लङ्काकाण्ड *
८११
माल्यवंत अति जरठ निसाचर । रावन मातु पिता मंत्री बर॥ बोला बचन नीति अति पावन । सुनहु तात कछु मोर सिखावन॥
माल्यवंत [नामका एक] अत्यन्त बूढ़ा राक्षस था। वह रावणकी माताका पिता (अर्थात् उसका नाना) और श्रेष्ठ मन्त्री था। वह अत्यन्त पवित्र नीतिके वचन बोला—हे तात! कुछ मेरी सीख भी सुनो—॥ ३ ॥
जब ते तुम्ह सीता हरि आनी । असगुन होहिं न जाहिं बखानी॥ बेद पुरान जासु जसु गायो । राम बिमुख काहुँ न सुख पायो॥
जबसे तुम सीताको हर लाये हो, तबसे इतने अपशकुन हो रहे हैं कि जो वर्णन नहीं किये जा सकते। वेद-पुराणोंने जिनका यश गाया है, उन श्रीरामसे विमुख होकर किसीने सुख नहीं पाया॥ ४ ॥
दो०—हिरन्याच्छ भ्राता सहित मधु कैटभ बलवान ।
जेहिं मारे सोड़ अवतरेउ कृपासिंधु भगवान॥ ४८ ( क )॥
भाई हिरण्यकशिपुसहित हिरण्याक्षको और बलवान् मधु-कैटभको जिन्होंने मारा था, वे ही कृपाके समुद्र भगवान् [रामरूपसे] अवतरित हुए हैं॥ ४८ ( क )॥
मासपारायण, पचीसवाँ विश्राम
कालरूप खल बन दहन गुनागार घनबोध ।
सिव बिरंचि जेहि सेवहिं तासों कवन बिरोध॥ ४८ ( ख )॥
जो कालस्वरूप हैं, दुष्टोंके समूहरूपी बनके भस्म करनेवाले [अग्नि] हैं, गुणोंके धाम और ज्ञानघन हैं, एवं शिवजी और ब्रह्माजी भी जिनकी सेवा करते हैं, उनसे वैर कैसा?॥ ४८ ( ख )॥
परिहरि बयरु देहु बैदैही । भजहु कृपानिधि परम सनेही॥
ताके बचन बान सम लागे । करिआ मुह करि जाहि अभागे॥
[अतः] वैर छोड़कर उन्हें जानकीजीको दे दो और कृपानिधान परम स्नेही श्रीरामजीका भजन करो। रावणको उसके वचन बाणके समान लगे। [वह बोला—] अरे अभागे! मुँह काला करके [यहाँसे] निकल जा॥ १ ॥
बूढ़ भएसि न त मरतेउँ तोही । अब जनि नयन देखावसि मोही॥
तेहिं अपने मन अस अनुमाना । बध्यो चहत एहि कृपानिधाना॥
तू बूढ़ा हो गया, नहीं तो तुझे मार ही डालता। अब मेरी आँखोंको अपना मुँह न दिखला। रावणके ये वचन सुनकर उसने (माल्यवान्ने) अपने मनमें ऐसा अनुमान किया कि इसे कृपानिधान श्रीरामजी अब मारना ही चाहते हैं॥ २ ॥
८२०
- रामचरितमानस *
सो उठि गयउ कहत दुर्बादा । तब सकोप बोलेउ घननादा ॥ कौतुक प्रात देखिअहु मोरा । करिहुउँ बहुत कहौं का थोरा ॥
वह रावणको दुर्वचन कहता हुआ उठकर चला गया। तब मेघनाद क्रोधपूर्वक बोला—सबेरें मेरी करामात देखना। मैं बहुत कुछ करूँगा; थोड़ा क्या कहूँ ? (जो कुछ वर्णन करूँगा थोड़ा ही होगा) ॥ ३ ॥
सुनि सुत बचन भरोसा आवा । प्रीति समेत अंक बैठावा ॥ करत बिचार भयउ भिनुसारा । लागे कपि पुनि चहुँ दुआरा ॥
पुत्रके वचन सुनकर रावणको भरोसा आ गया। उसने प्रेमके साथ उसे गोदमें बैठा लिया। विचार करते-करते ही सबेरा हो गया। वानर फिर चारों दरवाजोंपर जा लगे ॥ ४ ॥
कोपि कपिन्ह दुर्घट गढ़ु घेरा । नगर कोलाहलु भयउ घनेरा ॥ बिबिधायुध धर निसिचर धाए । गढ़ ते पर्वत सिखर ढहाए ॥
वानरोंने क्रोध करके दुर्गम किलेको घेर लिया। नगरमें बहुत ही कोलाहल (शोर) मच गया। राक्षस बहुत तरहके अस्त्र-शस्त्र धारण करके दौड़े और उन्होंने किलेपरसे पहाड़ोंके शिखर ढहाये ॥ ५ ॥
छं०—ढाहे महीधर सिखर कोटिन्ह बिबिध बिधि गोला चले ।
घहरात जिमि पबिपात गर्जत जनु प्रलय के बादले ॥
मर्कट बिकट भट जुटत कटत न लटत तन जर्जर भए ।
गहि सैल तेहि गढ़ पर चलावहिं जहाँ सो तहाँ निसिचर हए ॥
उन्होंने पर्वतोंके करोड़ों शिखर ढहाये, अनेक प्रकारसे गोले चलने लगे। वे गोले ऐसा घहराते हैं जैसे व्रजपात हुआ हो (बिजली गिरी हो) और योद्धा ऐसे गरजते हैं मानो प्रलयकालके बादल हों। विकट वानर योद्धा भिड़ते हैं, कट जाते हैं (घायल हो जाते हैं), उनके शरीर जर्जर (चलनी) हो जाते हैं, तब भी वे लटते नहीं (हिम्मत नहीं हारते)। वे पहाड़ उठाकर उसे किलेपर फेंकते हैं। राक्षस जहाँ-के-तहाँ (जो जहाँ होते हैं वहाँ) मारे जाते हैं।
दो०—मेघनाद सुनि श्रवन अस गढ़ु पुनि छँका आइ ।
उत्तर्यो बीर दुर्ग तें सन्मुख चलयो बजाइ ॥ ४९ ॥
मेघनादने कानोंसे ऐसा सुना कि वानरोंने आकर फिर किलेको घेर लिया है। तब वह वीर किलेसे उतरा और ढंका बजाकर उनके सामने चला ॥ ४९ ॥
कहाँ कोसलाधीस द्वौ भ्राता । धन्वी सकल लोक बिख्याता ॥
कहाँ नल नील दुबिद सुग्रीवा । अंगद हनूमंत बल सीवा ॥
- लङ्काकाण्ड *
८२१
[मेघनादने पुकारकर कहा—] समस्त लोकोंमें प्रसिद्ध धनुर्धर कोसलाधीश दोनों भाई कहाँ हैं? नल, नील, द्विविद, सुग्रीव और बलकी सीमा अङ्गद और हनुमान् कहाँ हैं? ॥ १ ॥
कहाँ बिभीषणु भ्राताद्रोही। आजु सबहि हठि मारउँ ओही ॥ अस कहि कठिन बान संधाने। अतिसय क्रोध श्रवन लगि ताने ॥
भाईसे द्रोह करनेवाला विभीषण कहाँ है? आज मैं सबको और उस दुष्टको तो हठपूर्वक (अवश्य ही) मारूँगा। ऐसा कहकर उसने धनुषपर कठिन बाणोंका सन्धान किया और अत्यन्त क्रोध करके उसे कानतक खींचा ॥ २ ॥
सर समूह सो छाड़ै लागा। जनु सपच्छ धावहिं बहु नागा ॥ जहाँ तहाँ परत देखिअहिं बानर। सन्मुख होड़ न सके तेहि अवसर ॥
वह बाणोंके समूह छोड़ने लगा। मानो बहुत-से पंखवाले साँप दौड़े जा रहे हों। जहाँ-तहाँ वानर गिरते दिखायी पड़ने लगे। उस समय कोई भी उसके सामने न हो सके ॥ ३ ॥
जहाँ तहाँ भागि चले कपि रीछा। बिसरी सबहि जुद्ध कै ईछा ॥ सो कपि भालु न रन महाँ देखा। कीन्हेसि जेहि न प्रान अवसेषा ॥
रीछ-वानर जहाँ-तहाँ भाग चले। सबको युद्धकी इच्छा भूल गयी। रणभूमिमें ऐसा एक भी वानर या भालु नहीं दिखायी पड़ा जिसको उसने प्राणमात्र अवशेष न कर दिया हो (अर्थात् जिसके केवल प्राणमात्र ही न बचे हों; बल, पुरुषार्थ सारा जाता न रहा हो) ॥ ४ ॥
दो०—दस दस सर सब मारेसि परे भूमि कपि बीर। सिंहनाद करि गर्जा मेघनाद बल धीर ॥ ५० ॥
फिर उसने सबको दस-दस बाण मारे, वानर वीर पृथ्वीपर गिर पड़े। बलवान् और धीर मेघनाद सिंहके समान नाद करके गरजने लगा ॥ ५० ॥
देखि पवनसुत कटक बिहाला। क्रोधवंत जनु धायउ काला ॥ महासैल एक तुरत उपारा। अति रिस मेघनाद पर डारा ॥
सारी सेनाको बेहाल (व्याकुल) देखकर पवनसुत हनुमान् क्रोध करके ऐसे दौड़े मानो स्वयं काल दौड़ा आता हो। उन्होंने तुरंत एक बड़ा भारी पहाड़ उखाड़ लिया और बड़े ही क्रोधके साथ उसे मेघनादपर छोड़ा ॥ १ ॥
आवत देखि गयउ नभ सोई। रथ सारथी तुरग सब खोई ॥ बार बार पचार हनुमाना। निकट न आव मरमु सो जाना ॥
८२२
- रामचरितमानस *
पहाड़को आते देखकर वह आकाशमें उड़ गया। [उसके] रथ, सारथि और घोड़े सब नष्ट हो गये (चूर-चूर हो गये)। हनुमान्जी उसे बार-बार ललकारते हैं। पर वह निकट नहीं आता, क्योंकि वह उनके बलका मर्म जानता था ॥ २ ॥
रघुपति निकट गयउ घननादा । नाना भाँति करेसि दुर्बादा ॥ अस्त्र सस्त्र आयुध सब डारे । कौतुकहीं प्रभु काटि निवारे ॥
[तब] मेघनाद श्रीरघुनाथजीके पास गया और उसने [उनके प्रति] अनेकों प्रकारके दुर्बचनोंका प्रयोग किया। [फिर] उसने उनपर अस्त्र-शस्त्र तथा और सब हथियार चलाये। प्रभुने खेलमें ही सबको काटकर अलग कर दिया ॥ ३ ॥
देखि प्रताप मूढ़ खिसिआना । करै लाग माया बिधि नाना ॥ जिमि कोउ करै गरुड़ सैं खेला । डरपावै गहि स्वल्प सपेला ॥
श्रीरामजीका प्रताप (सामर्थ्य) देखकर वह मूर्ख लज्जित हो गया और अनेकों प्रकारकी माया करने लगा। जैसे कोई व्यक्ति छोटा-सा साँपका बच्चा हाथमें लेकर गरुड़को डरावे और उससे खेल करे ॥ ४ ॥
दो०—जासु प्रबल माया बस सिव बिरंचि बड़ छोट । ताहि दिखावड़ निसिचर निज माया मति खोट ॥ ५१ ॥
शिवजी और ब्रह्माजीतक बड़े-छोटे [सभी] जिनकी अत्यन्त बलवान् मायाके वशमें हैं, नीचबुद्धि निशाचर उनको अपनी माया दिखलाता है ॥ ५१ ॥
नभ चढ़ि बरष बिपुल अंगारा । महि ते प्रगट होहिं जलधारा ॥ नाना भाँति पिसाच पिसाची । मारु काटु धुनि बोलहिं नाची ॥
आकाशमें [ऊँचे] चढ़कर वह बहुत-से अंगारे बरसाने लगा। पृथ्वीसे जलकी धाराएँ प्रकट होने लगीं। अनेक प्रकारके पिशाच तथा पिशाचिनियाँ नाच-नाचकर 'मारो, काटो' की आवाज करने लगीं ॥ १ ॥
बिष्णु पूय रुधिर कच हाड़ा । बरषइ कबहुँ उपल बहु छाड़ा ॥ बरषि धूरि कीन्हेसि अँधिआरा । सूझ न आपन हाथ पसारा ॥
वह कभी तो विष्णु, पीब, खून, बाल और हड्डियाँ बरसाता था और कभी बहुत-से पत्थर फेंके देता था। फिर उसने धूल बरसाकर ऐसा अँधेरा कर दिया कि अपना ही पसारा हुआ हाथ नहीं सूझता था ॥ २ ॥
कपि अकुलाने माया देखें । सब कर मरन बना एहि लेखें ॥ कौतुक देखि राम मुसुकाने । भए सभीत सकल कपि जाने ॥
- लङ्काकाण्ड *
८२३
माया देखकर वानर अकुला उठे। वे सोचने लगे कि इस हिसाबसे (इसी तरह रहा) तो सबका मरण आ बना। यह कौतुक देखकर श्रीरामजी मुसकराये। उन्होंने जान लिया कि सब वानर भयभीत हो गये हैं ॥ ३ ॥
एक बान काटी सब माया । जिमि दिनकर हर तिमिर निकाया ॥ कृपादृष्टि कपि भालु बिलोके । भए प्रबल रन रहहिं न रोके ॥
तब श्रीरामजीने एक ही बाणसे सारी माया काट डाली, जैसे सूर्य अन्धकारके समूहको हर लेता है। तदनन्तर उन्होंने कृपाभरी दृष्टिसे वानर-भालुओंकी ओर देखा, [जिससे] वे ऐसे प्रबल हो गये कि रणमें रोकनेपर भी नहीं रुकते थे ॥ ४ ॥
दो०—आयसु मागि राम पहिं अंगदादि कपि साथ ।
लछिमन चले कुब्द्ध होइ बान सरासन हाथ ॥ ५२ ॥
श्रीरामजीसे आज्ञा माँगकर, अंगद आदि वानरोंके साथ हाथोंमें धनुष-बाण लिये हुए श्रीलक्ष्मणजी कुब्द्ध होकर चले ॥ ५२ ॥
छतज नयन उर बाहु बिसाला । हिमगिरि निभ तनु कछु एक लाला ॥ इहाँ दसानन सुभट पठाए । नाना अस्त्र सस्त्र गहि धाए ॥
उनके लाल नेत्र हैं, चौड़ी छाती और विशाल भुजाएँ हैं। हिमाचल पर्वतके समान उज्ज्वल (गौरवर्ण) शरीर कुछ ललाई लिये हुए है। इधर रावणने भी बड़े-बड़े योद्धा भेजे, जो अनेकों अस्त्र-सस्त्र लेकर दौड़े ॥ १ ॥
भूधर नख बिटपायुध धारी । धाए कपि जय राम पुकारी ॥ भिरे सकल जोरिहि सन जोरी । इत उत जय इच्छा नहिं थोरी ॥
पर्वत, नख और वृक्षरूपी हथियार धारण किये हुए वानर 'श्रीरामचन्द्रजीकी जय' पुकारकर दौड़े। वानर और राक्षस सब जोड़ीसे जोड़ी भिड़ गये। इधर और उधर दोनों ओर जयकी इच्छा कम न थी (अर्थात् प्रबल थी) ॥ २ ॥
मुठिकन्ह लातन्ह दातन्ह काटहिं । कपि जयसील मारि पुनि डाटहिं ॥ मारु मारु धरु धरु धरु मारु । सीस तोरि गहि भुजा उपारु ॥
वानर उनको घूँसों और लातोंसे मारते हैं, दांतोंसे काटते हैं। विजयशील वानर उन्हें मारकर फिर डाँटते भी हैं। 'मारो, मारो, पकड़ो, पकड़ो, पकड़कर मार दो, सिर तोड़ दो और भुजाएँ पकड़कर उखाड़ लो' ॥ ३ ॥
असि रव पूरि रही नव खंडा । धावहिं जहाँ तहाँ रुंड प्रचंडा ॥ देखहिं कौतुक नभ सुर बृंदा । कबहुँक बिसमय कबहुँ अनंदा ॥
८२४
- रामचरितमानस *
नवों खण्डोंमें ऐसी आवाज भर रही है। प्रचण्ड रुण्ड (धड़) जहाँ-तहाँ दौड़ रहे हैं। आकाशमें देवतागण यह कौतुक देख रहे हैं। उन्हें कभी खेद होता है और कभी आनन्द ॥४॥
दो०— रुधिर गाड़ भरि भरि जम्यो ऊपर धूरि उड़ाइ।
जनु अँगार रासिन्ह पर मृतक धूम रह्यो छाड़ ॥५३॥
खून गड़ोंमें भर-भरकर जम गया है और उसपर धूल उड़कर पड़ रही है [वह दृश्य ऐसा है] मानो अंगारोंके ढेरोंपर राख छा रही हो ॥५३॥
घायल बीर बिराजहिं कैसे। कुसुमित किसुक के तरु जैसे ॥
लछिमन मेघनाद द्वौ जोधा। भिरहिं परसपर करि अति क्रोधा ॥
घायल वीर कैसे शोभित हैं, जैसे फूले हुए पलासके पेड़। लक्ष्मण और मेघनाद दोनों योद्धा अत्यन्त क्रोध करके एक-दूसरेसे भिड़ते हैं ॥१॥
एकहि एक सकड़ नहिं जीती। निसिचर छल बल करड़ अनीती ॥
क्रोधवंत तब भयउ अनंता। भंजेउ रथ सारथी तुरंता ॥
एक-दूसरेको (कोई किसीको) जीत नहीं सकता। राक्षस छल-बल (माया) और अनीति (अधर्म) करता है, तब भगवान् अनन्तजी (लक्ष्मणजी) क्रोधित हुए और उन्होंने तुरंत उसके रथको तोड़ डाला और सारथिको टुकड़े-टुकड़े कर दिये! ॥२॥
नाना बिधि प्रहार कर सेष। राच्छस भयउ प्रान अवसेषा ॥
रावन सुत निज मन अनुमाना। संकठ भयउ हरिहि मम प्राना ॥
शेषजी (लक्ष्मणजी) उसपर अनेक प्रकारसे प्रहार करने लगे। राक्षसके प्राणमात्र शेष रह गये। रावणपुत्र मेघनादने मनमें अनुमान किया कि अब तो प्राणसंकट आ बना, ये मेरे प्राण हर लेंगे ॥३॥
बीरघातिनी छाड़िसि साँगी। तेजपुंज लछिमन उर लागी ॥
मुरुछा भई सक्ति के लागें। तब चलि गयउ निकट भय त्यागें ॥
तब उसने वीरघातिनी शक्ति चलायी। वह तेजपूर्ण शक्ति लक्ष्मणजीकी छातीमें लगी। शक्तिके लगनेसे उन्हें मूर्छा आ गयी। तब मेघनाद भय छोड़कर उनके पास चला गया ॥४॥
दो०— मेघनाद सम कोटि सत जोधा रहे उठाइ।
जगदाधार सेष किमि उठै चले खिसिआइ ॥५४॥
मेघनादके समान सौ करोड़ (अगणित) योद्धा उन्हें उठा रहे हैं। परन्तु जगत्के आधार श्रीशेषजी (लक्ष्मणजी) उनसे कैसे उठते? तब वे लजाकर चले गये ॥५४॥
- लङ्काकाण्ड *
८२५
सुनु गिरिजा क्रोधानल जासू। जारइ भुवन चारिदस आसू॥ सक संग्राम जीति को ताही। सेवहिं सुर नर अग जग जाही॥
[शिवजी कहते हैं—] हे गिरिजे! सुनो, [प्रलयकालमें] जिन (शेषनाग)—के क्रोधकी अग्नि चौदहों भुवनोंको तुरंत ही जला डालती है और देवता, मनुष्य तथा समस्त चराचर [जीव] जिनकी सेवा करते हैं, उनको संग्राममें कौन जीत सकता है ? ॥ १ ॥
यह कौतूहल जानइ सोई। जा पर कृपा राम कै होई॥ संध्या भइ फिरि द्वौ बाहनी। लगे सँभारन निज निज अनी॥
इस लीलाको वही जान सकता है जिसपर श्रीरामजीकी कृपा हो। सन्ध्या होनेपर दोनों ओरकी सेनाएँ लौट पड़ीं; सेनापति अपनी-अपनी सेनाएँ सँभालने लगे ॥ २ ॥
व्यापक ब्रह्म अजित भुवनेस्वर। लछिमन कहाँ बूझ करुनाकर॥ तब लिंग लै आयउ हनुमाना। अनुज देखि प्रभु अति दुख माना॥
व्यापक, ब्रह्म, अजेय, सम्पूर्ण ब्रह्माण्डके ईश्वर और करुणाकी खान श्रीरामचन्द्रजीने पूछा—लक्ष्मण कहाँ है? तबतक हनुमान् उन्हें ले आये। छोटे भाईको [इस दशामें] देखकर प्रभुने बहुत ही दुःख माना ॥ ३ ॥
जामवंत कह बैद सुषेना। लंकाँ रहइ को पठई लेना॥ धरि लघु रूप गयउ हनुमंता। आनेउ भवन समेत तुरंता॥
जाम्बवान्ने कहा—लङ्कामें सुषेण वैद्य रहता है, उसे ले आनेके लिये किसको भेजा जाय? हनुमान्जी छोटा रूप धरकर गये और सुषेणको उसके घरसमेत तुरंत ही उठा लाये ॥ ४ ॥
दो०—राम पदारबिंद सिर नायउ आइ सुषेन।
कहा नाम गिरि औषधी जाहु पवनसुत लेन॥ ५५ ॥
सुषेणने आकर श्रीरामजीके चरणारविन्दोंमें सिर नवाया। उसने पर्वत और औषधका नाम बताया, (और कहा कि) हे पवनपुत्र! औषधि लेने जाओ ॥ ५५ ॥
राम चरन सरसिज उर राखी। चला प्रभंजनसुत बल भाषी॥ उहाँ दूत एक मरमु जनावा। रावनु कालनेमि गृह आवा॥
श्रीरामजीके चरणकमलोंको हृदयमें रखकर पवनपुत्र हनुमान्जी अपना बल बखानकर (अर्थात् मैं अभी लिये आता हूँ, ऐसा कहकर) चले। उधर एक गुप्तचरने रावणको इस रहस्यकी खबर दी। तब रावण कालनेमिके घर आया ॥ १ ॥
दसमुख कहा मरमु तेहिं सुना। पुनि पुनि कालनेमि सिरु धुना॥ देखत तुम्हहि नगरु जेहिं जारा। तासु पंथ को रोकन पारा॥
८२६
- रामचरितमानस *
रावणने उसको सारा मर्म (हाल) बतलाया। कालनेमिने सुना और बार-बार सिर पीटा (खेद प्रकट किया)। [उसने कहा—] तुम्हारे देखते-देखते जिसने नगर जला डाला, उसका मार्ग कौन रोक सकता है? ॥ २ ॥
भजु रघुपति करु हित आपना । छाँड़हु नाथ मूषा जल्पना ॥ नील कंज तनु सुंदर स्यामा । हृदयँ राखु लोचनाभिरामा ॥
श्रीरघुनाथजीका भजन करके तुम अपना कल्याण करो। हे नाथ! झूठी बकवाद छोड़ दो। नेत्रोंको आनन्द देनेवाले नीलकमलके समान सुन्दर श्याम शरीरको अपने हृदयमें रखो ॥ ३ ॥
मैं तैं मोर मूढ़ता त्यागू । महा मोह निस्ति सूतत जागू ॥ काल ब्याल कर भच्छक जोई । सपनेहुँ समर कि जीतिअ सोई ॥
मैं-तू (भेद-भाव) और ममतारूपी मूढ़ताको त्याग दो। महामोह (अज्ञान)-रूपी रात्रिमें सो रहे हो, सो जाग उठो। जो कालरूपी सर्पका भी भक्षक है, कहीं स्वप्नमें भी वह रणमें जीता जा सकता है? ॥ ४ ॥
दो०— सुनि दसकंठ रिसान अति तेहिं मन कीन्ह बिचार ।
राम दूत कर मरौँ बरु यह खल रत मल भार ॥ ५६ ॥
उसकी ये बातें सुनकर रावण बहुत ही क्रोधित हुआ। तब कालनेमिने मनमें विचार किया कि [इसके हाथसे मरनेकी अपेक्षा] श्रीरामजीके दूतके हाथसे ही मरूँ तो अच्छा है। यह दुष्ट तो पापसमूहमें रत है ॥ ५६ ॥
अस कहि चला रचिसि मग माया । सर मंदिर बर बाग बनाया ॥ मारुतसुत देखा सुभ आश्रम । मुनिहि बूझि जल पियौं जाइ श्रम ॥
वह मन-ही-मन ऐसा कहकर चला और उसने मार्गमें माया रची। तालाब, मन्दिर और सुन्दर बाग बनाया। हनुमान्जीने सुन्दर आश्रम देखकर सोचा कि मुनिसे पूछकर जल पी लूँ, जिससे थकावट दूर हो जाय ॥ १ ॥
राच्छस कपट बेष तहाँ सोहा । मायापति दूतहि चह मोहा ॥ जाइ पवनसुत नायउ माथा । लाग सो कहै राम गुन गाथा ॥
राक्षस वहाँ कपट [से मुनि] का वेष बनाये विराजमान था। वह मूर्ख अपनी मायासे मायापतिके दूतको मोहित करना चाहता था। मारुतिने उसके पास जाकर मस्तक नवाया। वह श्रीरामजीके गुणोंकी कथा कहने लगा ॥ २ ॥
होत महा रन रावन रामहिं । जितिहिं राम न संसय या महिं ॥ इहाँ भएँ मैं देखउँ भाई । ग्यानदृष्टि बल मोहि अधिकाई ॥
- लङ्काकाण्ड *
८२७
[वह बोला—] रावण और राममें महान् युद्ध हो रहा है। रामजी जीतेंगे इसमें सन्देह नहीं है। हे भाई! मैं यहाँ रहता हुआ ही सब देख रहा हूँ। मुझे ज्ञानदृष्टिका बहुत बड़ा बल है ॥ ३ ॥
मागा जल तेहिं दीन्ह कमंडल । कह कपि नहिं अघाउँ थोरें जल ॥ सर मज्जन करि आतुर आवहु । दिच्छा देउँ ग्यान जेहिं पावहु ॥
हनुमान्जीने उससे जल माँगा, तो उसने कमण्डलु दे दिया। हनुमान्जीने कहा—थोड़े जलसे मैं तुम नहीं होनेका। तब वह बोला—तालाबमें स्नान करके तुरंत लौट आओ तो मैं तुम्हें दीक्षा दूँ, जिससे तुम ज्ञान प्राप्त करो ॥ ४ ॥
दो०—सर पैठत कपि पद गहा मकरीं तब अकुलान ।
मारी सो धरि दिव्य तनु चली गगन चढ़ि जान ॥ ५७ ॥
तालाबमें प्रवेश करते ही एक मगरिने अकुलाकर उसी समय हनुमान्जीका पैर पकड़ लिया। हनुमान्जीने उसे मार डाला। तब वह दिव्य देह धारण करके विमानपर चढ़कर आकाशको चली ॥ ५७ ॥
कपि तव दरस भइउँ निष्पापा । मिटा तात मुनिबर कर सापा ॥ मुनि न होइ यह निसिचर घोरा । मानहु सत्य बचन कपि मोरा ॥
[उसने कहा—] हे वानर! मैं तुम्हारे दर्शनसे पापरहित हो गयी। हे तात! श्रेष्ठ मुनिका शाप मिट गया। हे कपि! यह मुनि नहीं है, घोर निशाचर है। मेरा बचन सत्य मानो ॥ १ ॥
अस कहि गई अपछरा जबहीं । निसिचर निकट गयउ कपि तबहीं ॥ कह कपि मुनि गुरदछिना लेहू । पाछें हमहिं मंत्र तुम्ह देहू ॥
ऐसा कहकर ज्यों ही वह अप्सरा गयी, त्यों ही हनुमान्जी निशाचरके पास गये। हनुमान्जीने कहा—हे मुनि! पहले गुरुदक्षिणा ले लीजिये। पीछे आप मुझे मन्त्र दीजियेगा ॥ २ ॥
सिर लंगूर लपेटि पछारा । निज तनु प्रगटेसि मरती बारा ॥ राम राम कहि छाड़ेसि प्राना । सुनि मन हरषि चलेउ हनुमाना ॥
हनुमान्जीने उसके सिरको पूँछमें लपेटकर उसे पछाड़ दिया। मरते समय उसने अपना (राक्षसी) शरीर प्रकट किया। उसने राम-राम कहकर प्राण छोड़े। यह (उसके मुँहसे राम-नामका उच्चारण) सुनकर हनुमान्जी मनमें हर्षित होकर चले ॥ ३ ॥
देखा सैल न औषध चीन्हा । सहसा कपि उपारि गिरि लीन्हा ॥ गहि गिरि निसि नभ धावत भयऊ । अवधपुरी ऊपर कपि गयऊ ॥
उन्होंने पर्वतको देखा, पर औषध न पहचान सके। तब हनुमान्जीने एकदमसे पर्वतको ही उखाड़ लिया। पर्वत लेकर हनुमान्जी रातहीमें आकाशमार्गसे दौड़ चले और अयोध्यापुरीके ऊपर पहुँच गये ॥ ४ ॥
८२८
- रामचरितमानस *
दो०—देखा भरत बिसाल अति निस्चिन्न मन अनुमानि ।
बिनु फर सायक मारेउ चाप श्रवन लगि तानि ॥ ५८ ॥
भरतजीने आकाशमें अत्यन्त विशाल स्वरूप देखा, तब मनमें अनुमान किया कि यह कोई राक्षस है। उन्होंने कानतक धनुषको खींचकर बिना फलका एक बाण मारा ॥ ५८ ॥
परेउ मुरुछि महि लागत सायक । सुमिरत राम राम रघुनायक ॥ सुनि प्रिय वचन भरत तब धाए । कपि समीप अति आतुर आए ॥
बाण लगते ही हनुमान्जी 'राम, राम, रघुपति' का उच्चारण करते हुए मूर्च्छित होकर पृथ्वीपर गिर पड़े। प्रिय वचन (रामनाम) सुनकर भरतजी उठकर दौड़े और बड़ी उतावलीसे हनुमान्जीके पास आये ॥ १ ॥
बिकल बिलोकि कीस उर लावा । जागत नहिं बहु भाँति जगावा ॥ मुख मलीन मन भए दुखारी । कहत बचन भरि लोचन बारी ॥
हनुमान्जीको व्याकुल देखकर उन्होंने हृदयसे लगा लिया। बहुत तरहसे जगाया, पर वे जागते न थे! तब भरतजीका मुख उदास हो गया। वे मनमें बड़े दुखी हुए और नेत्रोंमें [विषादके आँसुओंका] जल भरकर ये वचन बोले— ॥ २ ॥
जेहिं बिधि राम बिमुख मोहि कीन्हा । तेहिं पुनि यह दारुन दुख दीन्हा ॥ जौं मोरें मन बच अरु काया । प्रीति राम पद कमल अमाया ॥
जिस विधाताने मुझे श्रीरामसे विमुख किया, उसीने फिर यह भयानक दुःख भी दिया। यदि मन, वचन और शरीरसे श्रीरामजीके चरणकमलोंमें मेरा निष्कपट प्रेम हो, ॥ ३ ॥
तौ कपि होउ बिगत श्रम सूला । जौं मो पर रघुपति अनुकूला ॥ सुनत बचन उठि बैठ कपीसा । कहि जय जयति कोसलाधीसा ॥
और यदि श्रीरघुनाथजी मुझपर प्रसन्न हों तो यह वानर थकावट और पीड़ासे रहित हो जाय! यह वचन सुनते ही कपिराज हनुमान्जी 'कोसलपति श्रीरामचन्द्रजीकी जय हो, जय हो' कहते हुए उठ बैठे ॥ ४ ॥
सो०—लीन्ह कपिहि उर लाइ पुलकित तनु लोचन सजल ।
प्रीति न हृदयँ समाइ सुमिरि राम रघुकुल तिलक ॥ ५९ ॥
भरतजीने वानर (हनुमान्जी) को हृदयसे लगा लिया, उनका शरीर पुलकित हो गया और नेत्रोंमें [आनन्द तथा प्रेमके आँसुओंका] जल भर आया। रघुकुलतिलक श्रीरामचन्द्रजीका स्मरण करके भरतजीके हृदयमें प्रीति समाती न थी ॥ ५९ ॥
- लङ्काकाण्ड *
८२१
तात कुसल कहु सुखनिधान की । सहित अनुज अरु मातु जानकी ॥ कपि सब चरित समास बखाने । भए दुखी मन महुँ पछिताने ॥
[भरतजी बोले—] हे तात! छोटे भाई लक्ष्मण तथा माता जानकीसहित सुखनिधान श्रीरामजीकी कुशल कहो। वानर (हनुमान्जी) ने संक्षेपमें सब कथा कही। सुनकर भरतजी दुखी हुए और मनमें पछिताने लगे ॥ १ ॥
अहह दैव मैं कत जग जायउँ । प्रभु के एकहु काज न आयउँ ॥ जानि कुअवसरु मन धरि धीरा । पुनि कपि सन बोले बलबीरा ॥
हा दैव! मैं जगत्में क्यों जन्मा? प्रभुके एक भी काम न आया। फिर कुअवसर (विपरीत समय) जानकर मनमें धीरज धरकर बलवीर भरतजी हनुमान्जीसे बोले— ॥ २ ॥
तात गहरु होइहि तोहि जाता । काजु नसाइहि होत प्रभाता ॥ चढु मम सायक सैल समेता । पठवौँ तोहि जहाँ कृपानिकेता ॥
हे तात! तुमको जानेमें देर होगी और सबेरा होते ही काम बिगड़ जायगा। [अतः] तुम पर्वतसहित मेरे बाणपर चढ़ जाओ, मैं तुमको वहाँ भेज दूँ जहाँ कृपाके धाम श्रीरामजी हैं ॥ ३ ॥
सुनि कपि मन उपजा अभिमाना । मोरें भार चलिहि किमि बाना ॥ राम प्रभाव बिचारि बहोरी । बंदि चरन कह कपि कर जोरी ॥
भरतजीकी यह बात सुनकर [एक बार तो] हनुमान्जीके मनमें अभिमान उत्पन्न हुआ कि मेरे बोझसे बाण कैसे चलेगा? [किन्तु] फिर श्रीरामचन्द्रजीके प्रभावका विचार करके वे भरतजीके चरणोंकी वन्दना करके हाथ जोड़कर बोले— ॥ ४ ॥
दो०— तव प्रताप उर राखि प्रभु जैहउँ नाथ तुरंत ।
अस कहि आयसु पाड़ पद बंदि चलेउ हनुमंत ॥ ६० ( क ) ॥
हे नाथ! हे प्रभो! मैं आपका प्रताप हृदयमें रखकर तुरंत चला जाऊँगा। ऐसा कहकर आज्ञा पाकर और भरतजीके चरणोंकी वन्दना करके हनुमान्जी चले ॥ ६० ( क ) ॥
भरत बाहुबल सील गुन प्रभु पद प्रीति अपार ।
मन महुँ जात सराहत पुनि पुनि पवनकुमार ॥ ६० ( ख ) ॥
भरतजीके बाहुबल, शील (सुन्दर स्वभाव), गुण और प्रभुके चरणोंमें अपार प्रेमकी मन-ही-मन बारंबार सराहना करते हुए मारुति श्रीहनुमान्जी चले जा रहे हैं ॥ ६० ( ख ) ॥
उहाँ राम लछिमनहि निहारी । बोले बचन मनुज अनुसारी ॥ अर्ध राति गड़ कपि नहीं आयउ । राम उठाइ अनुज उर लायउ ॥
८३०
- रामचरितमानस *
वहाँ लक्ष्मणजीको देखकर श्रीरामजी साधारण मनुष्योंके अनुसार (समान) वचन बोले—आधी रात बीत चुकी, हनुमान् नहीं आये। यह कहकर श्रीरामजीने छोटे भाई लक्ष्मणजीको उठाकर हृदयसे लगा लिया ॥ १ ॥
सकहु न दुखित देखि मोहि काऊ । बंधु सदा तव मृदुल सुभाऊ ॥ मम हित लागि तजेहु पितु माता । सहेहु बिपिन हिम आतप बाता ॥
[और बोले—] हे भाई! तुम मुझे कभी दुःखी नहीं देख सकते थे। तुम्हारा स्वभाव सदासे ही कोमल था। मेरे हितके लिये तुमने माता-पिताको भी छोड़ दिया और वनमें जाड़ा, गरमी और हवा सब सहन किया ॥ २ ॥
सो अनुराग कहाँ अब भाई । उठहु न सुनि मम बच बिकलाई ॥ जौं जनतेउँ बन बंधु बिछोहू । पिता बचन मनतेउँ नहिं ओहू ॥
हे भाई! वह प्रेम अब कहाँ है? मेरे व्याकुलतापूर्ण वचन सुनकर उठते क्यों नहीं? यदि मैं जानता कि वनमें भाईका विछोह होगा तो मैं पिताका वचन [जिसका मानना मेरे लिये परम कर्तव्य था] उसे भी न मानता ॥ ३ ॥
सुत बित नारि भवन परिवारा । होहिं जाहिं जग बारहिं बारा ॥ अस बिचारि जियै जागहु ताता । मिलइ न जगत सहोदर भ्राता ॥
पुत्र, धन, स्त्री, घर और परिवार—ये जगत्में बार-बार होते और जाते हैं, परन्तु जगत्में सहोदर भाई बार-बार नहीं मिलता। हृदयमें ऐसा विचारकर हे तात! जागो ॥ ४ ॥
जथा पंख बिनु खग अति दीना । मनि बिनु फनि करिबर कर हीना ॥ अस मम जिवन बंधु बिनु तोही । जौं जड़ दैव जिआवै मोही ॥
जैसे पंख बिना पक्षी, मणि बिना सर्प और सूँड़ बिना श्रेष्ठ हाथी अत्यन्त दीन हो जाते हैं, हे भाई! यदि कहीं जड़ दैव मुझे जीवित रखे तो तुम्हारे बिना मेरा जीवन भी ऐसा ही होगा ॥ ५ ॥
जैहउँ अवध कवन मुहु लाई । नारि हेतु प्रिय भाइ गँवाई ॥ बरु अपजस सहतेउँ जग माहीं । नारि हानि बिसेष छति नाहीं ॥
स्त्रीके लिये प्यारे भाईको खोकर, मैं कौन-सा मुँह लेकर अवध जाऊँगा? मैं जगत्में बदनामी भले ही सह लेता (कि राममें कुछ भी वीरता नहीं है जो स्त्रीको खो बैठे)। स्त्रीकी हानिसे [इस हानिको देखते] कोई विशेष क्षति नहीं थी ॥ ६ ॥
अब अपलोकु सोकु सुत तोरा । सहिहि निठुर कठोर उर मोरा ॥ निज जननी के एक कुमारा । तात तासु तुम्ह प्रान अधारा ॥
- लङ्काकाण्ड *
८३१
अब तो हे पुत्र! मेरा निष्ठुर और कठोर हृदय यह अपयश और तुम्हारा शोक दोनों ही सहन करेगा। हे तात! तुम अपनी माताके एक ही पुत्र और उसके प्राणाधार हो ॥७॥
सौंपैसि मोहि तुम्हहि गहि पानी । सब बिधि सुखद परम हित जानी ॥ उतरु काह दैहउँ तेहि जाई । उठि किन मोहि सिखावहु भाई ॥
सब प्रकारसे सुख देनेवाला और परम हितकारी जानकर उन्होंने तुम्हें हाथ पकड़कर मुझे सौंपा था। मैं अब जाकर उन्हें क्या उत्तर दूँगा? हे भाई! तुम उठकर मुझे सिखाते (समझाते) क्यों नहीं? ॥८॥
बहु बिधि सोचत सोच बिमोचन । स्वत सलिल राजिव दल लोचन ॥ उमा एक अखंड रघुराई । नर गति भगत कृपाल देखाई ॥
सोचसे छुड़ानेवाले श्रीरामजी बहुत प्रकारसे सोच कर रहे हैं। उनके कमलकी पँखुड़ीके समान नेत्रोंसे [विषादके आँसुओंका] जल बह रहा है। [शिवजी कहते हैं—] हे उमा! श्रीरघुनाथजी एक (अद्वितीय) और अखण्ड (वियोगरहित) हैं। भक्तोंपर कृपा करनेवाले भगवान्ने [लीला करके] मनुष्यकी दशा दिखलायी है ॥९॥
सो०—प्रभु प्रलाप सुनि कान बिकल भए वानर निकर । आइ गयउ हनुमान जिमि करुना महाँ बीर रस ॥६१॥
प्रभुके [लीलाके लिये किये गये] प्रलापको कानोंसे सुनकर वानरोंके समूह व्याकुल हो गये। [इतनेमें ही] हनुमान्जी आ गये, जैसे करुणरस [के प्रसङ्ग] में वीररस [का प्रसङ्ग] आ गया हो ॥६१॥
हरषि राम भेटेउ हनुमाना । अति कृतग्य प्रभु परम सुजाना ॥ तुरत बैद तब कीन्हि उपाई । उठि बैठे लछिमन हरषाई ॥
श्रीरामजी हर्षित होकर हनुमान्जीसे गले लगकर मिले। प्रभु परम सुजान (चतुर) और अत्यन्त ही कृतज्ञ हैं। तब वैद्य (सुषेण) ने तुरंत उपाय किया, [जिससे] लक्ष्मणजी हर्षित होकर उठ बैठे ॥१॥
हृदयं लाइ प्रभु भेटेउ भ्राता । हरषे सकल भालु कपि ब्राता ॥ कपि पुनि बैद तहाँ पहुँचावा । जेहि बिधि तबहिं ताहि लइ आवा ॥
प्रभु भाईको हृदयसे लगाकर मिले। भालू और वानरोंके समूह सब हर्षित हो गये। फिर हनुमान्जीने वैद्यको उसी प्रकार वहाँ पहुँचा दिया जिस प्रकार वे उस बार (पहले) उसे ले आये थे ॥२॥
८३२
- रामचरितमानस *
यह ब्रूतांत दसानन सुनेऊ । अति बिषाद पुनि पुनि सिर धुनेऊ ॥ व्याकुल कुंभकरण पहिं आवा । बिबिध जतन करि ताहि जगावा ॥
यह समाचार जब रावणने सुना, तब उसने अत्यन्त विषादसे बार-बार सिर पीटा । वह व्याकुल होकर कुम्भकर्णके पास गया और बहुत-से उपाय करके उसने उसको जगाया ॥ ३ ॥
जागा निसिचर देखिअ कैसा । मानहुँ कालु देह धरि बैसा ॥ कुंभकरण बूझा कहु भाई । काहे तव मुख रहे सुखाई ॥
कुम्भकर्ण जगा (उठ बैठा) । वह कैसा दिखायी देता है मानो स्वयं काल ही शरीर धारण करके बैठा हो । कुम्भकर्णने पूछा—हे भाई ! कहो तो, तुम्हारे मुख सूख क्यों रहे हैं ? ॥ ४ ॥
कथा कही सब तेहिं अभिमानी । जेहि प्रकार सीता हरि आनी ॥ तात कपिन्ह सब निसिचर मारे । महा महा जोधा संघारे ॥
उस अभिमानी (रावण) —ने उससे जिस प्रकारसे वह सीताको हर लाया था [तबसे अबतककी] सारी कथा कही । [फिर कहा—] हे तात ! वानरोने सब राक्षस मार डाले । बड़े-बड़े योद्धाओंका भी संहार कर डाला ॥ ५ ॥
दुर्मुख सुररिपु मनुज अहारी । भट अतिकाय अकंपन भारी ॥ अपर महोदर आदिक बीरा । परे समर महि सब रनधीरा ॥
दुर्मुख, देवशत्रु (देवान्तक), मनुष्यभक्षक (नरान्तक), भारी योद्धा अतिकाय और अकम्पन तथा महोदर आदि दूसरे सभी रणधीर वीर रणभूमिमें मारे गये ॥ ६ ॥
दो०— सुनि दसकंधर बचन तब कुंभकरण बिलखान । जगदंबा हरि आनि अब सठ चाहत कल्यान ॥ ६२ ॥
तब रावणके वचन सुनकर कुम्भकर्ण बिलखकर (दुखी होकर) बोला—अरे मूर्ख ! जगज्जननी जानकीको हर लाकर अब तू कल्याण चाहता है ? ॥ ६२ ॥
भल न कीन्ह तैं निसिचर नाहा । अब मोहि आइ जगाएहि काहा ॥ अजहुँ तात त्यागि अभिमाना । भजहु राम होइहि कल्याना ॥
हे राक्षसराज ! तूने अच्छा नहीं किया । अब आकर मुझे क्या जगाया ? हे तात ! अब भी अभिमान छोड़कर श्रीरामजीको भजो तो कल्याण होगा ॥ १ ॥
हैं दससीस मनुज रघुनायक । जाके हनुमान से पायक ॥ अहह बंधु तैं कीन्हि खोटार्ई । प्रथमहिं मोहि न सुनाएहि आई ॥
हे रावण ! जिनके हनुमान्-सरीखे सेवक हैं, वे श्रीरघुनाथजी क्या मनुष्य हैं ? हाय भाई ! तूने बुरा किया, जो पहले ही आकर मुझे यह हाल नहीं सुनाया ॥ २ ॥
- लङ्काकाण्ड *
८३३
कीन्हेहु प्रभु विरोध तेहि देवक । सिव बिरंचि सुर जाके सेवक ॥ नारद मुनि मोहि ग्यान जो कहा । कहतेउँ तोहि समय निरबहा ॥
हे स्वामी! तुमने उस परम देवताका विरोध किया, जिसके शिव, ब्रह्मा आदि देवता सेवक हैं। नारद मुनिने मुझे जो ज्ञान कहा था, वह मैं तुझसे कहता; पर अब तो समय जाता रहा ॥ ३ ॥
अब भरि अंक भेटु मोहि भाई । लोचन सुफल करौं मैं जाई ॥ स्याम गात सरसीरुह लोचन । देखौं जाइ ताप त्रय मोचन ॥
हे भाई! अब तो [अन्तिम बार] अँकवार भरकर मुझसे मिल ले। मैं जाकर अपने नेत्र सफल करूँ। तीनों तापोंको छुड़ानेवाले श्यामशरीर, कमलनेत्र श्रीरामजीके जाकर दर्शन करूँ ॥ ४ ॥
दो०— राम रूप गुन सुमिरत मगन भयउ छन एक । रावन मागेउ कोटि घट मद अरु महिष अनेक ॥ ६३ ॥
श्रीरामचन्द्रजीके रूप और गुणोंको स्मरण करके वह एक क्षणके लिये प्रेममें मग्न हो गया। फिर रावणने करोड़ों घड़े मदिरा और अनेकों भैंसे मँगावाये ॥ ६३ ॥
महिष खाइ करि मदिरा पाना । गर्जा बज्राघात समाना ॥ कुंभकरण दुर्मद रन रंगा । चला दुर्ग तजि सेन न संगा ॥
भैंसे खाकर और मदिरा पीकर वह वज्राघात (बिजली गिरने) के समान गरजा। मदसे चूर, रणके उत्साहसे पूर्ण कुम्भकर्ण किला छोड़कर चला। सेना भी साथ नहीं ली ॥ १ ॥
देखि बिभीषनु आगें आयउ । परेउ चरन निज नाम सुनायउ ॥ अनुज उठाइ हृदयँ तेहि लायो । रघुपति भक्त जानि मन भायो ॥
उसे देखकर विभीषण आगे आये और उसके चरणोंपर गिरकर अपना नाम सुनाया। छोटे भाईको उठाकर उसने हृदयसे लगा लिया और श्रीरघुनाथजीका भक्त जानकर वे उसके मनको प्रिय लगे ॥ २ ॥
तात लात रावन मोहि मारा । कहत परम हित मंत्र बिचारा ॥ तेहिं गलानि रघुपति पहिं आयउँ । देखि दीन प्रभु के मन भायउँ ॥
[विभीषणने कहा—] हे तात! परम हितकर सलाह एवं विचार कहनेपर रावणने मुझे लात मारी। उसी ग्लानिके मारे मैं श्रीरघुनाथजीके पास चला आया। दीन देखकर प्रभुके मनको मैं [बहुत] प्रिय लगा ॥ ३ ॥